Spirit of a Fighter – Chapter 1116
"बचाने के लिए?" टिंकू ने कहा, और उसकी भौंहें चढ़ गईं। "भाई, चिट्ठी में तो साफ़-साफ़ लिखा है कि मेरा भाई मुझे मारेगा। इसमें बचाना कहाँ है?"
"लिखने वाला जानता था कि वो मरने वाला है," मीरा ने कहा, और उसने चिट्ठी मोड़ दी। "इसीलिए उसने अपना नाम नहीं लिखा, बस इतना लिखा कि हत्यारा भाई है। अगर वो सचमुच बदला लेना चाहता, तो नाम लिख देता। एक शब्द में सब खत्म हो जाता। पर उसने नहीं लिखा। क्यों?"
मैंने सोचा। मेरे सिर में दर्द अभी भी था, पर अब वो धीमा था, जैसे कोई दूर से ढोल बजा रहा हो।
"क्योंकि उसे डर था कि अगर नाम लिखा, तो जो भी ये चिट्ठी पढ़ेगा, वो उसी को मार डालेगा," मैंने धीरे से कहा। "बिना सोचे-समझे। बिना सबूत के।"
"और भवानी जी ऐसा नहीं चाहते थे," मीरा ने कहा। "वो चाहते थे कि सच पहले साबित हो, फिर सज़ा मिले। इसीलिए उन्होंने बिशन काका से कहा था — 'नाम तभी बताना जब अंगूठी और हड्डियाँ साथ हों।'"
बिशन ने अपना सिर झुका लिया। उसकी आँखें भर आई थीं। मैंने पहली बार देखा कि उस बूढ़े आदमी ने बीस साल कैसे काटे होंगे — किसी को कुछ न बताकर, हर रोज़ ये जानकर कि सच उसके पेट में आग की तरह जल रहा है, और वो बोल नहीं सकता।
"बिशन काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ नरम थी, "आप जगत सिंह को जानते हैं?"
वो चौंका। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो डर नहीं था — उम्मीद थी, और शायद थोड़ी शर्म।
"जगत सिंह," उसने दोहराया, जैसे नाम बहुत पुरानी अलमारी से निकाला हो। "तुम उसे जानते हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर भवानी जी की किताब में उसका नाम आया। और अब मुझे लगता है कि वही आख़िरी आदमी है जो सच का पूरा ताला खोल सकता है।"
बिशन ने अपने हाथ जोड़ लिए, जैसे किसी मंदिर में खड़ा हो। "जगत सिंह भवानी का सबसे पुराना साथी था। पर वो अंधा हो गया, बीस साल पहले। आँखें चली गईं। भवानी की मौत के बाद वो गाँव छोड़कर जंगल के उस पार चला गया। कोई उसे नहीं ढूँढता। कहते हैं वो अब भी वहीं रहता है, एक टूटी कुटिया में, और अपनी बीवी की कब्र के पास बैठा रहता है।"
"अंधा?" टिंकू ने कहा, और उसका मुँह खुला रह गया। "भाई, अंधे आदमी के पास क्या सच होगा? वो तो देख ही नहीं सकता।"
"टिंकू," मैंने कहा, और मैं मुस्कुराया — पहली बार उस सुबह। "कुछ आदमी आँखों से नहीं, कानों से देखते हैं। और कुछ, दिल से।"
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की और बोला, "अच्छा। तो मैं भी कल से अंधा बन जाता हूँ, फिर मुझे भी सच दिखने लगेगा।"
मीरा हँसी। एक छोटी-सी हँसी, जो उसके होठों के कोने पर रुक गई, पर वो हँसी थी। और उस हँसी में उस सुबह की सारी थकान कुछ पल के लिए हल्की हो गई।
हम चल पड़े।
जंगल का रास्ता पतला था, और दोनों तरफ़ ऊँचे सागौन के पेड़ थे। मीरा आगे चल रही थी, उसका बैग कंधे पर टिका था, और बिशन मेरे बराबर। टिंकू सबसे पीछे था, और मुझे पता था कि वो हर दस कदम पर पलटकर देख रहा है, कि कोई पीछे तो नहीं आ रहा।
रास्ते में मैंने बिशन से पूछा, "काका, एक बात साफ़ करो। दयाराम कौन था?"
बिशन का कदम एक पल के लिए रुका, फिर चलने लगा। "दयाराम भवानी का मुंशी था। हिसाब-किताब रखता था, चिट्ठियाँ लिखता था, पंचायत के काग़ज़ संभालता था। भवानी उस पर आँख बंद करके भरोसा करता था। पर दयाराम डरपोक था। बहुत डरपोक। और ठाकुर को यही चाहिए था — एक डरा हुआ आदमी जो अंदर से सब जानता हो और बाहर से कुछ न बोले।"
"तो उसने भवानी को धोखा दिया?"
"उसने धोखा नहीं दिया," बिशन ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी नरमी थी। "उसने हार मान ली। बीच में फँस गया। ठाकुर ने उसके बच्चों को उठा लिया था — मैंने खुद सुना था, रात को भवानी रो रहा था, कह रहा था 'दयाराम, तूने मेरे साथ ये क्यों किया,' और दयाराम बस काँप रहा था, एक शब्द नहीं बोल रहा था।"
मैंने गहरी साँस ली। नहर की गंध दूर से आ रही थी, और उसमें घास की भीनी-भीनी महक मिली हुई थी। मुझे अचानक अपने पापा की तस्वीर याद आई — वो फोटो जो बचपन में मैंने उनके हाथ में देखी थी, जिसमें वो किसी के कंधे पर हाथ रखे खड़े थे। क्या उस फोटो में दयाराम था?
कुटिया जंगल के उस पार थी, जहाँ पेड़ कम हो गए और ज़मीन ढलान पर उतरने लगी। सामने एक छोटा-सा टीला था, और उसकी गोद में एक कुटिया, जिसकी छत पर सूखी घास पड़ी थी। बाहर एक चबूतरा था, और चबूतरे पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था — सफ़ेद दाढ़ी, पीली धोती, और आँखों पर पुराना काला कपड़ा बँधा हुआ।
वो हमारे कदमों की आवाज़ सुनकर भी नहीं हिला। बस उसने अपना सिर थोड़ा सा घुमाया, जैसे हवा की दिशा पकड़ रहा हो।
"बहुत लोग आए हैं," उसने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी, पर साफ़, जैसे पुरानी लकड़ी की अलमारी खुलने की आवाज़। "तीन… नहीं, चार। और एक तो बहुत थका हुआ है। उसकी साँस भारी है।"
मैं रुक गया। बिशन ने मेरी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर मुस्कान थी — पहली बार।
"जगत काका," बिशन ने कहा, और उसकी आवाज़ भर आई। "मैं हूँ। बिशन।"
बूढ़े का हाथ उठा। वो धीरे से चबूतरे से उतरा, अपनी लाठी टटोली, और फिर सीधा बिशन की तरफ़ बढ़ा। उसने बिशन का चेहरा दोनों हाथों से छुआ — माथा, गाल, ठुड्डी — और फिर उसकी आँखों से पानी बहने लगा।
"बीस साल," उसने कहा। "बीस साल बाद तू आया। मुझे लगा तू भी मर गया।"
"मैं ज़िंदा हूँ," बिशन ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "बस डरा हुआ हूँ।"
"डर तो मैं भी हूँ," जगत सिंह ने कहा, और वो हँसा — एक छोटी-सी, कर्कश हँसी। "अंधे आदमी को और क्या डराएगा?"
फिर उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया, और मेरी तरफ़ मुँह किया। उसकी नाक हवा में हिली, धीरे-धीरे, जैसे कोई कुत्ता रास्ता पकड़ता हो — नहीं, मुझे ये सोचकर शर्म आई, पर सच यही था। वो सूँघ रहा था।
"तू आ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मेरे पैरों को ज़मीन से चिपका गया। "तू भवानी का बेटा है। तेरी गंध में भवानी की मिट्टी है।"
मैं उसके पास गया। उसने मेरा सिर छुआ, मेरे कंधे टटोले, और फिर मेरे हाथ पकड़कर कुछ देर चुप खड़ा रहा।
"तेरे हाथ कड़े हैं," उसने कहा। "बहुत कड़े। तू मेहनत करता है। भवानी के हाथ भी ऐसे ही थे — चक्की और मिट्टी से।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
जगत सिंह ने मुझे चबूतरे पर बैठाया और खुद मेरे सामने बैठ गया। उसने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई।
"अब बता," उसने कहा। "क्या जानना है?"
मैंने सीधा पूछा, "दयाराम कहाँ है?"
जगत सिंह एक पल के लिए चुप हो गया। उसकी उँगलियाँ लाठी पर कस गईं। फिर उसने अपना सिर हिलाया, धीरे-धीरे, जैसे कोई पुराना हिसाब जोड़ रहा हो।
"दयाराम," उसने कहा, और नाम उसके मुँह से ऐसे निकला जैसे किसी पुराने घाव से पट्टी खुल रही हो। "दयाराम ही वो आदमी है जिसकी गंध तूने भट्ठे पर पकड़ी। तूने सही पकड़ा — तंबाकू और गुड़ की चाशनी। दयाराम हमेशा तंबाकू खाता था और हमेशा अपनी जेब में गुड़ रखता था। कहता था, 'मुँह मीठा रहे तो दिल मीठा रहता है।' झूठा आदमी था।"
"तो वो ज़िंदा है?" मीरा ने आगे बढ़कर पूछा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno