Spirit of a Fighter – Chapter 111
वो उठी नहीं। मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया। उसके हाथ ठंडे थे। बहुत ठंडे। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पहले कुछ नहीं था। फिर कुछ आया। फिर पानी।
"तू ज़िंदा है," उसने कहा। बस इतना। जैसे यही एक बात बची थी जो उसे पूछनी थी।
"माँ, ये किसने—"
"दो आदमी आए थे।" उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे घंटों से बोली न हो। "काले कपड़े। बोले — भैरव सर का हुक्म है। जो चीज़ें तेरे आदमी की हैं, वो सब जलाओ। और जब तेरा बेटा लौटे, तो उससे कहना — हिसाब बराबर करने आएगा।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"उन्होंने तुझे कुछ किया?" मेरी आवाज़ काँप रही थी। "माँ, बता, उन्होंने—"
"मुझे नहीं छुआ।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियों में राख लगी थी। "पर एक बात कही जो मेरी समझ में नहीं आई। बोले — भैरव सर ने कहा, पहलवान का पानी तैयार है, बस आदमी का इंतज़ार है।"
मेरी मुट्ठी कस गई। मैंने कालू काका की तरफ़ देखा — वो दौड़कर आ चुके थे, हाँफते हुए, और उन्होंने मेरी आँखों में वही बात देखी जो मैं सोच रहा था।
"वो मुझे बुला रहा है," मैंने कहा। "सीधा बुला रहा है।"
"वीर, ये जाल है—"
"मुझे पता है।" मैंने अँगूठी घुमाई। इस बार वो ठंडी थी। "पर अब मेरे पास जाल में घुसने का कारण है।"
माँ ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में थाम लिया। उनके हाथ अब भी ठंडे थे, पर उनमें वो ज़ोर था जो सिर्फ़ माँ के हाथों में होता है।
"मैंने एक बेटा खोया है," उसने धीरे से कहा। "दूसरा नहीं खोऊँगी।"
"नहीं खोएगा।" मैंने उसके हाथ चूमे। "पर माँ, अब मुझे जाना है। दोपहर को। पीपल के नीचे।"
वो समझ गई। पूरी बात नहीं बताई, फिर भी समझ गई। उसने मेरा माथा चूमा, और हट गई।
मैं उठा। पलटा। और सामने मीरा खड़ी थी।
वो हाँफ रही थी। शायद दौड़कर आई थी। टिंकू उसके पीछे था। उसने आग देखी, मेरी माँ को देखा, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मैंने सोचा… मैंने सोचा कि—" वो रुक गई।
"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा। "सब ठीक है।"
वो मेरे पास आई। बहुत पास। और मेरी कलाई पकड़ ली।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। बर्फ़ जैसी नहीं — बल्कि उस तरह की ठंडी जैसे किसी ने डर के मारे हाथ धो लिए हों और सुखाना भूल गया हो। और मुझे अपनी धड़कन सुनाई दी — कानों में, ज़ोर से, जैसे ढोल।
"मीरा—"
"चुप।" उसने कसकर पकड़ा। "बस एक मिनट।"
मैं चुप हो गया। हम दोनों वहीं खड़े रहे, जलती आग के पास, और मैंने उसकी साँस को धीमा होते महसूस किया। उसकी पकड़ ढीली पड़ी, फिर फिर कसी।
"मैंने सुना," वो धीरे से बोली। "रास्ते में। मैंने सुना कि भैरव ने किसी को भेजा है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "उसने कहा — अगले महीने वाला पहलवान। मतलब वो अभी भी किसी को मारने वाला है। किसी नए को। किसी ऐसे को जो अभी अखाड़े में नहीं आया। वो रुका नहीं है, वीर। वो हमें रोकने के लिए नहीं रुका। वो अपना काम कर रहा है।"
मैंने उसकी बात को पचाया। और तभी मेरी नज़र उसकी कलाई पर गई।
वहीं, जहाँ भैरव ने पकड़ा था। लाल निशान। पर अब वो निशान और गहरा हो गया था। और उसके बीच में, ठीक बीच में, एक गोल छाप थी। चौड़ी। मोटी। जैसे किसी आदमी की अँगूठी की छाप। और वो छाप मेरी हथेली के नीचे आ गई थी जब मैंने उसे पकड़ा था।
मैंने अपनी हथेली पलटी।
उस पर वही निशान था। लाल। गरम। जैसे किसी ने अभी पकड़कर छोड़ा हो।
और उस पल मुझे समझ आया — भैरव ने मीरा को नहीं पकड़ा था। भैरव ने मुझे पकड़ा था। मेरी उँगली पर पहनी अँगूठी से। मेरे पापा की अँगूठी से। और वो अँगूठी मुझे जानती थी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
॥
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
उसकी आँखें मेरी हथेली पर टिकी थीं। वो लाल निशान। वो गोल छाप। और उसके चेहरे पर जो भाव आया, वो डर नहीं था। वो कुछ और था। जैसे किसी ने उसके सामने एक पुराना दरवाज़ा खोल दिया हो जिसे वो बरसों से ढूँढ रही थी।
"ये निशान…" उसने धीरे से कहा। "ये अँगूठी का है।"
"हाँ।"
"किसकी अँगूठी?"
मैंने अपनी उँगली उठाई। चाँद की रोशनी उस पर पड़ी और पत्थर में कुछ चमका — हल्का, पीला, जैसे दूध में हल्दी घुली हो।
मीरा ने देखा और उसकी साँस रुक गई।
"मेरे पापा की अँगूठी," मैंने कहा। "रघुवीर की। कालू काका ने आज दी।"
वो पीछे हटी। एक कदम। फिर रुकी। फिर वापस आई और उसने अपनी कलाई मेरे सामने की।
"तो ये निशान मेरी कलाई पर कैसे आया?"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि जवाब मेरे पास भी नहीं था।
नीम के पत्ते हवा में हिल रहे थे। कुएँ की तरफ़ से ठंडी हवा आ रही थी, जिसमें मिट्टी और पुरानी लकड़ी की गंध थी। मैंने उस गंध को पहचाना। वो तहखाने वाली गंध थी। पर आज उसमें कुछ और भी था।
धुआँ। जला हुआ काग़ज़।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम यहाँ कैसे आई? इतनी रात को?"
"तुम्हारे घर गई थी। तुम्हारी माँ ने बताया कि तुम नीम के नीचे हो।" उसने अपनी आवाज़ नीची की। "मुझे तुमसे कुछ बताना है। और ये फ़ोन पर नहीं हो सकता था।"
वो नीम की जड़ पर बैठ गई। मैं भी बैठ गया। हम दोनों के बीच एक हाथ का फ़ासला था, और उस फ़ासले में चाँद की रोशनी गिर रही थी।
"तुम्हारे अखाड़े का पानी," उसने शुरू किया। "मैंने उसे लैब भेजा था। दो हफ़्ते पहले। अपने कॉलेज के एक दोस्त के ज़रिए, बिना नाम बताए।"
"और?"
"और रिपोर्ट आई है।" उसने अपने बैग से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। "उसमें एक चीज़ है जो पानी में नहीं होनी चाहिए। एक तरह का रसायन। बहुत कम मात्रा में, पर है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये चीज़ शरीर को तुरंत ताकत देती है। पहले दो-तीन हफ़्ते में आदमी खुद को शेर समझने लगता है। पर अंदर से वो खोखला होता जाता है। जोड़ सूखते हैं, साँस छोटी होती जाती है, और फिर एक दिन…"
वो रुकी।
"फिर एक दिन क्या?" मैंने पूछा।
"फिर दिल रुक जाता है। अचानक। बिना किसी वजह के।" उसने रिपोर्ट मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसे 'दिल का दौरा' लिखा जाता है। कोई शक नहीं करता।"
मैंने रिपोर्ट नहीं पढ़ी। मुझे पढ़ने की ज़रूरत नहीं थी। मुझे वो गंध पहले से पता थी। जो पानी मैंने पिछले कई महीनों में सैकड़ों बार सूँघा था, हर पहलवान के पसीने में, हर गिलास के किनारे पर, हर मिट्टी के नीचे।
"उस पानी में कुछ कड़वा है," मैंने कहा। "मुझे पता है।"
मीरा ने सिर उठाया। "तुम्हें कैसे पता?"
मैं चुप हो गया।
ये वो सवाल था जिससे मैं बचता आया था। हर बार। हर किसी से। बचपन में एक बार बताया था — गाँव के लड़कों को, और वो मुझे "कुत्ता" कहकर चिढ़ाने लगे थे। मेरी माँ ने उस दिन मुझे गले लगाया था और कहा था — "जो चीज़ ऊपरवाले ने दी है, उसे किसी को दिखाना मत। लोग उसे ताकत नहीं समझते। वो उसे बीमारी समझते हैं।"
पर मीरा सामने बैठी थी। रिपोर्ट हाथ में लिए। और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने किसी और में नहीं देखी थी। मुझे वो चीज़ नहीं दिख रही थी जो मैं डरता था — हँसी नहीं, मज़ाक नहीं। बस एक सीधा सवाल।
"तुम्हें कैसे पता, वीर?" उसने फिर पूछा। इस बार धीरे से।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली। अँगूठी उस पर चमक रही थी। मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। नीम के पत्तों को देखा।
"क्योंकि मैं सूँघ सकता हूँ," मैंने कहा। "बहुत तेज़। जानवरों जैसा नहीं — उससे भी तेज़। मैं किसी के पसीने से बता सकता हूँ कि वो कल कितना थका था। मैं मिट्टी से बता सकता हूँ कि उस पर किसका पैर पड़ा था। और उस पानी में जो डाला है — वो मैंने हर उस आदमी की साँस में सूँघा है जो उसे पीकर अखाड़े में उतरा।"
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