Spirit of a Fighter1104 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1104

6 min read November 5, 2026

वो उस आदमी के पास पहुँचा। कुछ बोला। आदमी ने लाठी घुमाई, फिर टोकरी की तरफ़ देखा, और फिर हँसा। टिंकू ने टोकरी खोली और उसे एक लड्डू दिया। आदमी ने लिया, काटा, और मुँह में डाल दिया।

मेरे पेट में गुस्सा उठा। वो आदमी ठाकुर का था, और मेरे भाई की मिठाई खा रहा था। पर मैं चुप रहा। अभी वक़्त नहीं था।

टिंकू चूल्हे वाली औरत के पास गया। कुछ बोला। औरत ने सिर उठाया। उसका चेहरा दुबला था, आँखें धँसी हुईं। वो उठी, और टिंकू ने टोकरी आगे की।

मैं दूर से देख रहा था। औरत ने हाथ जोड़े, मना किया। टिंकू ने ज़िद की। फिर वो कुछ बोला, और औरत रुक गई। उसने टिंकू की तरफ़ देखा, फिर चारों तरफ़ देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया।

फिर टिंकू ने पीछे मुड़कर गुड़िया की तरफ़ देखा और हाथ हिलाया।

"चल," मैंने गुड़िया से कहा। "अब।"

हम गए। गुड़िया ने चंपा का हाथ पकड़ा। "चाची," वो बोली, "भैया ने भेजा है।"

चंपा ने गुड़िया की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में डर था, पर उसके साथ कुछ और भी — पहचान। जैसे उसने मेरा चेहरा कहीं देखा हो।

"तुम जग्गू के…" वो रुकी।

"हाँ," मैंने कहा। "हम उसे तुम्हारे पास ले जाएँगे। पर जल्दी।"

"बच्चे," वो बोली, और उसकी आवाज़ काँपी। "वो अंदर हैं।"

टिंकू अंदर गया और दो बच्चों को लेकर आया — एक लड़का, पाँच साल का, और एक लड़की, तीन साल की। लड़की सो रही थी, टिंकू की गोद में सिर रखे। लड़का जाग रहा था, और वो टिंकू की टोपी को घूर रहा था।

"टोपी वाला," उसने कहा।

"हाँ," टिंकू ने कहा। "टोपी वाला। और ये देखो।" उसने टोकरी खोली। "लड्डू।"

लड़के की आँखें बड़ी हो गईं।

"एक ले," टिंकू ने कहा। "पर चुपचाप।"

लड़के ने लड्डू लिया और मुँह में डाल दिया। उसके गाल फूल गए।

हम बैलगाड़ी की तरफ़ बढ़े। चंपा ने अपना सामान उठाया — एक छोटी पोटली, बस। गुड़िया ने लड़के को गाड़ी पर बैठाया और अपनी कॉपी निकाली।

"देख," उसने कहा, और कॉपी के पन्ने पर अंगूर बनाने लगी। "ये अंगूर हैं। तेरे नाम के जैसे।" उसने लड़के की तरफ़ देखा। "तेरा नाम क्या है?"

"बबलू," लड़के ने कहा, मुँह में लड्डू लिए।

"बबलू," गुड़िया ने दोहराया, और अंगूर के नीचे उसका नाम लिख दिया। "अब ये तेरा है। मैं इसे अपनी कॉपी में रखूँगी।"

बबलू ने अंगूरों को देखा और मुस्कुराया।

हम चल पड़े। बैलगाड़ी बस्ती से बाहर निकली, और सड़क अब पक्की थी। मैंने पीछे मुड़कर देखा — वो लाठी वाला आदमी अब भी चूल्हे के पास खड़ा था, और वो हमारी तरफ़ देख रहा था। उसने लाठी नीचे रखी और धीरे-धीरे चलने लगा।

मेरा पेट कड़ा हो गया।

"टिंकू," मैंने धीरे से कहा। "पीछे देख।"

उसने देखा। "भाई, वो तो बस…"

"नहीं।" मैंने लगाम खींची। "वो हमें नहीं छोड़ रहा।"

बैलगाड़ी की रफ़्तार बढ़ी। नहर का पुल अब दूर नहीं था — उसकी लोहे की रेलिंग सुबह की रोशनी में चमक रही थी। मैंने बैल पर हल्की छड़ी मारी।

हम पुल पर चढ़ने ही वाले थे कि सामने से एक जीप आई। वो तेज़ नहीं चल रही थी, बस आराम से। और उसने पुल के बीच में आकर ब्रेक लगा दी।

मेरे हाथ लगाम पर जम गए।

जीप का दरवाज़ा खुला। एक आदमी उतरा — मोटा शरीर, काला चश्मा, हाथ में चाय का गिलास। उसने चश्मा उतारा और दूर से मुस्कुराया।

"टिंकू भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो गले में अटक जाती है। "इतनी जल्दी कहाँ? ठाकुर साहब ने तो कहा था तुम आज हमारे साथ चाय पियोगे।"

टिंकू ने टोकरी को अपने पेट से सटाया। मैंने उसका चेहरा देखा — उसकी हँसी गायब नहीं हुई थी, पर वो अब अलग थी। जमी हुई।

"चाय?" टिंकू ने कहा। "इतनी सुबह?"

"ठाकुर साहब का हुक्म है।" आदमी ने जीप की तरफ़ इशारा किया। "चलो, बैठ जाओ।" उसकी नज़र मेरी तरफ़ गई, फिर गुड़िया की तरफ़, फिर चंपा और बच्चों की तरफ़। "और ये सब कौन हैं?"

मैंने गाड़ी से उतरना शुरू किया।

"रुक जाओ, वीर सिंह," आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ बदल गई — अब उसमें मिठास नहीं थी, बस वो सूखी चीज़ जो ठाकुर के आदमियों में होती है। "मैं जानता हूँ तुम कौन हो। ठाकुर साहब ने बताया था कि तुम आज कुछ करोगे। उन्होंने कहा था — अगर वीर सिंह शहर की तरफ़ जाए, तो उसे रोकना नहीं। बस उसके साथ चलना।"

मेरे पैर ज़मीन पर टिक गए।

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि," आदमी ने कहा, और उसने अपना चाय का गिलास पुल की रेलिंग पर रख दिया, "ठाकुर साहब चाहते हैं कि तुम आज मैदान में पहुँचो। और उन्हें पता है कि तुम अपने साथ कुछ लेकर आओगे।" उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ शीशी थी। "वो चीज़ उन्हें चाहिए।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। गुड़िया ने चंपा का हाथ कसकर पकड़ लिया।

मैंने आदमी की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव था जो मुझे पसंद नहीं — जीत का भाव, जो अभी पूरा नहीं हुआ, पर उसका इंतज़ार कर रहा है।

"तुम्हारे ठाकुर साहब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "ये भूल गए कि मैं सिर्फ़ शीशी लेकर नहीं आया।"

आदमी ने सिर झुकाया। "तो क्या लाए हो?"

मैंने मुस्कुराने की कोशिश की। "गवाह।"

॥

"गवाह।"

शब्द हवा में लटक गया। जीप वाले आदमी की आँखें एक पल के लिए सिकुड़ीं, फिर फैल गईं। उसने चाय का गिलास रेलिंग से उठाया, एक घूँट लिया, और उसकी नज़र मेरी जेब पर टिकी रही।

"गवाह," उसने धीरे से दोहराया। "कैसे गवाह?"

मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने बस पीछे मुड़कर देखा। पुल के उस पार, जहाँ सड़क मुड़ती थी, धूल उठ रही थी। तीन बैलगाड़ियाँ। और उनके आगे-आगे करण की सफ़ेद जीप।

आदमी ने भी देखा। उसके हाथ से गिलास थोड़ा झुक गया और चाय रेलिंग पर गिर पड़ी। उसने गिलास नीचे रखा और अपना चश्मा फिर पहन लिया। जैसे चश्मा ही उसका असली चेहरा हो।

"तुमने ये सोचा था?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास अब बिलकुल नहीं थी।

"नहीं," मैंने सच कहा। "मैंने सोचा था कि रास्ता साफ़ होगा। पर कल रात जब जग्गू के बच्चों की बात सुनी, तब लगा कि ठाकुर इतनी आसानी से जाने नहीं देगा। तो करण को कह दिया था कि सुबह पीछे-पीछे आ जाए। एहतियात।"

"एहतियात," आदमी ने कहा, और उसने जीप की तरफ़ देखा। उसका साथी अब भी अंदर बैठा था, हाथ स्टीयरिंग पर। आदमी ने उसे इशारा किया — रुको।

पीछे से करण की जीप आकर हमारी बैलगाड़ी के बराबर रुकी। करण उतरा। उसके पीछे छह आदमी उतरे, सबके हाथ खाली थे। बस खड़े थे, और उनका खड़ा होना ही काफ़ी था।

करण ने जीप वाले आदमी को देखा। "बच्चू," उसने कहा, जैसे किसी पुराने नौकर को नाम से बुला रहा हो। "पुल खाली कर।"

आदमी का नाम बच्चू था। यह जानकर मुझे अजीब लगा — इतनी धमक वाला आदमी, और नाम ऐसा।

बच्चू ने करण को देखा, फिर मुझे, फिर गाड़ी में बैठे बच्चों को। उसका जबड़ा कसा। "करण भाई," उसने कहा, "मैं तो बस ठाकुर साहब का हुक्म मान रहा था। कोई लड़ाई नहीं।"

"तो अच्छा ही है," करण ने कहा। "लड़ाई नहीं होगी। पुल खाली कर।"

बच्चू ने एक पल सोचा। फिर उसने अपनी जीप की तरफ़ हाथ हिलाया। उसका साथी बाहर उतरा और पीछे का दरवाज़ा खोल दिया। बच्चू ने आख़िरी बार मेरी जेब की तरफ़ देखा।

"ठाकुर साहब कहते हैं," उसने धीरे से कहा, "कि शीशी वाला प्याला आज भर जाएगा। और तब तुम खुद उनके पास आओगे।"

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