Spirit of a Fighter – Chapter 1105
"तुम्हारे ठाकुर साहब," मैंने कहा, "अब भी ये नहीं समझे कि प्याला भरता किससे है।"
बच्चू कुछ नहीं बोला। वो जीप में बैठा और जीप पीछे हटकर मुड़ गई। धूल उड़ी और फिर बैठ गई।
करण ने मेरी तरफ़ देखा। "ठीक हो?"
मैंने सिर हिलाया। "तुम वक़्त पर आए।"
"तुमने वक़्त दिया था," करण ने कहा। "मैंने बस पहुँचना था।"
मैंने पीछे मुड़कर गाड़ी में देखा। टिंकू का चेहरा अब भी सफ़ेद था। उसकी गोद में टोकरी थी और उसकी उँगलियाँ टोकरी के किनारे पर इतनी कसी हुई थीं कि नाखून सफ़ेद पड़ गए थे।
"टिंकू," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोला, "भाई, मेरी खीर… मेरी खीर ठंडी हो गई।"
मैं हँस पड़ा। करण भी हँसा। और टिंकू फिर टिंकू हो गया — उसने ढक्कन खोला, अंदर झाँका, और गंभीरता से बोला, "अरे नहीं, बच गई। ऊपर की तरफ़ गरम है। बस।"
गुड़िया तब तक चंपा के पास बैठी थी। उसने अपनी कॉपी चंपा को दिखाई। "देखो, इसमें मैंने बबलू का नाम लिख दिया। अंगूरों के नीचे।"
चंपा ने कॉपी देखी। उसका चेहरा, जो अब तक पत्थर जैसा था, थोड़ा नरम पड़ा। उसने गुड़िया के सिर पर हाथ रखा और कुछ नहीं बोली।
बैलगाड़ी फिर चल पड़ी। करण की जीप पीछे-पीछे आ रही थी।
रास्ते में मैंने चंपा से पूछा। "तुम्हारे पति जग्गू… उनके हाथ कैसे गए?"
चंपा ने काफ़ी देर तक कुछ नहीं कहा। गाड़ी का पहिया कच्ची सड़क पर चरमरा रहा था और बैल की घंटी धीरे-धीरे बज रही थी। मुझे लगा वो जवाब नहीं देगी।
तभी उसने कहा, "ठाकुर के भट्ठे पर काम करते थे। दो साल पहले की बात है। एक रात जग्गू ने देख लिया कि ठाकुर के आदमी कुछ काग़ज़ जला रहे हैं। जग्गू भोला आदमी है — उसने पूछ लिया कि भाई ये क्या जला रहे हो।"
उसने रुककर साँस ली।
"अगली सुबह उसे गन्ने के खेत में पड़ा मिला। दोनों हाथ कटे हुए। मुँह में कपड़ा ठुसा हुआ। कोई अस्पताल नहीं ले गया — ठाकुर के आदमी थे, उन्होंने कहा कि ये भागते हुए मशीन में आ गया। मशीन।" उसकी आवाज़ टूटी। "मशीन इंसान के हाथ ऐसे नहीं काटती। मैंने बाद में देखा था — कट धारदार थी, साफ़। तलवार जैसी।"
गुड़िया ने चंपा का हाथ पकड़ लिया। बच्चे — बबलू और उसकी छोटी बहन — कुछ समझ रहे थे, कुछ नहीं। बबलू अपनी माँ की गोद में सिर रखकर सो गया था।
गाँव का फाटक आया। नीम का पेड़। पंचायत का चबूतरा। और फिर हमारा आँगन।
माँ चक्की पर बैठी थीं। चक्की घूम रही थी और उसकी आवाज़ आँगन भर में फैली थी। जब गाड़ी रुकी, तो वो आवाज़ भी रुकी।
माँ उठीं। उनके हाथ में आटा लगा था। उन्होंने गाड़ी से उतरते चंपा को देखा, फिर दो बच्चों को, और फिर मुझे।
"ये?" उन्होंने पूछा।
"जग्गू का परिवार," मैंने कहा। "जग्गू वही जिन्होंने कल हमें काग़ज़ दिए। ठाकुर के आदमी इनके पीछे लगे थे।"
माँ ने कुछ नहीं पूछा। उन्होंने चक्की पर पड़ा आटा झाड़ा, हाथ पोंछे, और सीधे चंपा के पास गईं।
"क्या नाम है तेरा, बेटी?" उन्होंने पूछा।
"चंपा।"
"चंपा," माँ ने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे वो कोई पुराना गीत गा रही हों। "भूखी है?"
चंपा ने कुछ कहना चाहा, पर उसका गला रुंध गया। उसने बस सिर हिलाया।
माँ ने बबलू का हाथ पकड़ा और उसे दहलीज़ के अंदर ले गईं। "अंदर आ। चूल्हा जल रहा है। दाल रखी है। रोटी गरम बना दूँगी।"
चंपा दहलीज़ पर रुक गई। उसने माँ की तरफ़ देखा। "मेरे पति के हाथ नहीं हैं," उसने अचानक कहा, जैसे ये बात किसी को बतानी ज़रूरी हो। "लोग कहते हैं वो किसी काम का नहीं। ठाकुर के आदमी कहते हैं।"
माँ ने पलटकर देखा। उन्होंने चंपा के सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ आटे से भरा था और चंपा के बालों पर आटा लग गया। "सुन," माँ ने कहा, "मेरा बेटा ईंटें ढोता है। मेरी बेटी स्कूल जाती है। हमारे पास ज़मीन नहीं, पैसा नहीं, कोई नाम नहीं।" उन्होंने चंपा की आँखों में देखा। "और फिर भी ये घर चल रहा है। तू बता, तेरे पति में दिल है?"
चंपा ने धीरे से कहा, "हाँ।"
"तो फिर हाथ नहीं हैं तो क्या हुआ," माँ ने कहा। "अब तू मेरे घर की है। जो हाथ कट गए, वो नहीं जुड़ेंगे। पर जो दिल है, वो किसी की काट नहीं सकती।"
चंपा रो पड़ी। वो दहलीज़ पर बैठ गई और उसने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। बबलू ने अपनी माँ का घुटना पकड़ा और पूछा, "माँ, तू रो क्यों रही है?"
माँ ने बबलू को उठा लिया और उसका मुँह अपने कंधे पर रख दिया। "तेरी माँ को कुछ नहीं हुआ, बेटा," उन्होंने कहा। "बस धूल लग गई है आँखों में।"
मैं आँगन के बाहर खड़ा था। मेरा गला भारी था और मैं कुछ नहीं बोल पा रहा था। टिंकू मेरे पास आया। उसने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। बस मेरे कंधे पर हाथ रखा।
मीरा तब आई। वो करण के साथ पीछे रह गई थी — गाँव के फाटक पर किसी से बात कर रही थी। उसने आकर आँगन देखा, चंपा को देखा, और मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
"माँ ने उसे रख लिया?" उसने धीरे से पूछा।
मैंने सिर हिलाया।
मीरा मुस्कुराई। "तुम्हारी माँ को मैं जानती हूँ। वो किसी को लौटाती नहीं।"
उसके हाथ में एक छोटा थैला था। "ये चंपा के लिए। दवा है — घाव पर नहीं, जग्गू के हाथों पर। जब वो आए, तो लगा दूँगी। कुछ घाव पुराने हो जाते हैं, पर दर्द नहीं जाता।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। आँगन में सबके सामने। उसने हाथ नहीं छुड़ाया।
तभी सुक्खी बुआ की आवाज़ आई। "अरे राम! अरे राम! ये क्या हो रहा है वीर के आँगन में?"
वो आँगन के बाहर खड़ी थी, हाथ में पान का बीड़ा, और उसके पीछे तीन औरतें। गाँव की औरतें। जिन्हें खबर लग चुकी थी कि वीर के घर में कोई नया आया है।
"मैंने तो सुना है," सुक्खी बुआ ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो किसी की बदनामी में लगाई जाती है, "कि वीर ने अपने घर में एक अपाहिज को रख लिया है। क्या पता कहाँ से आया है। क्या पता कौन है। अरे आज कल कोई किसी का नहीं होता।"
उसकी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि माँ की आवाज़ आई।
माँ चक्की के पास खड़ी थीं। वो पलटी नहीं। उन्होंने चक्की का हत्था पकड़ा रखा था और उनकी आवाज़ वैसी ही शांत थी जैसे वो रोज़ आटा गूंधते वक़्त बोलती हैं।
"हाँ, रख लिया है," माँ ने कहा। "क्योंकि उसके हाथ नहीं हैं तो क्या हुआ, उसका दिल तो है।"
आँगन में सन्नाटा छा गया।
सुक्खी बुआ का पान का बीड़ा उसके मुँह के पास ही रुक गया। उसकी आँखें ऐसी हो गईं जैसे किसी ने उसके हाथ से चाबी खींच ली हो। उसके पीछे खड़ी औरतों ने एक-दूसरे को देखा। एक ने मुँह फेर लिया।
माँ ने चक्की फिर घुमाई। आवाज़ शुरू हुई — घर्र, घर्र — और उस आवाज़ में सुक्खी बुआ का सब कुछ दब गया।
सुक्खी बुआ ने पान चबाया। उसका रंग हल्का लाल था और उसकी ज़ुबान पर वो रुक गया। उसने एक बार आँगन में देखा, फिर अपनी साड़ी की तह ठीक की, और धीरे से बोली, "अरे मैं तो बस… मैं तो सुनकर ही आई थी।"
कोई नहीं बोला।
वो खिसक गई। और उसके पीछे आई औरतें भी खिसक गईं, जैसे हवा ने उन्हें उड़ा दिया हो।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो चक्की घुमा रही थीं, और उनका चेहरा शांत था। पर उनकी आँखों के कोने में कुछ था — न गुस्सा, न गर्व। बस एक पुरानी थकान, जो ये जानती थी कि ये लड़ाई उन्होंने पहले भी लड़ी है और आगे भी लड़ेगी।
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