Spirit of a Fighter – Chapter 1101
"भवानी का हस्ताक्षर," जग्गू ने कहा। "जाली। साफ़ जाली — मैंने भवानी की लिखाई बहुत देखी थी। काग़ज़ पर भवानी के नाम से लिखा था कि अखाड़ा ठाकुर को सौंप दिया जाए। मैंने ठाकुर से कहा — ये भवानी का हाथ नहीं है। वो हँसा और बोला — भवानी का हाथ तो कल तक ही रहेगा।"
जग्गू रुका। उसकी साँस भारी हो रही थी। टिंकू ने फिर कटोरा उठाया, पर जग्गू ने सिर हिलाकर मना कर दिया।
"मैं उस कमरे में अकेला नहीं था। एक मुंशी था जो काग़ज़ों की नक़ल करता था। वो भी डरा हुआ था। ठाकुर बाहर गया तो मैंने उस मुंशी से कहा — एक फ़ोटो मुझे दे दे। फ़ोटो नहीं तो कुछ भी नहीं। उसने मना किया। मैंने कहा — मेरी जान जा रही है, तेरी कलम से कुछ नहीं जाएगा।"
"उसने दिया?" मैंने पूछा।
"एक नहीं, तीन फ़ोटो दी," जग्गू ने कहा। "तीन काग़ज़ों की। एक — अखाड़े की ज़मीन का जाली काग़ज़। दूसरा — भवानी के ख़िलाफ़ इल्ज़ाम की नक़ल। तीसरा —" उसने रुककर कमरे में सबको देखा, "उन्नीस पहलवानों की मौत का हिसाब, जिस पर ठाकुर के और भैरव के दस्तख़त थे।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई। "उन्नीस?"
"उन्नीस," जग्गू ने दोहराया। "बीस साल में। उन्नीस नाम। उन्नीस तारीख़ें। और हर नाम के आगे लिखा था — 'बीमारी'।"
कालू काका ने मुँह पर हाथ रख लिया। "उन्नीस… मैंने सोचा था शायद दस-बारह होंगे।"
"तुमने गिना नहीं," जग्गू ने कहा। "ठाकुर ने गिना। हर एक को। हर एक की तारीख़ याद रखी।"
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए। उनकी आवाज़ अब सख़्त थी। "वो फ़ोटो कहाँ हैं?"
जग्गू ने अपनी बाईं जेब की तरफ़ सिर झुकाया। "यहीं। बीस साल से इसी धोती की जेब में। हर रोज़। हर रात। जब सोता हूँ तो तकिये के नीचे रखता हूँ। कभी किसी को नहीं दिखाई। मेरी बीवी भी नहीं जानती।"
"तो निकालिए," शर्मा साहब ने कहा।
जग्गू ने अपनी बाईं बाँह उठाई। कटी कलाई जेब के मुँह तक गई, और फिर रुक गई। उसका चेहरा बदला। वो एक पल पत्थर की तरह जम गया।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
जग्गू ने धीरे से, बहुत धीरे से फुसफुसाया, "अगर मैं इसे निकालूँ और ये सबके सामने आ जाए, तो ठाकुर के आदमी मेरी बीवी को… मेरे बच्चों को…"
उसकी आवाज़ रुक गई। उसकी सफ़ेद दाढ़ी काँपने लगी। बूढ़ा आदमी, जिसने बीस साल चुप्पी में काटे थे, अब एक काग़ज़ के टुकड़े से डर रहा था।
मैं उसके घुटनों के पास बैठ गया। मैंने अपने हाथ आगे बढ़ाए और उसकी कटी कलाइयों को अपने हाथों में ले लिया। वो ठंडी थीं, खुरदरी, जैसे पुरानी मिट्टी।
"जग्गू काका," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भर्रा रही थी, पर मैंने उसे रोका नहीं। "मेरे पिता ने इसी अखाड़े की मिट्टी में अपनी जान दी। उन्होंने मरने से पहले किसी के लिए कुछ छोड़ा था — एक प्याला, एक काग़ज़, और एक ज़ुबान। मुझे नहीं पता था कि उस ज़ुबान को बोलने वाले और भी लोग हैं।" मैंने उसकी कलाइयों पर हल्का दबाव डाला। "अब पता चला। आप पहले से अकेले नहीं हैं।"
जग्गू ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो टपका नहीं।
"मैंने सोचा था," उसने कहा, आवाज़ ऐसी जैसे किसी कुएँ से आ रही हो, "कि ये फ़ोटो मेरे साथ दफ़न हो जाएगी। मैंने सोचा था कि ये काग़ज़ मेरे सीने पर रखकर मुझे जलाया जाएगा और सच भी जल जाएगा।" उसने रुककर साँस ली। "पर आज तुम्हें देखकर लगा कि भवानी का बेटा आख़िर आ ही गया। और भवानी का बेटा आया है तो मेरी फ़ोटो अब अकेली नहीं है।"
उसने अपनी बाँह फिर उठाई। "शर्मा साहब, आप मेरे बच्चों को सुरक्षा देंगे — लिखकर?"
शर्मा साहब ने एक पल सोचा। फिर अपनी जेब से काग़ज़ निकाला, कलम निकाली, और वहीं खड़े-खड़े लिखने लगे। "लिख रहा हूँ। दो सिपाही अभी आपके घर जाएँगे। आपके बीवी-बच्चों को थाने लाया जाएगा, वहाँ रात रुकेंगे।"
"ठाकुर के आदमी थाने तक आ सकते हैं," जग्गू ने कहा।
"आ सकते हैं," शर्मा साहब ने कहा, और अपना सिर उठाया। "पर मेरी वर्दी का सामना करेंगे। बीस साल मैंने भी बहुत कुछ देखकर आँखें बंद रखीं। आज नहीं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो पहले नहीं था — एक तरह की शांति, जैसे कोई बहुत लंबी लड़ाई का पहला सही कदम रखा गया हो।
जग्गू ने अपनी बाँह फिर जेब तक लाई। इस बार वो रुका नहीं। उसने कटी कलाई को जेब के अंदर धकेला, और मुँह से एक छोटी कराह निकली — काग़ज़ खींचने में तकलीफ़ हो रही थी।
"टिंकू," मैंने कहा। "जल्दी कर।"
टिंकू दौड़कर आया, घुटनों के बल बैठा, और अपनी पतली उँगलियाँ जग्गू की जेब में डालकर काग़ज़ बाहर निकाल लाया। वो मुड़ा हुआ था, पीला पड़ चुका था, किनारों से फटा हुआ। टिंकू ने उसे दोनों हाथों से पकड़कर जग्गू के सामने उठाया।
"ये वो तीन फ़ोटो हैं?" टिंकू ने पूछा।
जग्गू ने देखा। उसकी आँखें भर आईं। "हाँ। यही।"
मैंने काग़ज़ टिंकू के हाथ से लिया। उसे खोला। तीन फ़ोटो, एक-दूसरे पर मोड़ी हुईं, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने। स्याही हल्की हो गई थी, पर पढ़ी जा सकती थी।
पहली फ़ोटो — अखाड़े की ज़मीन का काग़ज़। नीचे भवानी सिंह का हस्ताक्षर, जाली। मैंने अपनी उँगली उस हस्ताक्षर पर रखी। मेरे पिता का नाम, पर किसी और का हाथ।
"ये जाली है," मैंने कहा।
"मैं जानता हूँ," जग्गू ने कहा। "पर अदालत को साबित करना होगा।"
"साबित होगा," रणवीर सिंह ने कहा। उन्होंने अपनी कुर्सी आगे सरकाई। "भवानी की लिखाई मेरे पास है। उसके ख़त। मैं मिलान करवाऊँगा।"
दूसरी फ़ोटो — भवानी पर लगे इल्ज़ाम का काग़ज़। इसमें लिखा था कि भवानी ने अखाड़े के पैसे हड़पे। मेरे हाथ काँपने लगे।
तीसरी फ़ोटो — वो हिसाब। उन्नीस नाम। उन्नीस तारीख़ें। और हर नाम के आगे वही लफ़्ज़ — "बीमारी"। कुछ नाम मैंने पहचाने — वो पहलवान जिनके बारे में गाँव में बात होती थी कि अचानक बीमार पड़े और चल बसे। कुछ नाम नए थे।
कमरे में खड़े सब लोग उस काग़ज़ के ऊपर झुक आए। मीरा ने अपनी उँगली एक नाम पर रखी और धीरे से बोली, "ये मेरे पिता के अखाड़े के पहलवान थे। इन्हें मैं बचपन में याद करती हूँ। ये मुझे उठाकर कंधे पर बैठाते थे।" उसकी आवाज़ टूट गई। "इनकी मौत को 'बुख़ार' कहा गया था।"
रणवीर सिंह ने अपना सिर नीचे कर लिया। "मुझे पता था," उन्होंने कहा, आवाज़ इतनी धीमी कि मुश्किल से सुनाई दी। "मुझे पता था कि कुछ गड़बड़ है। पर मेरे पास सबूत नहीं था। और मैं डर गया था।" उन्होंने अपनी सून्न टाँगों की तरफ़ देखा। "अपनी टाँगों से ज़्यादा अपनी बेटी से डरा था। मैंने सोचा — अगर मैं बोलूँगा, तो मीरा का क्या होगा।"
मीरा अपने पिता के पास गई। उसने उनका हाथ पकड़ा। कुछ नहीं बोली। बस पकड़ा।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर उसने कोई मज़ाक नहीं किया — जो उसकी आदत थी। इस बार वो चुप था।
"अब क्या?" कालू काका ने पूछा।
मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा। "अब वही जो बिस्सा ने कहा। कल भारत केसरी का मैदान है। ठाकुर खुद उस प्याले को 'जीत का जाम' कहेगा। और हम सब वहाँ होंगे।"
जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। "वो प्याला — वो तुम्हारे पास है?"
"है," मैंने कहा।
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