Spirit of a Fighter1115 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1115

7 min read November 5, 2026

हम पलटे। भट्ठे की लाल ईंटों की दीवार पर, उँगली से, किसी ने कुछ लिखा था। मिट्टी से, गीली मिट्टी से। अक्षर अभी भी गीले थे, और उनसे पानी की बूँदें नीचे रिस रही थीं।

"जग्गू का परिवार सुरक्षित है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और उसका मुँह खुला रह गया।

"भाई," उसने कहा, "ये तो हमने अभी किया है। चंपा और बच्चे, वो तो अभी-अभी शहर से आए हैं, माँ के पास बैठे हैं। ये किसी ने पहले से कैसे लिख दिया?"

मेरी रीढ़ के साथ ठंडक दौड़ गई। मैंने लिखाई गौर से देखी। अक्षर टेढ़े-मेढ़े थे, जल्दी में लिखे हुए, जैसे किसी ने भागते-भागते लिखा हो।

"कोई हमें देख रहा है," मीरा ने कहा, और उसने अपना बैग सीने से लगा लिया। "कोई हमारे साथ चल रहा है।"

मैं पलटा। जंगल के किनारे, टीले के पीछे, कुछ हिला। एक परछाई। बस एक परछाई, जो झाड़ियों के बीच से निकली और फिर उसी में घुल गई।

मैं दौड़ा नहीं। मेरे पैर भारी थे, सिर में दर्द ठहरा हुआ था, और मैं जानता था कि आज रात और दौड़ने से मेरा काम नहीं बनेगा। मैं बस खड़ा रहा, और हवा की तरफ़ मुँह करके गहरी साँस ली।

हवा में एक आवाज़ थी। हल्की, लगभग फुसफुसाहट, जैसे किसी ने दूर से कोई बात कही हो और हवा उसे मेरे पास ले आई हो।

"वीर सिंह, तेरे पापा ने मुझे भी धोखा दिया था।"

मेरी मुट्ठी कस गई। मैंने डंडा ज़मीन से टिकाया और उस पर टेक लगाकर खड़ा रहा।

"भाई," टिंकू ने धीरे से कहा, "तू ठीक है?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा चाँदनी में सफ़ेद लग रहा था, और उसकी टोपी फिर झुक गई थी।

"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा। "पर वो जो बोला — 'तेरे पापा ने मुझे भी धोखा दिया था' — उसमें कुछ है। अगर वो सच बोल रहा है, तो किताब का एक पन्ना अभी भी बंद है। और वो पन्ना पढ़ने के लिए हमें उस आदमी से मिलना होगा जिसे सब भूल गए।"

हम चल पड़े। रास्ते में बिशन मेरे पास आया और उसने धीरे से कहा, "वीर, एक बात बता। तेरे पापा ने तुझे कभी अपने भाई का नाम लेकर बुलाया था?"

मैंने याद किया। सिर्फ़ बचपन की एक तस्वीर आई — पापा के हाथ में एक फोटो, और उनकी आँखों में पानी। पर नाम, नहीं। मैंने सिर हिलाया।

"तो वो नाम तू पहली बार सुन रहा है," बिशन ने कहा। "और वो पहला नाम है जो तेरे पापा ने कभी नहीं फुसफुसाया। इसीलिए वो तेरे लिए सबसे भारी है।"

मीरा मेरे बराबर चल रही थी। उसने कुछ देर चुप रहने के बाद मेरी तरफ़ देखा और कहा, "तू उस नाम को अपने अंदर मत रख। मुझे बता।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो नाम अकेले पता हो, वो ज़हर की तरह चढ़ता है," उसने कहा। "और मैं तुझे अकेले ज़हर चढ़ने नहीं दूँगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। सुबह की पहली किरण आसमान के किनारे पर फैल रही थी, और उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी आँखों में नींद नहीं थी, थकान नहीं थी — बस एक ज़िद थी, जो मेरे सीने के अंदर वाली ज़िद से मिल रही थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर पहले जगत सिंह।"

हम गाँव की तरफ़ मुड़े, और मेरे दिमाग़ में एक ही किताब का वो नाम घूम रहा था, जो मैंने अभी पढ़ा था, और जो बीस साल से किसी ने नहीं बोला था।

और मेरी नाक में, अब भी, जंगल से आती एक और गंध थी — धीमी, मीठी, और एकदम नई। ऐसी गंध जो किसी मरे हुए आदमी के पास भी नहीं होनी चाहिए थी।

वो गंध किसी औरत के कपड़ों से आ रही थी। और उसमें गंगा देवी की गंध के टुकड़े थे।

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वो गंध किसी औरत के कपड़ों से आ रही थी। और उसमें गंगा देवी की गंध के टुकड़े थे।

मैंने एक पल भी नहीं सोचा। डंडा हाथ में था, और मैं उसी तरफ़ भागा जिधर वो परछाई झाड़ियों में घुली थी। भट्ठे की जली मिट्टी पैरों के नीचे चरमरा रही थी, और सुबह की ठंडी हवा मेरे चेहरे पर चाकू की तरह चल रही थी।

"वीर!" पीछे से मीरा की आवाज़ आई। पर मैं रुका नहीं।

टीले के पीछे जो जगह थी, वहाँ ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ थीं और बीच में एक सूखा नाला, जिसमें पिछली बारिश का पानी ठहरा हुआ था। मैं नाले के किनारे तक पहुँचा और फिर ठिठक गया।

कोई नहीं था।

बस झाड़ियाँ हिल रही थीं, धीरे-धीरे, जैसे किसी ने उन्हें पीछे से छुआ हो और फिर हाथ खींच लिया हो। मैंने नीचे देखा। गीली मिट्टी में पैरों के निशान थे — छोटे, पतले, औरत के जूतों के, जैसे हवेली में मिले थे। और उनके बगल में, एक झाड़ी की काँटे में उलझी हुई, एक चप्पल लटक रही थी।

एक ही चप्पल। दूसरी कहीं नहीं।

मैंने उसे उतारा। चमड़े की पुरानी चप्पल थी, सिलाई उधड़ी हुई, पर नई नहीं। और उसमें से एक गंध आ रही थी जो मेरे होश उड़ा गई — तंबाकू। ताज़ी तंबाकू, जैसे अभी-अभी किसी ने हथेली में रगड़कर मुँह में डाली हो।

मैंने चप्पल पलटकर देखी। तले पर कीचड़ था, और कीचड़ में कुछ लिखा हुआ — नहीं, खुदा हुआ। किसी नुकीली चीज़ से, जल्दी में। मैंने आँखें सिकोड़कर देखा।

एक ही शब्द था। "रुक।"

तभी पीछे से हाथ आया और मेरी कलाई पकड़ ली। मीरा थी। उसकी साँस फूल रही थी, और उसके माथे पर पसीने की बूँदें थीं, पर उसकी आँखें साफ़ थीं।

"तू ऐसे भागेगा तो हम सबको खो देगा," उसने कहा, और मेरी कलाई नहीं छोड़ी। "ये आदमी हमें भड़काना चाहता है। समझ नहीं रहा? वो चप्पल वहाँ जान-बूझकर रखी है। वो चाहता है कि तू अंधे की तरह दौड़े और गलती करे।"

पीछे से टिंकू और बिशन भी आ पहुँचे। टिंकू की टोपी इस बार नहीं झुकी थी, बल्कि उसने उसे दोनों हाथों से पकड़ रखा था, जैसे डर के मारे सिर को ही थाम लिया हो।

"भाई," उसने हाँफते हुए कहा, "मैं तो कह रहा था न, कि भट्ठे पर कोई न कोई भूत ज़रूर है। अब मान ले।"

"भूत नहीं है," बिशन ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ शांत थी, पर उसके होंठ काँप रहे थे। "इंसान है। और इंसान भूत से ज़्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि भूत को तो हम डर से बना लेते हैं, पर इंसान खुद अपने डर से बनता है।"

मैंने चप्पल मीरा की तरफ़ बढ़ा दी। "देख। तंबाकू की गंध है। और तले पर 'रुक' लिखा है।"

मीरा ने चप्पल ली, पलटी, और उसके चेहरे का रंग बदल गया। "ये तो कोई औरत पहनती है। पर तंबाकू… औरतें तंबाकू नहीं खातीं, वीर। गाँव में तो कोई औरत नहीं।"

"तो मतलब ये चप्पल उसकी नहीं है," मैंने कहा। "वो इसे उठाकर लाई है कहीं से। जान-बूझकर।"

हम वहीं नाले के किनारे बैठ गए। सुबह की रोशनी अब पूरी तरह फैल चुकी थी, और दूर गाँव के खेतों में किसी की आवाज़ गूँज रही थी, जो अपने बैलों को हाँक रहा था। आम दिन जैसा लग रहा था, पर मेरे अंदर सब कुछ उलटा-पुलटा हो रहा था।

मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से भवानी की वो चिट्ठी निकाली, जो बिशन ने हमें दी थी। उसने उसे खोला, धूप की तरफ़ करके रखा, और फिर धीरे-धीरे पढ़ने लगी।

"सुन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ बदल गया था। "मैंने इसे तीन बार पढ़ा है। बिशन काका ने जब पहली बार दिया था, तब मैंने देखा था कि इसमें कुछ लाइनें काटी हुई हैं। मैंने सोचा था कि जलने से मिट गई होंगी। पर नहीं। ये काटी हुई नहीं हैं।"

"तो?" मैंने पूछा।

"तो ये चिट्ठी दो तरह से पढ़ी जा सकती है," उसने कहा, और उँगली उस पंक्ति पर रखी जहाँ भवानी ने लिखा था कि उसे उसका ही भाई मारेगा। "भवानी जी ने ये चिट्ठी लिखी थी — ये तो पक्का है। पर किसके लिए? मैं सोचती थी कि ये ठाकुर को फँसाने के लिए है। पर अब लगता है, ये किसी को बचाने के लिए लिखी गई थी।"

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