Spirit of a Fighter – Chapter 1103
"मेरी बीवी है। चंपा।" उसका गला रुका। "और दो बच्चे। एक लड़का, एक लड़की। वो शहर के किनारे रहते हैं, उस मज़दूर बस्ती में जहाँ ईंट के भट्ठे वाले रहते हैं। मैं जब यहाँ आया था, तब वो पीछे छूट गए। मैंने सोचा, मैं जल्दी लौटूँगा।" उसने अपनी कटी कलाइयाँ उठाईं। "फिर ये हो गया। और मैं लौट ही नहीं सका।"
"अब क्या हुआ?" मीरा ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी लौट आई थी जो मुझे अच्छी लगती है।
जग्गू ने नीचे देखा। "ठाकुर के दो आदमी रोज़ मेरे घर के बाहर टहलते हैं। चंपा ने मुझे खबर भेजी थी — पिछले हफ़्ते कोई लड़का आया था, बोला कि जग्गू का काग़ज़ जो भी हो, ठाकुर साहब को सौंप दो।" उसने आँखें ऊपर कीं। "चंपा नहीं जानती कि वो काग़ज़ कहाँ हैं। वो नहीं जानती कि मैं यहाँ हूँ। वो बस समझती है कि उसका आदमी कहीं काम करने गया है और लौटेगा।"
कमरे में चुप्पी छा गई। कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और उसकी आवाज़ आई।
मैंने एक पल सोचा भी नहीं।
"तुम्हारा परिवार मेरी ज़िम्मेदारी है।"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी हो गईं, फिर उनमें पानी आ गया। उसने अपनी कटी कलाई उठाकर आँखों के पास लाई, जैसे पोंछना चाहता हो पर पोंछ न सके। वो बस हवा में लटकी रह गई।
"बेटा," वो फुसफुसाया, "तुम्हें पता है तुम क्या कह रहे हो? ठाकुर के आदमी वहाँ हैं।"
"तो मैं भी वहाँ जाऊँगा," मैंने कहा। "और वो भी।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। टिंकू पहले से अपनी टोकरी की तरफ़ बढ़ चुका था।
"भाई," उसने कहा, और उसकी टोपी तिरछी थी, "मैं चलता हूँ। बहाना ये बनाऊँगा कि शहर में लड्डू बेचने गया हूँ।" उसने टोकरी उठाई और उसका ढक्कन खोलकर अंदर झाँका। "बारह लड्डू हैं।" उसने मुँह बनाया। "तेरह चाहिए। एक मैं रास्ते में खा जाऊँगा।"
"तू तो हर बहाने से खा ही जाता है," मैंने कहा।
"भूख लगी है भाई, क्या करूँ।" उसने टोकरी कंधे पर रखी। "वैसे भी, अगर मैं लड्डू बेचने नहीं गया और ठाकुर के आदमियों ने मुझे पहचान लिया, तो मैं कहूँगा कि तेरे लिए खीर ले जा रहा हूँ।"
मेरे पेट में हल्की हँसी उठी। पर वो हँसी ज़्यादा देर नहीं टिकी, क्योंकि तभी गुड़िया आगे आई।
"मैं भी चलूँगी।"
सरस्वती जी — माँ — ने तुरंत हाथ उठाया। "नहीं।"
"माँ—"
"मैंने नहीं कहा।" माँ की आवाज़ में वो चीज़ थी जो बहस नहीं करती। उन्होंने गुड़िया का हाथ पकड़ा। "तू घर जाएगी। आज इतना ही हुआ है कि—"
गुड़िया ने हाथ नहीं छुड़ाया। उसने बस माँ की तरफ़ देखा, और उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"माँ," वो बोली, और उसकी आवाज़ छोटी थी, "टिंकू भैया अकेले जाएँगे। उन्हें रास्ता नहीं पता।" उसने एक साँस ली। "मैं जानती हूँ कि तू डरती है। मैं भी डरती हूँ। पर अगर आज हम सब घर बैठ गए, तो जग्गू चाचा की बीवी का क्या होगा?"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। मैंने उनकी आँखों में वो चीज़ देखी जो वो कभी नहीं दिखातीं — हार। नहीं, हार नहीं। हिम्मत। एक ऐसी हिम्मत जो बेटी के शब्दों से आई थी।
फिर माँ ने अपना हाथ गुड़िया के सिर पर रखा। उँगलियाँ उसके बालों में फँस गईं, और वो एक पल रुकीं।
"जा," उन्होंने धीरे से कहा। "पर चुप्पी से जा। और किसी से एक शब्द मत बोलना। समझी?"
गुड़िया ने सिर हिलाया। फिर वो माँ से लिपट गई, एक छोटे से पल के लिए, और माँ ने उसे कसकर पकड़ा। मैंने अपनी नज़र हटा ली, क्योंकि वो पल मेरा नहीं था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "तू रुक।"
वो झिझकी। "वीर—"
"नहीं।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "ठाकुर कल मैदान में मेरा इंतज़ार करेगा। अगर आज मैं और तू दोनों शहर चले गए, और कुछ गड़बड़ हो गई, तो कल मैदान में कौन खड़ा होगा? तेरे पिता अकेले नहीं रह सकते।"
मीरा ने मेरी बात सुनी। मैंने उसकी आँखों में वो लड़ाई देखी जो वो खुद से लड़ रही थी। फिर उसने सिर हिलाया, छोटा-सा, और बोली, "ठीक है। पर अगर तूने एक भी खतरे की बात छुपाई, तो—"
"तो क्या?"
"तो मैं तुझे माफ़ नहीं करूँगी।"
"ये तो पहले से ही तय है," मैंने कहा। "तू मुझे अब तक माफ़ नहीं कर रही।"
उसके होंठ हिले — पूरी हँसी नहीं, बस एक कोना। पर वो काफ़ी था।
मैं बाहर निकला। रात अब भी काली थी, पर पूरब में एक हल्की पट्टी दिख रही थी — सुबह दूर नहीं थी। अखाड़े की मिट्टी की गंध मेरे मुँह में आई, और उसके साथ कुछ और भी — चूल्हे की जली लकड़ी, दूध की भाप, और वो सुखी घास की बू जो बैलगाड़ी के नीचे रखी जाती है।
कालू काका पीछे आए। "बैलगाड़ी तैयार है। पर बेटा, एक बात सुन।" उन्होंने आवाज़ धीमी की। "शहर के किनारे वाली बस्ती में जाने का रास्ता दो है। एक सीधा, पक्का। दूसरा — नहर के किनारे-किनारे, जो पुराने भट्ठों के पीछे से निकलता है।"
"दूसरा," मैंने कहा।
"सोच ले। वो रास्ता टूटा-फूटा है। अंधेरा है।"
"इसीलिए।" मैंने उनकी तरफ़ देखा। "पक्के रास्ते पर ठाकुर के आदमी होंगे।"
कालू काका ने सिर हिलाया। उनके चेहरे पर कुछ था जो मुझे समझ नहीं आया — न डर, न हिम्मत। कुछ बीच का।
टिंकू टोकरी सँभालकर गाड़ी पर बैठा। गुड़िया ने अपनी कॉपी कमर में खोंसी और गाड़ी के पीछे बैठ गई। मैंने जग्गू को देखा, जो दरवाज़े पर खड़ा था, और उसकी कटी कलाइयाँ अब भी हवा में थीं।
"चाचा," मैंने कहा, "हम तुम्हारी बीवी को लाएँगे। बच्चों को भी। बस तुम यहाँ रहो, और किसी को कुछ मत बताओ।"
उसने सिर हिलाया। उसकी आँखों से पानी बह रहा था और वो उसे पोंछ नहीं सकता था, इसलिए उसने चेहरा नीचे कर लिया।
हम चल पड़े। बैलगाड़ी की ज़मीन पर पहिए टूटी-फूटी सड़क पर कराहते थे। नहर किनारे की हवा ठंडी थी, और उसमें मछली और कीचड़ की गंध घुली थी।
गुड़िया मेरे कंधे से सटकर बैठी थी। कुछ देर बाद उसने कहा, "भैया।"
"हूँ।"
"अगर वहाँ ठाकुर के आदमी हों, तो?"
टिंकू ने पीछे से कहा, "तो मैं उन्हें लड्डू खिला दूँगा।"
"टिंकू भैया, तू हर बात को मज़ाक बना देता है।"
"अरे," टिंकू ने कहा, "मज़ाक नहीं है। सच में खिलाऊँगा। बारह लड्डू हैं। चार उनके, चार हमारे, चार बच्चों के।"
"और तेरा?" गुड़िया ने पूछा।
"मेरा?" टिंकू रुका। "मेरा तो पहले ही पेट में है।"
गुड़िया हँसी। छोटी हँसी, जो रात में दूर तक गई।
बस्ती सुबह की पहली रोशनी में मिली। ईंट के भट्ठों की काली चिमनियाँ आसमान में खड़ी थीं, और उनके बीच टीन और बोरी के बने घर थे। ज़मीन पर ईंटों की लाल धूल थी, और हवा में वो ख़ास गंध — जली मिट्टी, पसीना, और गोबर के उपले।
मैंने गाड़ी रोकी।
"वहाँ।" गुड़िया ने उँगली उठाई। "तीसरा घर।"
मैंने देखा। छोटा-सा टीन का घर, बाहर एक चूल्हा जल रहा था, और उस पर एक औरत बैठी थी। उसने सिर ढका हुआ था, और वो चूल्हे में लकड़ी डाल रही थी। बाहर, दस कदम दूर, एक आदमी खड़ा था — हाथ में लाठी, आँखें चारों तरफ़।
टिंकू ने टोकरी उठाई। "मैं जाता हूँ।"
"रुक," मैंने कहा। "अकेले नहीं।"
"भाई, अकेले ही जाना ठीक है। दो जने गए तो शक होगा।" उसने अपनी टोपी सीधी की। "मैं लड्डू वाला हूँ। मुझे कौन पूछेगा?"
वो सही था। मैंने सिर हिलाया। "पर टोकरी में से एक भी लड्डू मत खाना।"
"ये तो अन्याय है।"
वो हँसकर चला। मैंने उसे जाते देखा — दुबला, लंबा, टोकरी कंधे पर, टोपी तिरछी। वो बिलकुल वैसा दिख रहा था जैसा वो था। किसी को शक भी नहीं होता।
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