Spirit of a Fighter – Chapter 112
बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ। बस नीम के पत्ते हिलते रहे और कुएँ से ठंडी हवा आती रही।
फिर मीरा ने कहा, "तुम्हें कैसे पता कि तुम ये कर सकते हो? कभी किसी ने बताया?"
"कोई नहीं," मैंने कहा। "मैंने खुद पहचाना। पाँच साल का था। मेरी माँ चक्की चला रही थी, और मैंने उसे कहा — माँ, आज आटे में कुछ अलग है। उसने देखा — चक्की के पत्थर के नीचे एक मरी हुई छिपकली पड़ी थी। माँ ने वो आटा फेंक दिया।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "उस दिन से वो जानती है। और वो कभी किसी को नहीं बोली।"
मीरा ने रिपोर्ट अपने बैग में रखी। उसकी उँगलियाँ स्थिर थीं। मुझे लगा था वो मुँह फेर लेगी, या हँसेगी, या कहेगी कि ये सब बकवास है। पर उसने अपने घुटने पर हाथ रखा और सीधा मेरी तरफ़ देखा।
"ठीक है," उसने कहा। "तो अब तुम मेरी एक बात सुनो। मैं सबूत के बिना किसी पर आरोप नहीं लगाती। और मैंने तुम पर आरोप नहीं लगाया। पर ये भी जान लो — तुम्हारी नाक के भरोसे मैं किसी को सज़ा नहीं दिला सकती। मुझे काग़ज़ चाहिए। रिपोर्ट चाहिए। गवाह चाहिए।"
"सबूत के बिना आरोप नहीं," मैंने कहा।
"हाँ।"
"और आरोप के बिना चुप्पी नहीं।"
वो रुकी। फिर उसके होंठ हिले — थोड़ा सा, बहुत थोड़ा। पर वो पहली बार था जब उसने मेरे सामने ऐसे देखा। मुझे लगा जैसे कमरे में जो हवा बंद थी, उसे खिड़की मिल गई।
"तुमने ये बात कहाँ से उठाई?" उसने पूछा।
"कहीं से नहीं। बस सोचा।" मैंने कंधे उचकाए। "तुम्हारी बात का जवाब था।"
वो हँसी। बहुत हल्का सा। एक छोटी सी हँसी, जैसे कोई बंद कमरे में पहली बार हवा आई हो। और फिर उसने अपनी कलाई को रगड़ा, जहाँ निशान था, और उसका चेहरा फिर गंभीर हो गया।
"अब मेरी बात सुनो," उसने कहा। "मुझे ये निशान समझ नहीं आ रहा। पर मुझे कुछ और समझ आ रहा है।"
वो अपने बैग से फिर कुछ निकालने लगी। इस बार एक पुरानी प्लास्टिक की थैली, जिसमें कुछ काग़ज़ थे। पीले, मुड़े हुए, किनारों से फटे हुए। जैसे किसी दराज़ के कोने में दबे पड़े हों बरसों से।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा की दवाइयों के पर्चे," उसने कहा। "पुराने। जब मैं छोटी थी तब के भी हैं। मैंने इन्हें कल रात खोजा। पापा के कमरे में एक संदूक है जिसे वो कभी नहीं खोलते। आज उनकी नींद में मैंने खोला।"
मैंने एक पर्चा उठाया। काग़ज़ पुराना था, नाज़ुक, जैसे छूने से टूट जाएगा। ऊपर एक नाम लिखा था — "भैरव सिंह।"
"ये तो भैरव का नाम है," मैंने कहा।
"हर पर्चे पर है," मीरा ने कहा। "बीस साल के पर्चे। हर एक पर भैरव का नाम। कभी दवा के नीचे, कभी नीचे हस्ताक्षर में। जैसे वो हर महीने आता था। हर महीने पापा के लिए दवा लाता था।" उसने एक पर्चा उलटा किया। "पर देखो — दवा का नाम हर बार बदलता है। कभी ये, कभी वो। और यहाँ नीचे, छोटे अक्षरों में, हर पर्चे पर एक ही बात लिखी है।"
मैंने झुककर देखा। अक्षर छोटे थे, मुड़े हुए काग़ज़ पर फैले हुए। मैंने धीरे से पढ़ा।
"बिना मेरी सलाह के कोई दूसरी दवा मत लेना। वरना साँस रुक जाएगी।"
"हर पर्चे पर," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ अब धीमी थी, बहुत धीमी। "बीस साल। हर महीने। ये धमकी है, वीर। धमकी। मेरे पापा को डर में रखा गया है। इतने सालों तक।"
मैंने पर्चे वापस उसकी तरफ़ बढ़ाए। मेरे हाथ भारी लग रहे थे। मुझे अपनी माँ याद आई — कैसे वो चक्की चलाती हैं, कमर पकड़कर सीधी होती हैं, और फिर फिर झुक जाती हैं। कैसे वो हर सुबह चार बजे उठती हैं। कैसे उन्होंने आज भी मुझे रोका नहीं, बस कहा — "डर के साथ लड़।"
मैं उठने लगा।
"कहाँ जा रहे हो?" मीरा ने पूछा।
"घर। माँ अकेली हैं। आज रात भैरव के आदमी आए थे—"
"वो नहीं आए।" मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "तुम्हारे घर के बाहर मैंने दो आदमी देखे। पेड़ के पीछे। मैंने उन्हें देखा और वो भाग गए। मैंने सोचा तुम्हें बताऊँ।" उसकी पकड़ कसी रही। "वो तुम्हारे घर के आसपास मंडरा रहे हैं। वो सिर्फ़ डरा नहीं रहे। वो तुम्हें बाँध रहे हैं। जानते हैं कि तुम जाओगे जहाँ माँ है।"
मैं फिर बैठ गया।
बहुत देर तक दोनों चुप रहे। मैंने सुना — दूर कहीं कुत्ता भौंक रहा था, नहर की धीमी आवाज़ आ रही थी, और कुएँ के ढक्कन से हवा गुज़रने की सीटी जैसी आवाज़।
"वीर।" मीरा ने धीरे से कहा।
"हूँ।"
"मेरे पापा बीस साल से चुप हैं।" उसकी आवाज़ टूटी — बस हल्की सी, जैसे किसी तार में झुरझुरी आई हो। "बीस साल। वो कुर्सी पर बैठे हैं, और हर दिन कुछ ऐसा देखते हैं जो वो मुझे नहीं बताते। मैं जब छोटी थी तब मैंने उन्हें रात में उठकर बैठे देखा है — बस बैठे हुए, अँधेरे में। मैंने सोचा था बुख़ार है। पर बुख़ार में आदमी ऐसे नहीं बैठता।" उसने अपनी आँखें मसलीं। "मैं उनकी चुप्पी का सबूत ढूँढ रही हूँ। बस इतना चाहती हूँ कि एक बार वो मुझसे कहें — मीरा, ऐसा हुआ था। और मैं कहूँ — मुझे पता है, पापा। मैंने देखा है।"
उसकी आवाज़ फिर टूटी। वो रुकी, गहरी साँस ली, और फौरन संभल गई। मुझे लगा जैसे किसी ने उसके अंदर का पानी भरा हुआ बर्तन एक झटके में सीधा कर दिया हो।
"खैर," उसने कहा, आवाज़ फिर से साफ़। "ये तो मेरी बात है। तुम्हारे घर की ख़बर लो।"
मुझे कुछ कहना था। मुझे कहना था कि तुम्हारे पापा अकेले नहीं हैं। मुझे कहना था कि मेरी माँ भी उसी अँधेरे में बैठी हैं, बस फ़र्क़ ये है कि वो चक्की चलाती हैं और चुप नहीं रहतीं — वो दाल में नमक कम डाल देती हैं। पर मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि कुछ बातें कहने से छोटी हो जाती हैं।
मैं उठा। धोती झाड़ी। मीरा भी उठी।
"कल सुबह," मैंने कहा। "तुम्हारे पापा से मिलना होगा। उनसे सीधा पूछना होगा — वो पर्चे कहाँ से आए।"
"मैं पूछ चुकी हूँ।" उसकी आवाज़ में एक नई सी बात आई। "आज सुबह। वो चुप रहे। बस इतना कहा — 'भैरव से दूर रहो।' और फिर मुँह फेर लिया।"
"तो फिर मैं पूछूँगा।"
"वो तुमसे नहीं बोलेंगे—"
"मैं उनसे नहीं पूछूँगा," मैंने कहा। "मैं उनके हाथ देखूँगा। उनके पैर देखूँगा। जो दवा बीस साल से दी जा रही है, वो शरीर पर निशान छोड़ती है। और मैं वो निशान पहचान सकता हूँ।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुमने कहा था — सबूत के बिना आरोप नहीं। तो मैं तुम्हारे पापा के शरीर से सबूत लाऊँगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। चाँद उसके चेहरे पर पड़ रहा था और उसकी आँखों में कुछ नम था, पर वो रो नहीं रही थी।
"तुम अजीब हो, वीर सिंह," उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि तुम दूसरों की लड़ाई अपनी बना लेते हो।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने अपनी अँगूठी घुमाई। अब वो ठंडी थी, बिलकुल ठंडी, जैसे किसी पत्थर की तरह। पर मुझे पता था वो हमेशा ऐसी नहीं रहती।
मैं पलटा। दो कदम चला। फिर रुका।
"एक बात," मैंने कहा, बिना पलटे। "तुम्हारे पापा की कुर्सी जिस दिन आई, उस दिन कुएँ के पास कोई था।"
मीरा ने कोई आवाज़ नहीं की।
"मेरी माँ कहती है," मैंने आगे कहा। "उस रात वो कुएँ की तरफ़ पानी भरने गई थी। उसने एक आदमी को कुएँ के ढक्कन पर बैठे देखा। चाँदनी में। वो आदमी अपनी कलाई पकड़े बैठा था, जैसे किसी ने उसे काट लिया हो। और वो आदमी बोल रहा था — अपने आप से। माँ ने सुना — 'अब तेरी बारी, रणवीर।'"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno