Spirit of a Fighter1117 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1117

7 min read November 5, 2026

"ज़िंदा है," जगत सिंह ने कहा। "और भागता फिर रहा है, बीस साल से। हर शहर में, हर गाँव में, हर मेले में। क्योंकि जिस दिन वो रुकेगा, उस दिन ठाकुर और भैरव उसे मार डालेंगे।"

"पर वो तो उन्हीं के साथ था," टिंकू ने कहा। "जो साथ हो, वो क्यों भागे?"

जगत सिंह ने अपना सिर उसकी आवाज़ की तरफ़ घुमाया, और उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान आई। "तू कौन है, बेटा?"

"मैं टिंकू हूँ," टिंकू ने कहा। "वीर का दोस्त। और मिठाई बनाता हूँ।"

"मिठाई," जगत सिंह ने कहा, और उसकी आवाज़ में गर्माहट आ गई। "भवानी को भी मिठाई बहुत पसंद थी। खासकर गुड़ की।" उसने फिर गंभीर होकर कहा, "बेटा, दुनिया में सबसे ज़्यादा खतरनाक वो आदमी होता है जो अपने ही लोगों से डरने लगे। दयाराम ने भवानी को धोखा दिया, पर वो करना नहीं चाहता था। ठाकुर ने उसके बच्चों को उठा लिया था। उसने सोचा, एक आदमी की जान बचा लूँगा तो बच्चे बच जाएँगे। पर फिर भवानी मरा, और दयाराम समझ गया कि वो एक बहुत बड़ी गलती कर चुका है।"

"तो वो भाग गया," मैंने कहा।

"नहीं, वो भागा नहीं," जगत सिंह ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक सख्त हो गई। "उसने पहले मुझे खोजा।"

वो चुप हो गया। मैंने देखा कि उसके होंठ काँप रहे हैं, और उसकी बंद आँखों के नीचे की त्वचा सिकुड़ रही है।

"वो मेरे पास आया, बीस साल पहले, भवानी की मौत के तीन दिन बाद। उसने मेरे हाथ पकड़े और कहा — 'जगत, मैंने भवानी को बचाने की कोशिश की, पर मेरे बच्चे… मेरे बच्चे…' और फिर वो रोया। बहुत रोया। उस रात मैंने उसकी आवाज़ में सच्चाई सुनी — पहली बार, बीस साल की दोस्ती में।"

"फिर क्या हुआ?" मीरा ने पूछा, और उसकी आवाज़ धीमी थी।

"फिर मैं अंधा हो गया," जगत सिंह ने कहा, और उसने अपना काला कपड़ा छुआ। "उसी रात। कोई मेरी आँखों में कुछ डाल गया — किसने डाला, मैं नहीं जानता। ठाकुर के आदमी थे, या भैरव के, या… किसी और के। पर सुबह जब मैंने आँखें खोलीं, दुनिया अंधेरी थी। और दयाराम गायब था। वो समझ गया था कि अब मेरे पास रहना उसके लिए भी खतरनाक है, मेरे लिए भी।"

मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। "तो वो अब भी भाग रहा है। बीस साल से।"

"भाग नहीं रहा," जगत सिंह ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में कुछ और था — नरमी, और एक अजीब-सी इज़्ज़त। "वो जान-बूझकर भाग रहा है। क्योंकि जब तक वो ज़िंदा है और ठाकुर को पता है कि वो ज़िंदा है, ठाकुर उसे मारने में लगा रहेगा। और जब तक ठाकुर उसे मारने में लगा है, वो तेरे पीछे कम पड़ेगा।"

मेरी साँस रुक गई।

"दयाराम तेरे पापा के लिए चारा बना हुआ है," जगत सिंह ने कहा, और उसकी आवाज़ भर आई। "बीस साल से। वो अपनी जान देकर भवानी के बेटे को बचा रहा है — एक ऐसे बेटे को, जिसे वो कभी देख भी नहीं पाया।"

टिंकू ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पानी था।

"बेटा," जगत सिंह ने कहा, और उसने अपना हाथ बढ़ाकर मेरा घुटना टटोला, "तेरे पापा ने आख़िरी साँस तक यही कहा था — 'दयाराम को बचा लेना, वो बुरा नहीं है, बस डरा हुआ है।'"

मेरी आँखों से पानी बहने लगा। मैंने उसे पोंछा नहीं। मैंने बस अपना सिर नीचे किया और उन बूढ़े हाथों को अपने घुटने पर महसूस किया, जो इतनी कहानियाँ जानते थे और इतने साल चुप रहे थे।

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। दूर कहीं एक पक्षी बोला, और फिर सब चुप।

फिर मीरा ने धीरे से कहा, "जगत काका, अगर दयाराम हमें ढूँढना चाहता है, तो वो कैसे आएगा? हमें उस तक कैसे पहुँचना है?"

जगत सिंह ने अपना सिर उठाया। "वो खुद आएगा, जब वक़्त आएगा। पर तुम उसे पहचान नहीं पाओगे — वो भेस बदलता है। कभी फकीर, कभी बावर्ची, कभी मुंशी। पर एक चीज़ कभी नहीं बदलता — उसकी जेब में गुड़ रहता है। और वो हमेशा तंबाकू खाता है।"

"तो आज भट्ठे पर वही था," मैंने कहा। "वही चिट्ठी छोड़ गया।"

"हाँ," जगत सिंह ने कहा। "और वो चिट्ठी उसने तुम्हें डराने के लिए नहीं छोड़ी। वो चिट्ठी उसने इसलिए छोड़ी कि तुम उसके पास आ सको। वो तुम्हें बुला रहा है, वीर। बीस साल की चुप्पी के बाद, पहली बार, वो खुद बोलना चाहता है।"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। "कब? कहाँ?"

"जब वक़्त आएगा, वो खुद बताएगा," जगत सिंह ने कहा। "पर एक बात याद रख — उससे मिलने जाना, पर अकेले मत जाना। और उससे ऐसे मिलना जैसे कोई भाई मिलता है, दुश्मन नहीं। क्योंकि अगर तू उस पर चिल्लाएगा, तो वो फिर भाग जाएगा। और अगर वो भाग गया, तो तेरे पापा का आख़िरी सपना अधूरा रह जाएगा।"

मैंने सिर हिलाया। "मैं समझ गया।"

जगत सिंह उठे, अपनी लाठी टेकी, और अंदर कुटिया में गए। कुछ देर बाद वो लौटे, हाथ में एक छोटा-सा पीतल का डिब्बा लिए। उसने वो मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये दयाराम ने मुझे दिया था, बीस साल पहले," उन्होंने कहा। "कहा था — 'जिस दिन भवानी का बेटा आए, उसे दे देना।' मैंने सोचा था, वो बेटा कभी नहीं आएगा। पर आज तू आ गया।"

मैंने डिब्बा खोला। उसमें एक छोटी-सी चिट्ठी थी, मुड़ी हुई, पुरानी, पीली। और उसके नीचे एक चाँदी की अंगूठी — छोटी, महिलाओं की, जिस पर वही निशान था जो मैंने माँ की अलमारी में मिली अंगूठी पर देखा था।

मैंने चिट्ठी खोली। अक्षर घुमावदार थे, किसी पढ़े-लिखे आदमी के। बस दो लाइनें थीं।

"वीर, तेरे पापा ने मुझे माफ़ कर दिया था। अब तू भी कर दे। मुझे मिलना है तुझसे — पर मैं खुद नहीं आ सकता। तू मुझे ढूँढ। जगह तेरी माँ जानती है।"

मैंने चिट्ठी मीरा को दी। उसने पढ़ी और उसका चेहरा कठोर हो गया।

"माँ जानती है?" उसने धीरे से कहा। "पर माँ तो अभी भी बेहोश हैं, वीर। उन्होंने कोठे से लौटकर एक शब्द नहीं बोला।"

मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।

"तो ये चिट्ठी पुरानी है," मैंने कहा। "ये उसने तब लिखी थी जब माँ जानती थीं। पर आज माँ को कुछ नहीं पता।"

"या फिर," मीरा ने कहा, और उसने मेरी तरफ़ देखा, "माँ जानती हैं, और हमें नहीं बता रहीं।"

जगत सिंह ने अचानक अपना हाथ उठाया, और उनके चेहरे पर कुछ बदल गया। उन्होंने अपना सिर घुमाया, और उनकी नाक हवा में हिली, जैसे कुछ सूँघ रहे हों।

"कौन है?" मैंने फौरन पूछा।

"कोई नहीं," उन्होंने कहा, पर उनकी आवाज़ में संदेह था। "बस हवा। पर बेटा, एक बात सुन ले।" उन्होंने अपना सिर मेरी तरफ़ किया, और उनकी बंद आँखों के नीचे की त्वचा कस गई।

"क्या?"

"दयाराम के पास वो असली फोटो नहीं है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी और भारी थी। "जो फोटो उसने गोकुल को दी थी, वो नकली है। असली फोटो तो तेरे पास है — तेरी माँ ने उसे कभी किसी को नहीं दिया, क्योंकि वो उसे तेरे बचपन में तेरी रज़ाई में सिल दिया था।"

मैं सन्न रह गया।

मेरी रज़ाई। वो पुरानी, फटी हुई, जिसमें बचपन में मैं सोता था और जिसे माँ आज भी संदूक में रखती है। वो रज़ाई जिसे मैंने सालों से नहीं खोला — क्योंकि उसमें से माँ की गंध आती थी, और मैं उस गंध को खोना नहीं चाहता था।

मेरे हाथ काँपने लगे।

"रज़ाई," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ टूट गई। "माँ की रज़ाई।"

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ मज़बूत थी, और उसमें वो ज़िद थी जो मुझे सबसे ज़्यादा चाहिए थी।

"तो चल," उसने कहा। "घर चलते हैं।"

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