Spirit of a Fighter1107 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1107

7 min read November 5, 2026

"वो नहीं बोलेगा," जग्गू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बेबसी थी जो बीस साल की चुप्पी से आती है। "जब तक तुम उस सवाल का जवाब नहीं दोगे, वो नहीं बोलेगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "कौन सा सवाल?"

जग्गू ने धीरे से कहा, "वो सवाल जो उसने अपने आप से पूछा था, बीस साल पहले, जब उसके पिता ने उसे भवानी का बेटा बनने के लिए भेजा था।"

मैं फाटक की तरफ़ चला। करण ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर कुछ नहीं था — न हँसी, न गंभीरता। बस वो खाली चेहरा जो बीस साल से इंतज़ार कर रहा था।

मैं उसके पास खड़ा हो गया।

"तुमने मुझे बताया नहीं," मैंने कहा।

करण ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या बताता?"

"कि तुम बिशन के बेटे हो। कि तुम मेरे पिता के दूधभाई के बेटे हो।"

करण की उँगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं। उसने आगे देखा। "किसने बताया?"

"जग्गू ने।"

वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "मैंने सोचा था कि तुम्हें पता चलेगा। पर मैं नहीं चाहता था कि तुम इसे इस तरह सुनो।"

"तो कैसे सुनता?" मैंने पूछा। "मैदान में? जब तुम मेरे सामने खड़े होकर मेरे बाप का सच बताते?"

करण ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — न गुस्सा, न शर्म। बस एक पुरानी थकान।

"मैंने बीस साल इंतज़ार किया," उसने कहा। "बीस साल मैंने तुम्हें दूर से देखा। तुम्हें मिट्टी में खेलते देखा, तुम्हें भूखा देखा, तुम्हें अखाड़े के बाहर खड़े देखा। और मैं कुछ नहीं कर सका। क्योंकि मेरे पिता ने कहा था — जब तक वो खुद नहीं लड़ेगा, तब तक तुम उसके पास मत जाना।"

"क्यों?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फट गई।

"क्योंकि अगर मैं तुम्हें बचाता," करण ने कहा, "तो तुम कभी खुद को नहीं बचाते। और भवानी का बेटा खुद को बचाना सीखे बिना ठाकुर से नहीं लड़ सकता।"

मैं चुप हो गया।

करण ने इंजन बंद कर दिया। वो जीप से उतरा और मेरे सामने खड़ा हो गया। हम दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, और हवा में बस नहर की आवाज़ थी।

"अब सवाल," करण ने कहा। "वो सवाल जो जग्गू ने बताया। तुम लड़ रहे हो अपने बाप के सच के लिए, या नाम के लिए?"

मैंने उसकी आँखों में देखा। वो आँखें थीं जो बीस साल से इंतज़ार कर रही थीं।

"मुझे नहीं पता," मैंने सच कहा। "पर मैं जानता हूँ कि अगर मैं नाम के लिए लड़ूँगा, तो मैं हार जाऊँगा। और अगर मैं सच के लिए लड़ूँगा, तो मैं जीत जाऊँगा।"

करण ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदला। वो शायद मुस्कुराया नहीं, पर उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो बीस साल से छिपी थी।

"तो फिर," उसने कहा, "मैं तुम्हें कल कुछ दिखाऊँगा। मेरे पिता के पास जो काग़ज़ हैं, वो कल मैदान में लाए जाएँगे। और तुम उन्हें देखकर बताओगे कि तुम किसके लिए लड़ रहे हो।"

मैंने सिर हिलाया।

करण ने अपना हाथ बढ़ाया। मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ मज़बूत थी — और उसमें वो चीज़ थी जो सिर्फ़ भाइयों की पकड़ में होती है। या शायद दोस्तों की।

"एक बात," करण ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो अब तक नहीं थी। "कल मैदान में जो भी हो, तुम्हारे बाप का सच बाहर आएगा। और उसके बाद भी अगर ठाकुर ज़िंदा रहा, तो मैं उसे अपने हाथ से निपटाऊँगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्यों?"

करण ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो आग थी जो बीस साल से जल रही थी।

"क्योंकि उसने मेरे पिता के हाथ कटवाए थे।"

मैं जम गया।

"बिशन के हाथ?" मैंने पूछा। "पर जग्गू ने कहा कि उसके हाथ कटे थे।"

करण ने मेरी तरफ़ देखा। "जग्गू के हाथ नहीं, मेरे पिता के हाथ।" उसने रुककर साँस ली। "जग्गू ने तुमसे झूठ बोला। वो काग़ज़ जग्गू के पास नहीं थे — वो मेरे पिता के पास थे। और ठाकुर ने जब उन्हें ढूँढा, तो उसने मेरे पिता के हाथ कटवा दिए। जग्गू ने खुद को बचाने के लिए ये कहानी बनाई कि उसके हाथ कटे थे।"

मेरा सिर घूम गया।

"तो जग्गू के हाथ?"

करण ने मेरी तरफ़ देखा। "जग्गू के हाथ सही हैं। वो बस बाँधकर रखता है। वो बीस साल से नाटक कर रहा है। और उसने आज तुम्हारे सामने भी नाटक किया।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। जग्गू अब भी चबूतरे पर बैठा था। उसकी बाँहें उसके शरीर से चिपकी थीं। पर जब उसने मेरी तरफ़ देखा, तो उसकी आँखों में वो डर था जो पकड़े जाने का होता है।

"तो वो सच क्या है?" मैंने करण से पूछा।

करण ने धीरे से कहा, "सच ये है कि जग्गू मेरे पिता का दुश्मन नहीं, उनका साथी था। और आज रात वो तुम्हें यहाँ लेकर आया, क्योंकि वो ठाकुर के लिए जासूसी कर रहा है।"

मेरी मुट्ठी कस गई।

करण ने मेरा हाथ पकड़ा। "तुम गुस्सा मत करो। ये सब मैंने तुम्हें बताया, क्योंकि कल मैदान में जग्गू ठाकुर की तरफ़ से गवाही देने वाला है।

मैंने करण की तरफ़ देखा। उसकी बातें सुनकर मेरे अंदर कुछ टूट रहा था। जग्गू। वो जग्गू जिसके हाथ मैंने इतनी बार करीने से बाँधे थे, जिसके लिए मैंने अपनी माँ का दिया हुआ पैसा खर्च किया था।

"तुम्हें कैसे पता?" मेरी आवाज़ सूख गई थी।

"क्योंकि मेरे पिता के पास वो काग़ज़ हैं," करण ने धीरे से कहा। "और जग्गू ये नहीं जानता कि मैं जानता हूँ। वो समझता है कि वो दोनों तरफ़ से खेल रहा है। ठाकुर को मेरी खबर देता है, और मुझे ठाकुर की।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। जग्गू अब भी वहीं बैठा था, पर जैसे उसे लगा कि कोई उसे देख रहा है, वो अपनी बाँहें और कसकर चिपका लेता। मुझे उसके चेहरे पर वो डर दिखा जो अब तक मैंने किसी में नहीं देखा था।

"और आज रात?" मैंने पूछा। "वो मुझे यहाँ क्यों लाया?"

करण ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो शांत आग जल उठी जो अब तक बुझी हुई थी। "क्योंकि ठाकुर को डर है कि तुम्हें मेरे पिता के पास जो काग़ज़ हैं, उनके बारे में पता चल गया तो सब खत्म। वो चाहता है कि तुम्हें यहाँ रात भर रोककर रखा जाए। और सुबह जब तुम जाओ, तो देर हो चुकी हो।"

मेरी साँस रुक गई।

"देर किस बात की?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी।

करण ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी पकड़ ढीली हो गई और उसने वो कहा जो मेरे पेट में एक ठंडी सुई की तरह उतर गया।

"मेरे पिता को ठाकुर ने रात भर में गाँव से बाहर निकलवाने का प्लान बनाया है। उन्हें पता है कि अगर बिशन सिंह कल मैदान में आए, तो सब कुछ बाहर आ जाएगा।"

उसी पल जग्गू उठकर हमारी तरफ़ आने लगा। वो धीरे-धीरे चल रहा था, अपनी बाँहें शरीर से चिपकाए, जैसे दर्द में हो।

"करण सर," वो बोला, "मुझे भी कुछ कहना है—"

करण ने उसकी तरफ़ देखा। "मुझे पता है, जग्गू। तुम्हारे हाथ ठीक हैं।"

जग्गू की बाँहें पल भर में ढीली पड़ गईं। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। पान का बीड़ा उसके मुँह से गिरकर धूल में लुढ़क गया।

"मैं… मैं ने ऐसा किया तो नहीं—" वो हकलाया।

"बहुत बोल लिया," करण ने कहा। "कल सुबह मैदान में जो होगा, उसके बाद तुम्हारा हिसाब होगा। अभी मेरे साथ चलो, मेरी आँखों के सामने रहो।"

वो जग्गू को जीप में बैठाने लगा। मैं उन्हें देखता रहा। और उसी पल मेरे दिल में एक बात उठी — अगर जग्गू जानता है कि बिशन के पास काग़ज़ हैं, अगर वो बीस साल से दोनों तरफ़ खेल रहा है, तो वो काग़ज़ों के बारे में सब जानता होगा। उन्हें छिपाने की जगह भी।

"करण," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "एक बात पूछनी है।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho