Spirit of a Fighter – Chapter 1099
मीरा ने काग़ज़ मेरे हाथ में दिया।
मैंने पढ़ा।
"वीर, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मतलब मैं नहीं रहा। और अगर ये शीशी तेरे हाथ लगी है, तो मतलब तुझे पता चल गया कि मैं कैसे मरा। तू समझदार है, इसलिए मैं तुझे सीधा बताता हूँ — ये शीशी पीना नहीं। इसमें जो है, वो दवा नहीं है। ये वही पानी है जो मुझे दिया गया था। मैंने इसे रोका, दोबारा पिया नहीं, पर शरीर में उतर चुका था। अब ये सिर्फ़ मेरे पास है, और मैं इसे तेरे लिए छोड़ रहा हूँ — सबूत के तौर पर। इसका रंग नीला है, क्योंकि मैंने इसमें कुछ मिलाया है। मैं जानता हूँ इसे कैसे पहचाना जाए। इसे कभी मत पीना। बस इसे संभालकर रखना। और एक दिन, जब सब सामने हो, तो इसे पंचायत के सामने खोलना। — तेरा पिता, भवानी सिंह।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"रंग नीला है," मैंने कहा, और शीशी उठाई।
उस शीशी में जो तरल था, वो पीला नहीं था जैसा देवेंद्र ने कहा था। वो नीला था — गहरा नीला, जैसे आसमान का टुकड़ा पिघलकर शीशी में आ गया हो।
"वो मुझे झूठ बोलकर गया," मैंने कहा। "उसने कहा था ये वही है जो मेरे पिता ने पिया था। पर ये वो नहीं है। ये मेरे पिता ने खुद बनाया है।"
कालू काका ने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा और आँखों से लगा लिया — जैसे किसी धर्मग्रंथ को छू रहे हों।
"ये उनकी लिखाई है," उन्होंने कहा। "मैं इसे पहचानता हूँ। भवानी सिंह के हाथ की लिखाई में 'ह' के नीचे हमेशा एक छोटी-सी रेखा होती थी। देखो — यहाँ भी है।"
टिंकू ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया, पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था।
"भैया," उसने कहा, "पापा ने तुम्हारे लिए छोड़ा है। सबूत।"
"नहीं," मैंने कहा। "उन्होंने सिर्फ़ सबूत नहीं छोड़ा। उन्होंने एक रास्ता छोड़ा है।"
मैंने शीशी उठाई, उसे लालटेन की रोशनी में घुमाया। नीला तरल उसमें घूमता रहा, और उसके अंदर एक चमक थी — जैसे किसी ने उसमें सितारे डाल दिए हों।
"ये पानी नहीं है," मीरा ने धीरे से कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने पढ़ा है," उसने कहा। "आयुर्वेद में, हमें सिखाया जाता है कि ज़हर को कैसे पहचानें। जब भवानी जैसा आदमी किसी ज़हर में कुछ मिलाता है, तो वो नीला रंग सिर्फ़ रंग नहीं होता। वो एक पहचान होती है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये वही पानी है जो पहलवानों को पिलाया गया था — पर भवानी ने इसमें अपनी दवा मिला दी है। ये अब ज़हर नहीं है। ये इसका तोड़ है।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"तो मैं इसे पी सकता हूँ?"
"नहीं," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़ोर था जो आमतौर पर मुझे चिढ़ाता था, पर आज राहत देता था। "एक घूँट भी नहीं। पहले हमें ये जानना है कि इसमें क्या-क्या है। ये अकेले हमारे हाथ में नहीं पीना चाहिए।"
मैंने सिर हिलाया।
उसी वक़्त फाटक पर लाठी की आवाज़ हुई। एक, दो, तीन — धीरे-धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी चल रहा हो।
सब सतर्क हो गए। करण ने अपना हाथ तलवार पर रख लिया।
मैं उठा। मेरी टाँगें दर्द कर रही थीं, पर मैं खड़ा था।
फाटक धीरे से खुला।
एक आदमी अंदर आया।
वो बहुत दुबला था — इतना दुबला कि हड्डियाँ कपड़े के नीचे गिनी जा सकती थीं। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और आँखें धँसी हुईं। उसने सिर पर मैला-सा कपड़ा बाँधा हुआ था और शरीर पर फटी हुई मिर्जई। एक हाथ में लाठी थी जिस पर वो टेक रहा था।
पर जो चीज़ सबसे पहले नज़र आई, वो उसके हाथ थे।
दोनों हाथ कलाई से नहीं थे।
कलाई के ऊपर से कपड़ा बँधा था, और कपड़े पर पुराने खून के धब्बे थे।
वो आगे बढ़ा। उसकी लाठी ज़मीन पर टकरा रही थी — टक, टक, टक।
मेरे सामने आकर वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी धँसी आँखों में कुछ चमका।
"तुम वीर सिंह हो?"
"हाँ।"
वो अपनी लाठी छोड़कर घुटनों के बल गिरा। मैंने उसे रोकना चाहा, पर वो पहले ही मेरे पैरों पर गिर चुका था।
"मैं बब्बर का साथी था," वो बोला। आवाज़ में काँपन था, पर शब्द साफ़ थे। "बीस साल पहले, उसी रात, उसी मकबरे में, ठाकुर ने मेरे हाथ कटवा दिए थे। मैंने कुछ देखा था जो मुझे नहीं देखना चाहिए था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"मैं गवाही दूँगा," वो बोला। "जो मैंने बीस साल छुपाया है, वो सब बोलूँगा। पर —"
वो रुका। उसने अपना सिर उठाया और मेरी आँखों में देखा।
"पर एक बात पहले सुन लो। जो शीशी तुम्हारे पास है, उसका असली नाम 'मोहन का पानी' नहीं है। उसका असली नाम तुम्हारे पिता भवानी ने रखा था, जब उन्होंने इसे आख़िरी बार अपने हाथ में पकड़ा था। उन्होंने उसे 'अंतिम प्याला' कहा था।"
मैंने शीशी की तरफ़ देखा। नीला तरल लालटेन की रोशनी में चमक रहा था।
"
"अंतिम प्याला," मैंने धीरे से दोहराया। ज़ुबान पर नाम रखते ही मुँह में एक अजीब-सा स्वाद आ गया — कड़वा, ठंडा।
बूढ़े ने मेरी आँखों में देखा। उसकी धँसी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रहा था। वो शायद रोने की आदत छोड़ चुका था।
"तुम्हारे पिता ने उसे बनाया था," वो बोला, आवाज़ धीमी, पर हर शब्द पत्थर की तरह गिरता। "ठाकुर के लिए। पर ठाकुर को ये पता नहीं था कि इसमें उसका ज़हर नहीं, उसका इलाज है। भवानी ने उसे उल्टा खेल दिखाया। ठाकुर ने अपने ही हाथों से अपना हथियार भवानी को सौंप दिया।"
"आपका नाम?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर हाथ काँप रहे थे।
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा। "बिस्मिल्लाह। पर सब मुझे बिस्सा कहते थे।" उसने अपनी बाँहें ऊपर उठाईं — दोनों कटी कलाइयाँ लालटेन की रोशनी में दिखीं। "अब बिस्सा ही हूँ।"
कालू काका आगे आए। उन्होंने बिस्सा के कंधे पर हाथ रखा। "तुम ज़िंदा हो," उन्होंने कहा। आवाज़ भर्राई हुई थी। "बीस साल से मैं तुम्हें मरा हुआ मानता रहा।"
"मरा तो हूँ, काका।" बिस्सा ने नीचे देखा। "बस साँस ले रहा हूँ।"
मैंने शीशी उसके सामने रख दी। "आपने इसे पहचाना। इसका असली नाम बताया। इसका मतलब है आप जानते हैं इसमें क्या है।"
बिस्सा ने शीशी की तरफ़ देखा — बिना हाथ, बिना छुए, सिर्फ़ आँखों से। "तुम्हारे पिता ने इसे बनाया था उस रात के बाद जब ठाकुर ने मेरे हाथ लिए। मैं उस मकबरे में खून में लथपथ पड़ा था। भवानी आया — अपने हाथों में मुझे उठाया और बोला, 'बिस्सा, ज़िंदा रहना। ये प्याला तेरे लिए नहीं है। ये उसके लिए है जो आख़िर में सच बोलेगा।'"
"फिर वो क्या है?" मैंने पूछा।
बिस्सा का चेहरा बदला। कुछ पल वो चुप रहा। फिर बोला, "ये ज़हर नहीं है, वीर। ये वो पानी है जो तुम्हारे पिता ने उसी मिट्टी से बनाया था जिसमें उनका खून गिरा था। ये इलाज भी नहीं है।" उसने रुककर मेरी आँखों में देखा। "ये एक गवाही है। एक ऐसी गवाही जो हर उस आदमी के गले में उतरेगी जो झूठ बोलेगा। जो सच बोलेगा, वो बच जाएगा। और जो झूठ बोलेगा —"
वो रुक गया।
"उसका गला बंद हो जाएगा।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। मीरा ने रुमाल से अपना मुँह ढक लिया। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
बिस्सा ने अपना सिर झुकाया, और उसकी आवाज़ सबसे धीमी हो गई, "कल ठाकुर इसे पीएगा। सबके सामने। क्योंकि वो खुद इसे 'अपनी जीत का जाम' कहेगा। और जिस दिन वो इसे पीएगा, उस दिन सच उसके गले से निकलेगा — या उसका गला बंद हो जाएगा।"
उसने मेरी तरफ़ आख़िरी बार देखा। "तुम्हारे पिता ने ये तुम्हारे लिए नहीं छोड़ा था, वीर। उन्होंने ये उसके लिए छोड़ा था। तुम्हें बस उसे पिलाना है।"
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