Spirit of a Fighter – Chapter 1097
"वो मुझे डरा रहा है," मैंने कहा। "डराने वाला वही होता है जिसके पास और कोई रास्ता न बचा हो। चलो।"
हम बाहर निकले। सामने नीम का पेड़ था और उसके नीचे करण के छह आदमी मशालें लिए खड़े थे। मशालों की लौ पूरब की तरफ़ झुक रही थी — हवा आ रही थी, और उसमें नमी थी। सुबह से पहले बारिश।
"गाँव को खबर करो," मैंने करण से कहा। "जो हिम्मत कर सके, वो कब्रिस्तान की तरफ़ आए। मशालें लेकर आए, लालटेन लेकर आए। और हाँ — बैलगाड़ियाँ। चंदा को उठाकर लाना है, उसे पैदल नहीं चलाऊँगा।"
करण ने एक आदमी को इशारा किया। वो दौड़ा।
मीरा ने बेहोश औरत के पास घुटने टेके। उसकी नाड़ी देखी, पलकें उठाकर आँखें देखीं, और फिर अपनी थैली से एक छोटी पुड़िया निकाली।
"इसे सुँघाओ," उसने कहा।
टिंकू ने पुड़िया खोली। उसमें से तेज़, चुभती गंध आई — अजवाइन और पुदीना और कुछ जो मैं पहचान नहीं पाया।
औरत की साँस तेज़ हुई, फिर उसके होंठ हिले और उसने आँखें खोलीं। वो एक पल के लिए घबराकर इधर-उधर देखने लगी, फिर मीरा को देखा, और उसकी आँखों में पानी आ गया।
"मैं कहाँ हूँ?" उसकी आवाज़ किसी चीज़ से घिसी हुई थी।
"अखाड़े के पास," मीरा ने कहा। "तुम सुरक्षित हो। तुम्हारा नाम क्या है?"
औरत ने कुछ सोचा। फिर उसके चेहरे पर एक अजीब-सा डर आया, और वो अपने हाथ की तरफ़ देखने लगी — जैसे पहली बार देख रही हो कि उसके हाथ उसके हैं या नहीं।
"चंदा," वो फुसफुसाई। "मेरी चंदा… वो उसे ले गए।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
"तुम चंदा की माँ हो?"
उसने सिर हिलाया। फिर उसने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया — सूखा हाथ, हड्डियाँ उभरी हुईं, नाखून टूटे हुए। "तुम वीर हो? भवानी के बेटे?"
"हाँ।"
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, पर आवाज़ नहीं फूटी। बस होंठ काँपे।
"मैंने सुना था तुम्हें," वो बोली। "कोठे में, रोज़ रात, मैं सुनती थी कि तुम्हारे बारे में बात होती है। ठाकुर कहता था तुम्हारा सिर चाहिए। और मैं हर रात सोचती थी — जो मेरी बेटी को ज़िंदा रखे, वोी मेरा भी बेटा है।"
मेरा गला भर आया। मैं कुछ बोल नहीं पाया, इसलिए सिर झुका लिया।
टिंकू ने मेरा कंधा हल्का थपथपाया और धीरे से बोला, "भैया, बैलगाड़ी आई।"
बाहर ग्यारह बैलगाड़ियाँ खड़ी थीं और उनके साथ साठ-सत्तर लोग। हाथों में मशालें, लालटेनें, कुछ के हाथ में लाठियाँ, कुछ के हाथ में डंडे। सबसे आगे सुक्खी बुआ खड़ी थीं — चमकीली साड़ी में, हाथ में पान का बीड़ा, और आँखों में वो चमक जो गाँव ने अब तक उनके चुगली करने में ही देखी थी।
"अरे वीर," वो बोलीं, "मैंने कहा था न मैं भी आऊँगी। गाँव में सब ऐसे बैठे हैं जैसे कोई मर गया हो। मैंने कहा — आज मरने का दिन नहीं, देखने का दिन है।"
कुछ लोग हँसे। और उस हँसी में डर भी था, पर साथ में कुछ और भी था — जो पहले गाँव में नहीं था।
मैंने चंदा की माँ को बैलगाड़ी में बिठाया। मीरा उसके साथ बैठ गई। टिंकू ने लालटेन मेरे हाथ में थमाई और खुद मेरे पीछे चल पड़ा।
"कब्रिस्तान का रास्ता जानता है कोई?" मैंने पूछा।
कालू काका आगे आए। उनकी आँखें लाल थीं और हाथ काँप रहे थे, पर वो सीधे खड़े थे।
"मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा। "पुराना मकबरा — वो जगह जहाँ भवानी की हड्डियाँ ले जाई गईं। मुझे पता है क्योंकि मैंने बीस साल पहले उस रात भैरव को वहाँ जाते देखा था। मैंने सोचा था वो कुछ गाड़ रहा है। पर वो कुछ गाड़ नहीं रहा था — वो कुछ छिपा रहा था।"
रास्ते में करण मेरे पास बैलगाड़ी की बगल में चलने लगा।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "देवेंद्र ने जाते वक़्त एक बात और कही थी। मैंने तुम्हें नहीं बताया, क्योंकि मुझे खुद समझ नहीं आ रही थी।"
"क्या?"
"उसने कहा — 'उस मकबरे में जो है, वो मेरा नहीं है। वो मेरे बाप का है। और मेरे बाप ने उसे वहाँ इसलिए रखा था कि जिस दिन कोई उसे ढूँढे, उस दिन वो खुद भी मर जाए।'"
मैंने करण की तरफ़ देखा। हवा तेज़ हो गई थी और मशालों की लौ काँपने लगी थीं।
"उसका बाप?" मैंने पूछा। "देवेंद्र का बाप कौन था?"
करण ने कुछ देर मेरी आँखों में देखा। फिर बोला, "वोी जिसने भवानी को पहला प्याला दिया था। जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं है। जिसका नाम सिर्फ़ गंगा देवी जानती थी — और आज सुबह उसने वो नाम अपने साथ ले लिया।"
मैं रुक गया। "गंगा देवी मरी?"
"पता नहीं। पर इंस्पेक्टर शर्मा ने फ़ोन पर बताया कि हिरासत में ले जाते वक़्त वो अचानक बैठ गई, फिर लेट गई, और फिर साँस लेना बंद कर दिया। उसके होंठों पर झाग था। वो ज़हर खा चुकी थी — पहले से छुपाकर रखा हुआ, दाँत के नीचे।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। गंगा देवी — भवानी की चचेरी बहन, भैरव की माँ — उसने अपना आख़िरी काम कर दिया था। वो जेल में ज़िंदा नहीं रहना चाहती थी, क्योंकि ज़िंदा रहने का मतलब था — बोलना।
"तो अब वो नाम किसी को नहीं पता," मैंने कहा।
"कोई एक जानता है," करण ने कहा। "वो मकबरा। अगर वहाँ कुछ लिखा है, तो वहाँ लिखा है।"
हम कब्रिस्तान पहुँचे तो पौ फटने में अभी देर थी। आसमान में तारे थे, पर पूरब की तरफ़ आसमान का रंग बदल रहा था — जैसे किसी ने नीले रंग में थोड़ा सा गेरू घोल दिया हो।
कब्रिस्तान के फाटक पर एक पुराना ताला लटक रहा था, पर वो टूटा हुआ था। टिंकू ने उसे छुआ, तो वो खुलकर गिर पड़ा।
"अभी-अभी खुला है," टिंकू ने कहा। "जंग ताज़ी है।"
मैंने आँखें बंद कीं और फिर लंबी साँस ली। हवा में चीज़ें मिल रही थीं — मिट्टी की नमी, जली लकड़ी की कड़वाहट, और वो वाली।
कपूर। ताज़ा कपूर।
"रुको," मैंने कहा।
सब रुक गए। मैं आगे बढ़ा, पाँच कदम, फिर दस। मिट्टी पर नए-नए जले कपूर की गंध आ रही थी, और उसके साथ हल्दी — सूखी हल्दी, जो माथे के टीके में होती है। और उसके नीचे, बहुत हल्की, खीर की गंध। ज़ाफ़रान वाली खीर, जो गाँव में किसी के घर खुशी में बनती है।
"यहाँ कोई आया है," मैंने कहा। "अभी। ज़्यादा से ज़्यादा एक घंटा पहले।"
कालू काका आगे आए और उन्होंने अपनी लालटेन उठाई। रोशनी में कब्रों के पत्थर चमक रहे थे, और सबसे आख़िर में, एक बड़ा-सा गुम्बद वाला मकबरा खड़ा था जिसकी दीवारों पर काई उगी थी।
"वो," कालू काका ने उँगली उठाई। "वही है। बीस साल पहले यहाँ राजा-रजवाड़ों के लोग दबे थे। अब कोई नहीं आता।"
"तो ये कपूर?" मीरा ने पूछा।
"यही तो सवाल है," मैंने कहा।
मैं मकबरे की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर लोहे का जाल था, और जाल के नीचे एक पत्थर का स्लैब। मैंने स्लैब पर हाथ रखा — ठंडा था, पर उसके किनारे गरम थे।
"ये स्लैब अभी हटाया गया है," मैंने कहा। "देखो — किनारे पर मिट्टी नहीं है। जब कोई पत्थर उठाकर रखता है, तो किनारों पर मिट्टी का निशान रह जाता है। यहाँ साफ़ है।"
कालू काका ने अपनी लाठी स्लैब के नीचे लगाई। करण और दो और आदमी साथ आए। उन्होंने ज़ोर लगाया, और स्लैब सरकने लगा — धीरे-धीरे, पत्थर की चरचराहट के साथ।
और फिर मुँह खुला।
ईंटों की सीढ़ियाँ नीचे जाती थीं। सीढ़ियों से ठंडी हवा आ रही थी — इतनी ठंडी कि मेरे पसीने से भीगी बनियान चिपक गई।
मैंने लालटेन ऊपर उठाई।
सीढ़ियों के नीचे रोशनी गई, और उस रोशनी में मुझे वो दिखा जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
चंदा बैठी थी।
हाथ पीछे बँधे हुए, मुँह पर कपड़ा, पैर रस्सी से बँधे। उसकी आँखें खुली थीं और वो सीधे रोशनी की तरफ़ देख रही थी। और उन आँखों में डर नहीं था। थकान थी, भूख थी, पर डर नहीं था।
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