Spirit of a Fighter – Chapter 1106
दोपहर को जग्गू आया। करण के आदमी उसे बस्ती से लेकर आए थे। वो बैलगाड़ी से उतरा — बिना हाथों वाला बूढ़ा, जिसकी आँखें धूप में सिकुड़ी हुई थीं।
चंपा दौड़कर उससे लिपट गई। बच्चे उसके पैरों से चिपक गए। जग्गू ने अपनी बाँहें फैलाईं — जो अब थीं नहीं — और फिर उसने अपना सिर चंपा के कंधे पर रख दिया। वो रोया नहीं। बस उसकी साँस भारी हो गई।
"तू आ गई," उसने कहा। "तू आ गई।"
चंपा ने उसका मुँह अपने हाथों में लिया। "वीर भैया ने बुलाया।"
जग्गू मेरी तरफ़ मुड़ा। उसने मेरे पैर छूने की कोशिश की — बिना हाथों के, अपने शरीर को झुकाकर। मैंने उसे रोका। मैं उसके सामने बैठ गया।
"आप मेरे पैर मत छुओ," मैंने कहा। "आपने कल जो किया, वो किसी बेटे की तरह किया।"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था। "मैंने बीस साल सोचा," उसने कहा, "कि मैं इन हाथों के बिना क्या हूँ। आज पता चला — मैं इन बच्चों का बाप हूँ। बस इतना ही काफ़ी है।"
शाम को मैंने खाना खाया। माँ ने चंपा के लिए चटाई बिछाई। बबलू और उसकी बहन आँगन में खेल रहे थे — गुड़िया उन्हें अंगूर वाली कॉपी दिखा रही थी।
मैं बाहर निकला। हवा में नमी थी। नहर की तरफ़ से आती हुई। मैंने शीशी अपनी जेब में टटोली — वो वहीं थी, ठंडी।
जग्गू मेरे पीछे आया। उसने अपना सिर हिलाकर बताया कि वो मेरे पास बैठना चाहता है। मैंने उसे चबूतरे पर बैठाया।
"वीर," उसने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ में वो फुसफुसाहट थी जो कोई बड़ी बात कहने से पहले आती है। "मुझे कुछ बताना है।"
"बोलिए।"
उसने चारों तरफ़ देखा। आँगन खाली था। चूल्हे की आवाज़ आ रही थी, और गुड़िया के बच्चों की हँसी।
"कल रात मैंने तुम्हें वो तीन फ़ोटो दीं," उसने कहा। "पर सच ये है — फ़ोटो मेरे पास नहीं थीं।"
मेरा हाथ चबूतरे पर जम गया। "मतलब?"
"जिस दिन मेरे हाथ कटे," जग्गू ने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, "उससे पहले मैंने वो फ़ोटो किसी और को दे दी थी। मुझे शक हो गया था कि ठाकुर के आदमी मेरे पीछे आ रहे हैं। तो मैंने फ़ोटो अपने गाँव के एक आदमी को दे दी थी।"
"कौन?" मैंने पूछा। "कौन आदमी?"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो बीस साल से दबी थी।
"वो आदमी," उसने धीरे से कहा, "तेरे पिता भवानी सिंह का दूधभाई था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"दूधभाई?" मैंने दोहराया।
"हाँ," जग्गू ने कहा। "भवानी की माँ ने उसे भी दूध पिलाया था। उसका नाम… उसका नाम था बिशन। बिशन सिंह।" उसने रुककर साँस ली। "बिशन अब भी रामपुर से दूर रहता है। उसने बीस साल मुझसे वादा किया था कि जिस दिन सही वक़्त आएगा, वो फ़ोटो लेकर आएगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "वो कहाँ है?"
जग्गू ने अपना सिर नीचे किया। "मुझे नहीं पता। बीस साल में उसने एक बार भी मुझसे बात नहीं की। डर से। पर मैं जानता हूँ कि वो ज़िंदा है। वो ज़िंदा है क्योंकि भवानी ने उससे वादा लिया था।"
मैंने चबूतरे से हाथ हटाया। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"तो जो फ़ोटो आपने मुझे दीं," मैंने कहा, "वो किसकी थीं?"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में शर्म थी। "वो सच थीं। पर वो मेरे पास नहीं थीं। मैंने उन्हें बिशन के बारे में बताया था। जब मैंने सुना कि तुम आ रहे हो, तो मैंने बिशन के लड़के से कहकर वो फ़ोटो मँगवाईं। उसने एक रात पहले ही मुझे दी थीं।"
मेरा सिर घूम गया। "बिशन का लड़का? वो कहाँ है?"
"वो नहीं बताएगा," जग्गू ने कहा। "वो डरता है। पर वो तुम्हारे आस-पास ही है। बिशन ने उसे भेजा था — तुम्हें देखने। ये देखने कि भवानी का बेटा लड़ने लायक है या नहीं।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। आँगन खाली था। फाटक पर कोई नहीं था। नीम के पेड़ के नीचे कोई नहीं था।
"वो कहाँ है?" मैंने फिर पूछा, और मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो डर से ज़्यादा बेचैनी थी।
जग्गू ने धीरे से कहा, "अगर वो चाहेगा, तो तुमसे मिलेगा। पर एक बात याद रखना — वो बीस साल से ठाकुर के ख़िलाफ़ काग़ज़ जमा कर रहा है। उसके पास वो सब है जो हमारे पास नहीं है। पर वो तुमसे एक चीज़ माँगेगा।"
"क्या?"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो गंभीरता थी जो सिर्फ़ बूढ़े लोगों की आँखों में होती है।
"वो चाहेगा," जग्गू ने कहा, "कि तुम सबके सामने ये कहो कि तुम्हारे पिता भवानी सिंह ने खुद ज़हर पिया था। खुद। किसी ने नहीं दिया।"
आँगन में हवा रुक गई।
"क्यों?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फट गई।
"क्योंकि," जग्गू ने कहा, "उस दिन भवानी ने जो किया, वो बीस साल से गलत बताया जा रहा है। और बिशन उस सच को सबके सामने लाना चाहता है। पर उसके लिए तुम्हारी ज़ुबान चाहिए। तुम्हारी गवाही चाहिए।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरा सिर चकरा रहा था।
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भीगी थीं। "वीर," उसने कहा, "मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। बिशन का लड़का कल मैदान में होगा। और जो वो लेकर आएगा, वो ठाकुर को खत्म कर देगा। पर उससे पहले वो तुमसे एक सवाल पूछेगा। और उस सवाल का जवाब तुम्हें अपने दिल से देना होगा।"
"क्या सवाल?"
जग्गू ने धीरे से कहा, "वो पूछेगा — तुम अपने बाप के सच के लिए लड़ रहे हो, या अपने बाप के नाम के लिए?"
मैं चुप हो गया।
आँगन में चूल्हे की आवाज़ आ रही थी। गुड़िया बच्चों को कहानी सुना रही थी — उसकी आवाज़ हल्की और खुश थी। माँ चक्की पर बैठी थीं और चक्की फिर घूम रही थी।
मैंने जग्गू की तरफ़ देखा। "बिशन का लड़का… उसका नाम क्या है?"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ ऐसा आया जो बताता था कि उसने ये नाम बहुत पहले सोच लिया था, पर बोलने से डरता था।
"उसका नाम," जग्गू ने धीरे से कहा, "करण है।"
मेरे पैर ज़मीन पर जम गए।
"करण?" मैंने कहा। "मेरा करण?"
जग्गू ने सिर हिलाया। "तेरा करण। वही जो आज सुबह पुल पर तुम्हें बचाने आया। वही जो कल रात बस्ती में तुम्हारे साथ था।"
मैं उल्टा पलटा। फाटक की तरफ़ देखा। करण की जीप वहीं खड़ी थी — आँगन के बाहर, सड़क के किनारे। और करण जीप पर बैठा था, दोनों हाथ स्टीयरिंग पर, आगे देख रहा था।
"वो क्यों नहीं बोला?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ में गुस्सा था।
"क्योंकि," जग्गू ने कहा, "वो तुम्हें परख रहा था। बीस साल से वो तुम्हें दूर से देख रहा है। तुम्हारे साथ चल रहा है, तुम्हें गिरते देख रहा है, उठते देख रहा है। पर वो सामने नहीं आया, क्योंकि उसे डर था कि अगर तुम्हें पता चला कि वो कौन है, तो तुम उसे अपने बाप के सच के लिए इस्तेमाल करोगे।"
मैंने करण की तरफ़ देखा। वो अब भी जीप पर बैठा था। जैसे उसे पता ही न हो कि उसके बारे में बात हो रही है।
"और आज?" मैंने पूछा। "आज वो क्यों आया?"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ में अब वो आख़िरी बात थी जो वो कहने आया था।
"आज उसने तुम्हें बचाया," उसने कहा, "क्योंकि उसने देखा कि तुम अपने बाप के सच के लिए लड़ रहे हो, नाम के लिए नहीं।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर मैंने अपने कदम बढ़ाए।
"कहाँ जा रहे हो?" जग्गू ने पूछा।
"करण से बात करने," मैंने कहा।
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