Spirit of a Fighter – Chapter 1108
उसने मेरी तरफ़ देखा और जीप का दरवाज़ा खुला रह गया।
"जग्गू, काग़ज़ों के बारे में सब जानता है?"
करण की आँखें सिकुड़ीं। "हाँ। वो मेरे पिता का साथी था जब वो काग़ज़ छिपा रहे थे।"
"तो फिर," मैंने कहा, और मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, "वो काग़ज़ कहाँ हैं, ये जग्गू से पूछा क्यों नहीं?"
करण जीप के पास खड़ा हो गया। उसने जग्गू की तरफ़ देखा और जग्गू ने नीचे देख लिया। फिर करण ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि," और करण की आवाज़ अचानक भारी हो गई थी, "जग्गू ने मेरे पिता से ये बात मानी थी कि वो कभी उस जगह का नाम नहीं लेगा। बीस साल में एक बार भी नहीं लिया।"
मैंने जग्गू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा अब भी सफ़ेद था, पर उसकी आँखों में कुछ बदल रहा था। शायद वो चीज़ जो गिरे हुए आदमी की आँखों में आख़िरी पल में आती है।
और उसी रात, जब हम सब बैठे थे और जग्गू एक कोने में चुपचाप बैठा था, वो मेरे पास आया। बिना आवाज़ किए। उसने मेरा कंधा छुआ और मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाया।
"फोटो मेरे पास नहीं है।"
मैं हिल गया।
"जिस दिन मेरे हाथ कटे—"
वो रुका। उसने एक बार करण की तरफ़ देखा। फिर करण की तरफ़ देखकर वापस मेरे कान के पास झुका और अपनी आवाज़ और धीमी कर दी।
"जिस दिन मेरे हाथ कटे, मैंने वो फोटो अपने गाँव के एक आदमी को दी थी। और वो आदमी… भवानी का दूधभाई था।"
॥
"भवानी का दूधभाई," मैंने धीरे से दोहराया, और मेरी आवाज़ जग्गू के कान से टकराकर वापस मेरे ही पास लौट आई।
जग्गू ने सिर हिलाया। उसकी आँखें अंधेरे में चमक रही थीं, दो गीली गोलियाँ जैसी।
"गोकुल," उसने फुसफुसाया। "उसका नाम गोकुल है। भवानी का दूधभाई। जब मेरे हाथ कटे, मैंने वो तीनों काग़ज़ उसे सौंप दिए थे। अपने गाँव वापस नहीं जा सका, ठाकुर के आदमी पीछे थे। गोकुल ने मुझे एक रात में शहर भेज दिया।"
"और अब वो कहाँ है?" मैंने पूछा।
जग्गू कुछ देर चुप रहा। उसकी साँस सीटी जैसी आवाज़ कर रही थी, जैसे पुराना पंखा चल रहा हो।
"शहर के बाहर, पुराने सिनेमा हॉल के पीछे, एक टूटी हुई फोटो स्टूडियो है। 'गोकुल फोटो हाउस'। बीस साल से वहीँ बैठा है। दिन में शटर आधा खोलता है, शाम को बंद कर देता है। किसी से बोलता नहीं। बस फोटो छापता है।" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "पर वीर, वो काग़ज़ वहाँ नहीं हैं।"
मेरा पेट एक झटके से गिरा।
"क्या मतलब?"
"गोकुल ने काग़ज़ कभी घर में नहीं रखे। वो किसी और जगह छिपाता है। और वो जगह…" जग्गू ने गला साफ़ किया, "वो जगह सिर्फ़ गोकुल जानता है। और भवानी।"
"तो भवानी नहीं रहे," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो मुझे खुद सुनकर अजीब लगी। "अब सिर्फ़ गोकुल जानता है।"
जग्गू ने अपना सिर झुकाया। "और वो बीस साल से डरा हुआ है, वीर। जब मैं उससे आख़िरी बार मिला था, उसके हाथ ऐसे काँपते थे, चाय का गिलास भी नहीं पकड़ पाता था। वो तुमसे मिलेगा या नहीं, मुझे नहीं पता।"
दूसरी तरफ़ से टिंकू आया। उसके हाथ में आधा लड्डू था जो वो खा रहा था, और उसके मुँह पर बूरा लगा था।
"भाई, ये बातें छोड़। अगर काग़ज़ कल सुबह मैदान में नहीं पहुँचे तो ठाकुर का पूरा प्लान काम कर जाएगा। कुछ और सोच।"
"शहर जाना होगा," मीरा ने कहा। वो पास के पत्थर पर बैठी थी और उसने अपना बैग गोद में रख लिया था, जैसे उसमें कुछ कीमती है। मैंने उसकी आवाज़ सुनी और मुझे कुछ ठंडक मिली, जैसे दूर से पानी की आवाज़ आ रही हो। "अभी। रात में। अगर हम सुबह का इंतज़ार करेंगे तो ठाकुर पहले पहुँच जाएगा।"
"रात में शहर?" करण ने कहा। वो जीप का दरवाज़ा अभी भी खुला छोड़कर हमारी तरफ़ मुड़ गया था। "रास्ते में ठाकुर के आदमी होंगे।"
"तो रास्ता बदल देंगे," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जिसका जवाब लोग नहीं देते। "नहर के किनारे से पुराना रास्ता है। पुल के नीचे से निकलता है। उस पर कोई चौकी नहीं।"
करण ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। फिर उसने एक लंबी साँस ली और अपनी जेब से चाबी निकाली।
"मेरी जीप ले जाओ। पर मैं साथ नहीं चल सकता। मुझे जग्गू को यहाँ से निकालना है, और पिता को भी। अगर ठाकुर ने उन्हें बाहर निकलवाने का प्लान बनाया है तो मुझे उन्हें पहले पहुँचना होगा।"
"तुम अपने पिता को लेकर सीधे अखाड़े जाओ," मैंने कहा। "अखाड़े में रात को कालू काका होते हैं। वहाँ कोई नहीं घुसेगा।"
करण ने चाबी मेरी हथेली पर रख दी। धातु गरम थी।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई, "मेरे पिता बीस साल से डरे हुए हैं। पर आज उन्होंने कहा कि अगर सच बाहर नहीं आया तो वो भवानी की कब्र पर जाकर खुद हिसाब देंगे। इसलिए… तुम काग़ज़ लेकर पहुँचो। बाकी मैं देखता हूँ।"
उसने हाथ बढ़ाया और मेरा कंधा पकड़ा। उसकी पकड़ कसकर थी, और उसमें वो बात थी जो आदमी अपने भाई से कहता है।
जग्गू फिर मेरे पास आया। इस बार उसने करण की तरफ़ नहीं देखा। उसने सीधे मेरी आँखों में देखा और अपना मुँह मेरे कान के पास लाकर बोला:
"गोकुल से ये ज़रूर कहना — 'भवानी का बेटा आया है, और वो भूखा है।'" उसकी आवाज़ टूट गई। "भवानी जब भी गोकुल से मिलने जाता था, यही कहता था। गोकुल ये सुनते ही समझ जाएगा कि तुम भवानी के हो। बाकी कोई नहीं जानता ये बात। बीस साल में मैंने किसी को नहीं बताया।"
मैंने उसकी आँखों में देखा और सिर हिलाया। उसका मुँह बंद था, पर उसके होठ काँप रहे थे।
हम जीप में बैठे। मीरा आगे, टिंकू पीछे, और मैं ड्राइवर की सीट पर — जीप चलाना मुझे नहीं आता था, पर करण ने एक मिनट में समझा दिया था और मैं वादा कर चुका था कि रफ़्तार नहीं करूँगा। टिंकू ने पीछे बैठकर एक कम्बल अपने ऊपर डाल लिया और कहा:
"भाई, तू चला। मैं आँखें बंद करके बैठा हूँ। डर से नहीं, नींद से।"
"बेशर्म," मैंने कहा।
"शुक्रिया," उसने कहा और कम्बल सिर तक खींच लिया।
शहर का रास्ता नहर के किनारे-किनारे जाता था और रात में वो रास्ता ऐसा लग रहा था जैसे कोई पुरानी कहानी के पन्नों से निकालकर रख दिया हो। दोनों तरफ़ ऊँची घास थी जिसमें हवा चल रही थी और वो सरसराती थी, और दूर कहीं पानी की आवाज़ थी। मीरा ने खिड़की खोल रखी थी और हवा उसके बालों को उड़ा रही थी। वो कुछ नहीं बोल रही थी, बस आगे देख रही थी।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ जीप के शोर में दब गई।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अगर गोकुल ने काग़ज़ नहीं दिए तो?"
वो कुछ देर चुप रही। फिर उसने खिड़की बंद कर दी, और अंदर का शोर अचानक कम हो गया।
"तो हम मैदान में जाएंगे और जो हमारे पास है, वो रखेंगे। शीशी। तुम्हारी गंध। और गवाह। सच को पूरा सबूत नहीं चाहिए, वीर। सच को बस एक आवाज़ चाहिए जो सबके सामने बोले।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। रात में उसका चेहरा कुछ और लग रहा था — थका हुआ, पर अकड़ा हुआ, जैसे कोई डंडा जिसे झुकाया नहीं जा सकता।
"तुम बहुत ठंडी हो," मैंने कहा, और मुझे खुद नहीं पता था कि ये तारीफ़ थी या शिकायत।
"मैं डर गई हूँ, वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सीधी थी। "पर अगर मैं डरकर रुक गई, तो सुबह तक ठाकुर हमें रोक देगा। डरना बाद में, अभी चलना है।"
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