Spirit of a Fighter – Chapter 1098
"चंदा!" मैंने आवाज़ दी और सीढ़ियाँ उतरने लगा।
मेरे पीछे मीरा आई, फिर कालू काका, फिर टिंकू।
मैंने पहले उसके मुँह का कपड़ा खोला। उसने एक लंबी साँस ली, फिर ज़ोर से खाँसी, फिर फुसफुसाई, "पानी।"
टिंकू ने अपनी कमर से लोटा निकाला — वो हमेशा लोटा लेकर चलता है, भगवान जाने क्यों — और उसे पानी पिलाया।
मैंने उसके हाथ खोले। कलाइयों पर रस्सी के निशान गहरे थे, खून सूखा हुआ था।
"मेरी माँ," चंदा बोली। आवाज़ टूटी हुई थी। "वो उन्होंने ली। मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी — वो रो रही थी और फिर चुप हो गई। वो उसे मार देंगे —"
"वो ज़िंदा है," मैंने कहा। "वो ऊपर है। बैलगाड़ी में। तेरा इंतज़ार कर रही है।"
चंदा की आँखें भर आईं। उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ आँसू थे, और वो मेरे गले में लिपट गई — छोटी बच्ची की तरह, जैसे कोई सालों बाद रिश्तेदार मिला हो।
मैंने उसकी पीठ पर हाथ रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने देखा कि मैं उसकी पीठ सहला रहा हूँ — वैसे ही जैसे माँ सहलाती थी जब मैं बचपन में डर जाता था।
मीरा ने उसकी नाड़ी पकड़ी और आँखें बंद करके कुछ गिना। फिर वो गंभीर हो गई।
"इसे ज़हर दिया गया है," उसने कहा। "कम मात्रा में, पर रोज़। शायद दो-तीन दिन से।"
"ये बचेगी?" मैंने पूछा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मुझे समझ नहीं आया — वो नरमी जो खतरे के वक़्त आती है।
"ज़हर कम है," उसने कहा। "और इसकी हिम्मत बहुत ज़्यादा है। ये बच जाएगी।"
चंदा ने मेरी बनियान पकड़ी।
"वो कहता था," उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में थी, "कि अगर तुम आए, तो मुझे मार देगा। पर मैंने कहा — आएगा। भवानी का बेटा है।"
मेरी आँखों में कुछ चुभा। मैंने उसे अपने सहारे खड़ा किया, और उसका हाथ अपने कंधे पर रखा।
"मैं आया," मैंने कहा। "अब चल, तेरी माँ इंतज़ार कर रही है।"
हम ऊपर निकले तो आसमान का रंग बदल चुका था। अब पूरा पूरब लाल था, और पक्षी चहचहाने लगे थे।
बैलगाड़ी के पास चंदा की माँ लेटी थी। वो कमज़ोर थी, हिल नहीं सकती थी, बस आँखें खुली थीं और आसमान देख रही थी।
चंदा ने उसे देखा और दौड़ पड़ी — नहीं, दौड़ नहीं पाई, वो लड़खड़ाई, गिरी, फिर घुटनों के बल रेंगकर आगे बढ़ी — और उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ा।
माँ ने सिर घुमाया।
उसने अपनी बेटी को देखा।
ग्यारह साल बाद।
उसके होंठ हिले — कोई आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ आँसू। एक आँसू उसकी कनपटी से बहकर कान में गया और चादर पर गिर गया।
चंदा ने अपनी माँ का हाथ अपने सीने से लगा लिया। उसने अपना माथा माँ के माथे से टिका दिया। दोनों कुछ नहीं बोले। बस रोए।
साठ-सत्तर लोग खड़े थे, मशालें हाथों में, और किसी ने एक शब्द नहीं कहा। सिर्फ़ पक्षियों की आवाज़ और बैलगाड़ी के बैल की घंटी।
सुक्खी बुआ ने अपना पल्ला उठाकर आँखें पोंछीं और धीरे से बोलीं, "अरे, मैंने तो सुना है कि माँ-बेटी का नाता खून से नहीं, इंतज़ार से बनता है।"
किसी ने कुछ नहीं कहा। पर सबने सिर हिलाया।
मीरा मेरे पास आई। उसने धीरे से कहा, "अब अखाड़े चलें। इसे आराम चाहिए। और तुम्हें —"
"मुझे क्या?"
"तुम्हें भी," उसने कहा, और अपनी उँगली मेरे माथे पर रखी, जहाँ पसीना सूखकर नमक बन गया था।
हम अखाड़े लौटे तो सूरज निकल चुका था। मिट्टी पर पहली किरण पड़ी और उसका रंग लाल हो गया — वही लाल, जो भवानी की धोती का था, जो अखाड़े की मिट्टी का था, जो मेरे खून का था।
अखाड़े के आँगन में चारपाइयाँ बिछाई गईं। चंदा की माँ को एक पर लेटाया गया। मीरा ने अपनी थैली से कुछ जड़ी-बूटियाँ निकालीं और टिंकू को पानी उबालने भेजा।
"तुमने कुछ खाया?" मीरा ने मुझसे पूछा।
"नहीं।"
"तो पहले खाओ।"
"मीरा —"
"वीर सिंह," उसने कहा, और मेरा नाम उसके मुँह से फिर एक दुआ जैसा लगा। "अगर तुम गिर गए, तो ये सब जो तुमने बचाया है, कौन सँभालेगा?"
मैंने सिर हिलाया। टिंकू ने रोटी और गुड़ लाकर रखा, और मैंने खाया। पहला निवाला मुँह में रखा और मुझे माँ की याद आई — उसकी हाथ की रोटी, जिस पर घी लगाकर वो देती थी, और कहती थी "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा।"
माँ कहाँ है अभी?
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने मेरी आँखें पढ़ लीं।
"मैंने भेज दिया है," उसने कहा। "करण के दो आदमी भट्ठे पर हैं। माँ ठीक हैं। गुड़िया सो रही है। उसने बहुत रोया, फिर भूख लगी, तो दो रोटी खाई, फिर सो गई।"
मेरे भीतर कुछ ढीला हुआ।
दिन चढ़ने लगा। लोग आते-जाते रहे। कुछ लोग चंदा की माँ को देखने आए, कुछ ने दूध भेजा, कुछ ने फल। सुक्खी बुआ ने कहा, "अरे वो ठाकुर की बेटी है न! हम क्यों भेजें?" और फिर खुद ही चुप हो गईं, क्योंकि किसी ने कुछ नहीं कहा — बस सबने उनकी तरफ़ देखा। और सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा फेंका और बोलीं, "मैं तो मज़ाक कर रही थी। भेजो, भेजो।"
मैं हँसा — पहली बार कई दिनों में। छोटी-सी हँसी, जो गले से निकली और फिर हवा में गुम हो गई।
दोपहर के वक़्त चंदा आई। उसने मेरे सामने हाथ जोड़े।
"मैं तुम्हारी कुछ नहीं हूँ," वो बोली। "न रिश्तेदार, न गाँव की। मेरे पिता ने तुम्हारे पिता को मारा। और तुमने मुझे — और मेरी माँ को — बचाया।"
"तू ठाकुर की बेटी है," मैंने कहा। "पर ठाकुर नहीं है।"
वो चुप हो गई। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी गोली निकाली — सफ़ेद, जड़ी-बूटी की।
"ये माँ को दे देना," उसने कहा। "मैंने इसे छुपाकर रखा था। पिता को पता नहीं चला। मैं जानती थी मैं कभी भाग नहीं पाऊँगी, पर एक दिन कोई आएगा जो माँ को बचाएगा।"
मैंने गोली ली। वो ठंडी थी।
"तू आएगी मेरे साथ?" मैंने पूछा। "गवाही देने?"
"अगर माँ ठीक हो जाए," उसने कहा, "तो मैं वो सारी बातें बोलूँगी जो मैंने ग्यारह साल में सुनी हैं। हर रात, हर बात। मुझे सब याद है।"
शाम हो गई। मैं आँगन में बैठा था, पीठ दीवार से टिकाए, और मेरी टाँगें इतनी भारी थीं कि लगा ज़मीन में धँस गई हैं। मीरा मेरे पास बैठी थी और कुछ नहीं बोल रही थी। बस बैठी थी।
टिंकू ने चाय बनाई। चाय में अदरक था और उसमें गुड़ था — वोी गुड़ जो वो अपनी दुकान से लाया था, और मुझे उसकी गंध से शेराज़ की याद आई, और मैंने चाय पी ली, क्योंकि भूख और डर दोनों को एक ही चीज़ से हराया जाता है — गरम चाय।
"वीर," मीरा ने कहा। "वो शीशी।"
मैंने जेब से शीशी निकाली। रुमाल में लिपटी हुई।
"अब खोलें?" मैंने पूछा।
"अंधेरा होने दो," उसने कहा। "बत्ती जलाओ, फिर खोलेंगे। इस तरह, अगर काग़ज़ सूखा हो, तो फटेगा नहीं।"
रात ग्यारह बजे। अखाड़े के कमरे में एक लालटेन जल रही थी। मैं, मीरा, टिंकू, करण और कालू काका — पाँच लोग।
मीरा ने शीशी को एक साफ़ कपड़े पर रखा। फिर उसने अपनी थैली से एक पतली-सी लोहे की सुई निकाली।
"टिंकू," उसने कहा, "लालटेन ऊपर कर।"
टिंकू ने लालटेन ऊपर की। मीरा ने सुई को शीशी के मुँह में डाला और धीरे-धीरे घुमाया। मैंने अपनी साँस रोक ली।
एक हल्की 'टिक' हुई।
मीरा ने सुई बाहर खींची। सुई के सिरे पर एक काग़ज़ का कोना था — हल्का पीला, गीला, पर साबुत।
उसने उसे धीरे से खींचा। काग़ज़ बाहर आया — तीन उँगली लंबा, दो उँगली चौड़ा। उस पर स्याही से लिखा था — नीली स्याही, जो पानी में थोड़ी फैल गई थी, पर पढ़ी जा सकती थी।
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