Spirit of a Fighter113 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 113

7 min read November 5, 2026

मैंने पलटकर देखा।

मीरा पत्थर की तरह जम गई थी। उसका बैग उसके हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिर गया, और पर्चे बिखर गए — पीले काग़ज़, चाँद की रोशनी में, नीम के पत्तों के बीच।

उसने अपना हाथ उठाया। धीरे से, जैसे किसी सपने में। और उसने अपने दाहिने कंधे को छुआ।

"मेरे पापा के कंधे पर एक निशान है," वो फुसफुसाई। "बहुत पुराना। मैंने उनसे पूछा था — ये क्या है? वो हँसे थे और बोले थे — कुश्ती का निशान।" उसकी आँखें मेरी तरफ़ उठीं। "पर वो कुश्ती का निशान नहीं है, है ना?"

मैंने सिर हिलाया। धीरे से।

"वो दाँत का निशान है," मैंने कहा। "किसी आदमी के दाँत का। जिसने उसे उस रात कुएँ के पास काटा था।"

मीरा ने अपना हाथ नीचे किया। उसकी आँखों में पानी आ गया था, पर वो बह नहीं रहा था। वो बस वहीं रुका हुआ था, किनारे पर, जैसे कोई नदी किसी पत्थर से टकराकर रुक जाए।

"तो मेरे पापा," उसने धीरे से कहा, "उस रात से जानते थे।"

"हाँ।"

"और वो बीस साल से चुप हैं।"

"हाँ।"

"क्यों?"

मैंने अपनी मुट्ठी खोली। अँगूठी उस पर चमक रही थी, और इस बार वो गरम थी। हल्की गरम। जैसे किसी ने अभी छुआ हो।

"क्योंकि वो तुम्हें बचा रहे थे," मैंने कहा। "अगर वो बोलते, तो भैरव उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था — वो पहले से टूटे हुए थे। तो भैरव तुम पर हाथ डालता।"

मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

बहुत देर तक वो ऐसे ही खड़ी रही। नीम के पत्ते उसके बालों पर गिर रहे थे, और वो उन्हें हटा नहीं रही थी।

फिर उसने आँखें खोलीं।

"वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब साफ़ थी। किसी भी तरह की कोई झुरझुरी नहीं। "मैं कल सुबह तुम्हारे साथ चलूँगी। तुम मेरे पापा के हाथ देखो। और मैं उनके सामने वो पर्चे रखूँगी।" उसने नीचे झुककर बिखरे पर्चे उठाए। "अगर वो फिर चुप रहे, तो मैं उनसे कहूँगी — पापा, आपकी चुप्पी मुझे नहीं बचा रही। वो मुझे और ख़तरे में डाल रही है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तुम्हारे पापा सुनेंगे?" मैंने पूछा।

"नहीं सुनेंगे तो मैं अपने हाथ पर ये निशान दिखाऊँगी।" उसने अपनी कलाई ऊपर की। "और कहूँगी — ये भैरव नहीं है, पापा। ये वही अँगूठी है जो उस रात कुएँ पर थी।"

मैंने सिर हिलाया।

"ठीक है।"

"ठीक है।"

वो मुड़ी और जाने लगी। फिर रुकी। पलटी।

"वीर।"

"हाँ।"

"तुमने आज मुझे अपनी नाक के बारे में बताया।" उसने अपना बैग कंधे पर टिकाया। "मैं नहीं बोलूँगी। किसी को नहीं। तुम्हारी माँ की तरह।"

मैं कुछ नहीं बोला। मेरा गला भर आया था, और मुझे नहीं पता था क्यों। शायद इसलिए कि उसने उस चीज़ को संभालकर रखा जिसे मैंने बरसों से छुपाया था, और उसने उसे किसी हथियार की तरह नहीं देखा। उसने उसे उसी तरह देखा जैसे कोई किसी पुरानी, कीमती चीज़ को देखता है — जिसे संभालना पड़ता है।

वो चली गई। उसकी परछाईं नीम के नीचे से निकलकर नहर की तरफ़ मुड़ी और अँधेरे में मिल गई।

मैं वहीं खड़ा रहा।

और फिर मुझे वो गंध आई फिर से। जला हुआ काग़ज़। इस बार तेज़। बहुत तेज़। और वो आ रही थी — मेरे घर की तरफ़ से नहीं। वो आ रही थी — अखाड़े की तरफ़ से।

मैंने अपनी अँगूठी पकड़ी। वो गरम थी। बहुत गरम।

मैं दौड़ा।

नीम का पेड़ पीछे छूट गया। कुएँ का ढक्कन, जिसे भैरव ने पत्थरों से दबा दिया था, वो भी पीछे छूटा। मैं सीधा अखाड़े की तरफ़ भागा, और जैसे-जैसे पास पहुँचा, गंध बढ़ती गई।

अखाड़े की दीवार के पीछे से धुआँ उठ रहा था।

और धुएँ के बीच, दीवार के ऊपर, एक आदमी खड़ा था। बड़ा शरीर। चौड़ी छाती। मैंने उसे पहचाना — भैरव। वो नीचे देख रहा था। मेरी तरफ़। और उसके हाथ में कुछ जल रहा था।

काग़ज़। बहुत सारे काग़ज़। और वो उन्हें एक-एक करके आग में डाल रहा था।

मैं दीवार के पास पहुँचा और चढ़ने लगा। मेरे हाथ फिसल रहे थे, मिट्टी नाखूनों में भर रही थी।

भैरव ने मुझे देखा। उसने आग में से एक जलता हुआ काग़ज़ उठाया और हवा में लहराया।

"आ जा, वीर सिंह," उसकी आवाज़ आई, धुएँ के बीच से, मीठी, जैसे गुड़। "तेरे पापा का हिसाब जल रहा है। आ जा, बचा ले।"

मैं दीवार पर चढ़ गया।

और तभी मैंने देखा — आग के पीछे, नीम के दूसरे पेड़ के नीचे, एक परछाईं खड़ी थी। छोटी। दुबली। दो चोटियाँ।

गुड़िया।

वो अपने हाथों में एक थैली पकड़े खड़ी थी, और भैरव की तरफ़ देख रही थी। और भैरव उसे देख रहा था।

मेरा दिल सीने में रुक गया।

"गुड़िया!" मेरी आवाज़ फट गई। "भाग!"

पर वो नहीं भागी। वो वहीं खड़ी रही। और भैरव ने अपना हाथ उठाया — वो हाथ जिसमें जलता हुआ काग़ज़ था — और उसने उसे गुड़िया की तरफ़ बढ़ाया।

"ये तेरे भैया का हिसाब है, बिटिया," उसने कहा। "आ, तू ही इसे संभाल ले।"

॥

"गुड़िया!" मेरी आवाज़ फट गई थी। "भाग!"

पर वो नहीं भागी। और भैरव का हाथ जलते काग़ज़ के साथ उसकी तरफ़ बढ़ता रहा।

मैं दीवार पर से कूदा। गिरा। घुटने में चोट लगी, पर मैं उठा और भागा। धुआँ मेरी आँखों में भर रहा था, आग का ताप मुँह पर लग रहा था।

"आ जा, सुन ले पहले!" भैरव हँसा। "ये काग़ज़ कहता है तेरे पापा ने कितना पैसा लिया था मेरे पास से।"

पर वो काग़ज़ जलता हुआ नीचे गिरा, और गुड़िया ने एक कदम भी नहीं हटाया। वो अपनी थैली सीने से लगाए खड़ी रही, और उसके चेहरे पर डर नहीं था।

"भैया के पापा ने पैसा नहीं लिया था," उसने कहा। छोटी आवाज़, पर साफ़। "मेरी माँ कहती है — जो पैसा लेता है, उसका चूल्हा कभी गरम नहीं होता। हमारा चूल्हा रोज़ गरम होता है।"

भैरव का हाथ रुक गया।

और उसी एक पल में मैं पहुँच गया। मैंने गुड़िया को पीछे खींचा, उसे अपने पीछे किया, और अपनी छाती आग के सामने तान दी।

"अब बोल," मैंने कहा। मेरी साँस फूल रही थी, धुआँ गले में जा रहा था। "जो बोलना है, मुझसे बोल।"

भैरव ने मुझे देखा। फिर गुड़िया को। फिर अपने हाथ में बचे काग़ज़ों को।

और फिर उसने वो सारे काग़ज़ एक साथ आग में झोंक दिए।

"अब कुछ नहीं बोलूँगा," वो मुस्कुराया। "जो बोलना था, जल गया।"

आग भड़की। काग़ज़ मुड़े, काले पड़े, राख हुई। मेरी नाक में जली स्याही की गंध भर गई — कड़वी, तेज़, गले में अटकने वाली।

और भैरव पीछे हटा। दीवार के उस पार अंधेरे में उतरा, और उसकी आवाज़ दूर से आई — "तीन दिन, वीर सिंह। बस तीन दिन।"

फिर सन्नाटा।

सिर्फ़ आग की आवाज़ बची थी — छप-छप। और गुड़िया की साँस, मेरी पीठ से टकरा रही थी।

मैं पलटा। वो अपनी थैली सीने से लगाए खड़ी थी, और उसकी आँखों में पहली बार वो चीज़ दिखी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — डर। असली डर।

"थैली में क्या है?" मैंने पूछा।

उसने धीरे से खोली। अंदर लाल मिट्टी थी। और उसके ऊपर जो पत्ते थे, वो मुरझा गए थे।

"मैंने सोचा," वो फुसफुसाई, "अगर भैरव तुझे पकड़ ले, तो मैं ये मिट्टी उसके मुँह पर फेंक दूँगी। तू बता रहा था न — ज़हरीली मिट्टी।"

मैं उसके सामने बैठ गया। वहीं, जलती अलमारी के पास, गरम ज़मीन पर।

"गुड़िया।"

"हाँ।"

"तू बारह साल की है।"

"तो क्या हुआ?"

मैं हँसा। हँसी नहीं आ रही थी, पर आई। गले से फूटी, धुएँ के साथ।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस — अब तू मेरी साथी है।"

"पहले से थी," वो बोली। "तू बस देखता नहीं था।"

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