Spirit of a Fighter – Chapter 1112
मैंने वो डंडा हाथ में लिया। वो ठंडा था और मेरी हथेली पर उसका जंग लगा हुआ खुरदुरापन अजीब सा लगा। जैसे मैंने किसी पुरानी चीज़ पर हाथ रखा हो जो सिर्फ़ मेरी ही राह देख रही थी।
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की — अबकी बार ठीक से, दोनों हाथों से, दोनों तरफ़ से।
"मैं चलता हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हिचक नहीं थी जो पहले थी, "पर एक बात पहले साफ़ कर लूँ। मैं मुक्का नहीं मार सकता। मुझे मुक्का मारना नहीं आता। मैं डर जाता हूँ। पर मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा, और अगर कोई पीछे से आया, तो उसके मुँह पर मैं अपनी पूरी मिठाई की टोकरी फेंक दूँगा। मेरी टोकरी भारी है।"
मैं हँसा। ज़ोर से। इस वक़्त अजीब लगा, पर हँसी रुकी नहीं। मीरा ने भी हँसी — छोटी सी, दबी हुई। गोकुल ने नहीं हँसी। वो बस हमें देख रहा था, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने बेटे को जवान होते देख रहा हो।
"तू भवानी का बेटा है," उसने धीरे से कहा। "बिलकुल। हँसी भी वही है।"
हम निकले। शहर के पुराने सिनेमा हॉल के पीछे वाली गली से बाहर निकले तो सड़क पर एक भी आदमी नहीं था। रात का तीसरा पहर था — वो वक़्त जब कुत्ते भी चुप हो जाते हैं। हवा में नमी थी, और दूर कहीं एक कुएँ से पानी निकालने की आवाज़ आ रही थी — चरखी की चीख। हम तीन चले, और गोकुल ने हमें रास्ता बताया — सिनेमा हॉल के पीछे से, सूखी नहर के किनारे-किनारे, जहाँ पुरानी ईंटों का ढेर पड़ा था।
मीरा मेरे बगल में चल रही थी। उसकी चप्पल की आवाज़ ज़मीन पर धीमी पड़ रही थी। और फिर, एक जगह, जहाँ रास्ता थोड़ा ऊँचा हो रहा था, उसने मेरा हाथ थाम लिया।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई जल्दी नहीं थी, "तुम्हारे पापा ने ये चिट्ठी इसलिए लिखी होगी कि कोई सच तक पहुँचे। और उन्होंने ये फोटो गोकुल को इसलिए दी होगी कि वो बीस साल बाद किसी के हाथ लगे। उन्हें पता था कि जो आदमी उन्हें मार रहा है, वो उनके अपने घर का है। इसलिए उन्होंने सब कुछ अपने घर के बाहर रखा। किसी और के हाथ में।"
मैंने उसकी बात सुनी। मेरे गले में कुछ अटक गया था।
"और वो कोई तुम हो," उसने कहा। "तुम्हारे पापा ने वो सब इसलिए नहीं छोड़ा कि कोई बदला ले। उन्होंने इसलिए छोड़ा कि कोई सच बोले। और वो कोई तुम हो।"
मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने उन्हें ज़ोर से बंद किया और फिर खोला। कोई आँसू नहीं निकला। बस गला भरा हुआ था, जैसे किसी ने उसमें मिट्टी भर दी हो।
"मुझे डर लग रहा है," मैंने कहा। और ये सच था। "डर लग रहा है कि अगर सच मिल गया और वो सच मेरे ही घर का निकला… तो मैं क्या करूँगा?"
मीरा ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
"तुम सच को अपनाओगे," उसने कहा। "जैसे तुमने मुझे अपनाया था। जब मैं तुमसे लड़ रही थी, तब भी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मैंने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली। इसलिए मैंने बस उसका हाथ कसकर दबा दिया।
हम चले। सूखी नहर खत्म हुई और सामने खुला मैदान आया — चारों तरफ़ ऊँची घास, और बीच में, बहुत दूर, एक टीले जैसी चीज़ जिसके ऊपर से धुआँ उठ रहा था। पतला धुआँ। जैसे किसी ने अभी-अभी आग बुझाई हो।
भट्ठा।
जैसे ही मैं उस टीले के करीब पहुँचा, मेरी नाक में गंध आई। जली मिट्टी। पर ये वो जली मिट्टी नहीं थी जो हवेली की आग के बाद आई थी। ये अलग थी — तेज़, कच्ची, जैसे अभी जली हो। इसके नीचे मिट्टी का तेल, और उसके नीचे… कुछ और।
मैं रुका। मैंने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। मेरी नाक फूल गई। मेरे कानों में सीटी बजने लगी। मैंने और गहरा खींचा।
और फिर मुझे वो मिला।
एक गंध जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघी थी। न पसीने की, न धुएँ की, न मिट्टी की। कुछ और। ऐसा जैसे कोई पुरानी ताकत हो जो अभी भी गरम हो। जैसे आग बुझने के बाद भट्ठे के अंदर बची रह जाती है।
मेरी नाक से एक बूँद टपकी। गरम। मैंने हाथ लगाया तो उँगली पर लाल लगा।
खून।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसका चेहरा सफ़ेद हो गया।
"वीर —"
"रुक," मैंने कहा। और मैंने आँखें बंद करके फिर से सूँघा। एक बार। दो बार।
"यहाँ कोई दूसरा आदमी है," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ सुनकर मुझे लगा कि ये आवाज़ मेरी नहीं है, "जो अभी-अभी गया है। मिट्टी के तेल की गंध उसके कपड़ों से आ रही है। और उसके पैरों के नीचे भट्ठे की राख लगी है।"
मैंने आँखें खोलीं। मीरा मेरी तरफ़ देख रही थी।
"वो ठाकुर नहीं है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी हो गई। "मैं ठाकुर की गंध जानता हूँ। ये कोई और है। ये कोई ऐसा है जो… जिसे मैं नहीं पहचानता।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी टोपी की छाया उसके चेहरे पर थी और उसके होंठ सिकुड़ गए थे।
"भाई," उसने कहा, "तो इसका मतलब क्या है? यहाँ एक और आदमी चक्कर लगा रहा है जिसे हम नहीं जानते? और वो अभी-अभी गया है?"
"हाँ," मैंने कहा। "और वो यहाँ कुछ ढूँढ रहा था। वो भट्ठे की मिट्टी खोद रहा था।" मैंने झुककर देखा — टीले के नीचे, बाईं तरफ़, मिट्टी ताज़ी खुदी हुई थी। और उस खुदी मिट्टी में पैरों के निशान थे। "देखो। वो यहाँ कुछ ढूँढ रहा था। और उसे वो मिल भी गया हो सकता है।"
मीरा ने वो जगह देखी। उसकी आँखें सिकुड़ गईं।
"अगर उसे कुछ मिल गया," उसने कहा, "तो क्या?"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। वहाँ भवानी की चिट्ठी थी, फोटो थी, काग़ज़ थे। और मुझे लगा कि जो कुछ उस आदमी को यहाँ मिला, वो मेरे पास जो है उससे ज़्यादा बड़ा है।
"तो मतलब," मैंने कहा, "ये रात खत्म नहीं हुई। ये शुरू हुई है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें गहरी हो गईं।
"वीर," उसने बहुत धीरे कहा, "तेरी नाक में खून आ रहा है।"
मैंने अपनी उँगली फिर मेरी नाक पर लगाई। अब सिर्फ़ एक बूँद नहीं थी। बह रहा था। मेरा सिर फटने लगा था — वो दर्द जो मुझे तब होता है जब मैं हद से ज़्यादा सूँघता हूँ। मैंने आँखें बंद कीं और दीवार का सहारा लिया। मेरे घुटने काँप रहे थे।
"रुक," मीरा ने कहा और उसने अपना बैग खोला। उसने अदरक-तुलसी की हरी शीशी निकाली, और एक साफ़ रूमाल, और उसने मेरी नाक पर दबाया। "साँस ले। धीरे।"
मैंने साँस ली। दर्द धीरे-धीरे कम हो रहा था, पर मेरे हाथ अभी भी काँप रहे थे। मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहा था और उसकी आँखों में वो डर था जो वो छिपा नहीं पा रहा था।
"भाई," उसने कहा, "तूने अपनी नाक बर्बाद कर दी।"
"हाँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बैठी हुई थी। "पर मुझे पता चल गया कि यहाँ कोई और आया था।"
मीरा ने रूमाल मेरी नाक से हटाया और देखा कि खून रुक गया है। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — वो मुझसे नाराज़ थी। नाराज़, पर डरी हुई भी।
"अगली बार," उसने कहा, "जब तुझे लगे कि तू हद से ज़्यादा सूँघ रहा है, तो मुझे बता देना। पहले।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं तेरी नाक पकड़ लूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ गुस्से में थी, पर उसके होंठ काँप रहे थे। "और तुझे रोक लूँगी। तू अकेले नहीं लड़ रहा है। ये बात अपने दिमाग़ में बैठा ले।"
मैंने उसे देखा। और मेरे सीने के अंदर कुछ ऐसा हुआ जो सिर्फ़ उसके होने से हुआ। कोई ताकत नहीं, कोई चमत्कार नहीं — बस एक सीधी सी बात। वो मुझे गुस्से में भी नहीं छोड़ रही थी।
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