Spirit of a Fighter – Chapter 1111
मैंने काग़ज़ निकाले। ज़मीन वाला काग़ज़। उस पर चार अंगूठों के निशान थे — दो बड़े, दो और भी बड़े। और नीचे एक हस्ताक्षर था। मैंने उसे पढ़ा।
"दयाराम।"
मेरा मुँह सूख गया।
"दयाराम," मीरा ने दोहराया। "ये नाम…"
"चंदा की डायरी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई जैसे पुरानी रस्सी। "चंदा की डायरी में भी यही नाम था। मैंने उसे पढ़ा था। वहाँ लिखा था — ज़मीन के काग़ज़ पर दस्तख़त कराने वाला आदमी दयाराम था, और वो…" मैंने आँखें बंद करके याद किया। वो डायरी मेरे दिमाग़ में घूम रही थी — पीली रोशनी, टेढ़ी लिखाई। "लिखा था कि दयाराम सबसे बड़े साज़िशकर्ता के लिए काम करता था।"
"तो दयाराम सिर्फ़ गवाह नहीं," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, "दयाराम उस गिरोह का आदमी है।"
गोकुल ने अचानक अपना सिर उठाया। उसके चेहरे पर वो शांति नहीं थी जो अभी थी। अब उसकी आँखों में कुछ जल रहा था।
"दयाराम," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी। "दयाराम मुंशी था। भवानी का मुंशी। ज़मीन, पट्टे, काग़ज़ — सब वो लिखता था। भवानी जब भी कहीं जाता, दयाराम साथ था।"
मेरे पैर के नीचे ज़मीन खिसक गई। मुंशी। मुंशीजी।
"मुंशीजी?" मैंने कहा। "वही मुंशीजी जो अखाड़े का हिसाब रखते हैं? जो उन्नीस पहलवानों की मौतें बीमारी लिखकर रिकॉर्ड में डालते रहे?"
"वही," गोकुल ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई जल्दी नहीं थी — बस एक बहुत पुरानी थकान थी। "वही दयाराम। जो आज मुंशीजी है। बीस साल पहले वो भवानी का हाथ था। और उससे पहले वो भवानी के बाप का। और उससे पहले… किसका था, ये तो सिर्फ़ वो जानता है।"
टिंकू ने अपनी टोपी फिर उतार दी। इस बार उसे पोंछा नहीं। बस हाथ में पकड़कर रह गया।
"भाई," उसने बहुत धीरे कहा, "मेरा दिमाग़ घूम रहा है। तेरे पापा के घर का आदमी उन्हें मारता है, और फिर वही आदमी तेरे घर के काग़ज़ लिखता है? वही आदमी तेरी माँ के सामने चाय पीता है? वही आदमी गाँव के उन्नीस जवानों की मौत पर 'बीमारी' लिखकर मुहर लगाता है?"
"हाँ," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ पत्थर जैसी सख़्त थी। "यही तो सबसे बड़ी चालाकी है। ठाकुर लाठी उठाता है, भैरव शीशी देता है, पर मुंशीजी कलम चलाते हैं। और कलम कभी नहीं पकड़ी जाती। क्योंकि जब लाश गिरती है, तो इल्ज़ाम लाठी पर आता है, कलम पर नहीं।"
मैंने उस काग़ज़ को फिर देखा। दयाराम के हस्ताक्षर के नीचे एक और छोटी लाइन थी जो मैंने पहले नहीं पढ़ी थी। मीरा ने भी देखा। उसने उसे पढ़ा और उसकी आँखें फैल गईं।
"गवाह — दयाराम," उसने पढ़ा। "वीर, ये गवाह के खाने में लिखा है। ये चौथे आदमी का दस्तख़त है। यानी जिस काग़ज़ पर ठाकुर और भैरव ने अंगूठे लगाए, उसे दयाराम ने गवाही देकर पक्का किया।"
"यानी?" मैंने पूछा, हालाँकि मुझे जवाब पता था।
"यानी ये काग़ज़ किसी भी अदालत में ठाकुर को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में अब डर नहीं था — एक चमक थी। "ये असली दस्तावेज़ है, वीर। ठाकुर की सारी चालाकी यहीं खत्म होगी।"
पर गोकुल ने सिर हिलाया। धीरे-धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी किसी जवान को ज़िंदगी का सबसे सख़्त सबक समझा रहा हो।
"बेटी," उसने कहा, "तू पढ़ी-लिखी है, तुझे काग़ज़ की कीमत पता है। पर एक बात सुन। ये फोटो, ये काग़ज़ — अदालत में तभी चलेगा जब कोई ज़िंदा आदमी खड़ा होकर कहे, 'हाँ, मैंने ये देखा था, मैं वहाँ था।' वरना वकील इसे भी उल्टा कर देगा। ठाकुर के पास करोड़ों का वकील है। वो कहेगा — ये काग़ज़ जाली है।"
"तो गवाह कौन होगा?" मीरा ने पूछा।
"दयाराम," गोकुल ने कहा, और उसका नाम ऐसे लिया जैसे कोई काँटा निकाल रहा हो। "वही इस काग़ज़ का गवाह है। और वही इसे जाली साबित कर सकता है।"
मैंने अपनी मुट्ठी भींची। मेरे हाथ के छाले फिर से खुलने लगे — वो पुराने छाले जो मज़दूरी और चक्की से आए थे।
"तो हमें मुंशीजी को ही लाना होगा," मैंने कहा। "अपना गवाह खुद पकड़कर लाएँगे।"
टिंकू ने अचानक एक अजीब सी आवाज़ की — आधी हँसी, आधी खाँसी।
"भाई," उसने कहा, "तूने कभी सोचा है कि मुंशीजी को हमने हवेली में क्यों बिठाया था? वो वहाँ बैठा था, अपने काग़ज़ संभाल रहा था, और हम सब उसे 'गवाह' बनाने की बात कर रहे थे। और वो…"
"वो क्या?" मैंने पूछा।
"वो तब से वहाँ नहीं है।" टिंकू ने कहा। "मैं हवेली से निकलते वक़्त देख रहा था। मुंशीजी की कुर्सी खाली थी। उसकी फ़ाइलें वहीं पड़ी थीं, खुली हुई। जैसे किसी ने जल्दी में छोड़ी हों।"
मेरे पेट में ठंडी सी एक लहर गई।
"तो वो भाग गया," मीरा ने कहा। "जब उसे पता चला कि हम फोटो और काग़ज़ लेकर लौट रहे हैं, तो वो भाग गया।"
"नहीं," मैंने कहा, और मुझे खुद हैरानी हुई कि मेरी आवाज़ कितनी साफ़ थी। "वो भागा नहीं। वो हमसे पहले यहाँ पहुँच गया है।"
सबने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?" गोकुल ने पूछा।
मैंने वो फोटो उठाई। उसे अपनी नाक के पास लाया। और फिर मैंने आँखें बंद करके गहरी साँस ली।
गंध आई। धूल। पुरानी गोंद जो सूखकर पीली पड़ गई थी — वो गोंद जो फोटो को एलबम में चिपकाने के लिए लगाई जाती है। और उसके नीचे, बहुत हल्की, बहुत गहरी एक और गंध — जली हुई मिट्टी। और… मिट्टी का तेल।
"ये फोटो," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "किसी ऐसी जगह रखी गई थी जहाँ धुआँ था और मिट्टी का तेल जलता था।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो पहचान थी जो तब आती है जब कोई राज़ खुलने वाला हो।
"भट्ठा," गोकुल ने अचानक कहा, और उसकी आवाज़ काँपी। "ये फोटो मुझे भवानी ने भट्ठे के पास दी थी। उस रात। जब वो मुझे भगा रहा था। हम भट्ठे के पीछे वाली झाड़ियों में छिपे थे। वहाँ से मिट्टी का तेल की गंध आ रही थी — क्योंकि उस वक़्त भट्ठे में पकाई जाने वाली ईंटों के लिए तेल डाला जा रहा था।"
मैंने फोटो को अपने सीने से लगा लिया। और मेरे अंदर कुछ जम गया — वो ठंड जो डर से नहीं आती, वो ठंड जो फ़ैसले से आती है।
"भट्ठा," मैंने कहा। "वहीं चलते हैं।"
"रुक।" मीरा का हाथ मेरी कलाई पर था। "अभी? अंधेरे में? वीर, वहाँ ठाकुर के आदमी हो सकते हैं।"
"तो होने दो," मैंने कहा। "मैं बीस साल से उस आदमी की गंध ढूँढ रहा हूँ जिसने मेरे पापा को मारा। आज मुझे एक गंध मिली है — अधूरी, टूटी हुई, पर मिली है। तू कहेगी कि रुक जा? मैं नहीं रुकूँगा।"
मीरा ने मेरी कलाई नहीं छोड़ी। उलटे उसने अपनी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँसा दीं।
"मैंने रुकने को नहीं कहा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "मैंने साथ चलने को कहा है। तू सुनता नहीं है क्या?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बालों की एक लट उसके माथे पर आ गई थी और वो हिल नहीं रही थी — हम दोनों की साँसें रुकी हुई थीं, इसलिए नहीं। मैंने उसे देखा और मुझे लगा कि मेरे अंदर का डर थोड़ा-सा छोटा हो गया।
"अच्छा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सिर्फ़ मेरी थी — कोई बहादुरी नहीं, कोई तमाशा नहीं। "तो चल।"
गोकुल दुकान के पीछे वाली अलमारी से एक लोहे का डंडा ले आया — पुराना, जंग लगा, पर भारी। उसने मुझे दिया।
"भवानी का था," उसने कहा। "बीस साल से रखा है। आज काम आएगा।"
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