Spirit of a Fighter1096 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1096

7 min read November 5, 2026

मेरा दिमाग़ घूम गया।

मैंने चंदा की तरफ़ देखा — वो अब भी मीरा से चिपकी थी, पर उसकी आँखें अब रो नहीं रही थीं। वो सीधे मुझे देख रही थी। और उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो बंधक की आँखों में होता है।

उसमें कुछ और था।

मैंने एक कदम उसकी तरफ़ बढ़ाया। गंध को करीब से लिया।

और तभी मुझे पता चला।

"ये चंदा नहीं है," मैंने कहा।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या?"

"इसके हाथ ठंडे हैं," मैंने कहा, "क्योंकि ये अभी-अभी बाहर से आई है। इसके कपड़ों में नहर की गंध नहीं है — इसके कपड़ों में कोठी के पीछे वाले कुएँ की गंध है। ये चंदा है, पर ये वही चंदा नहीं जो मैंने अभी मीरा की बाँहों में देखी थी।"

मैंने देवेंद्र की तरफ़ देखा।

"तूने चंदा की जगह किसी और को बिठा दिया," मैंने कहा। "वो असली चंदा को कहीं और ले गया। और ये — ये औरत तेरी कोई जानने वाली है।"

देवेंद्र का चेहरा एक पल के लिए टूटा। फिर उसने हँसी छोड़ दी — छोटी, थकी हुई हँसी।

"बहुत तेज़ हो, वीर सिंह," उसने कहा। "मुझे यही डर था। इसीलिए मैंने उसे तुम्हारे सामने नहीं लाया। और अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं — या तो तुम मेरी बात मानो, या फिर अपनी बहन को मरे हुए देखो।"

उसने पीली शीशी मेरी तरफ़ बढ़ाई।

"ये लो," उसने कहा। "इसमें सिर्फ़ एक घूँट है। अगर तुम पीयोगे, तो मैं तुम्हें बताऊँगा कि असली चंदा कहाँ है। और अगर नहीं पियोगे — तो कल सुबह तुम्हें ख़बर मिलेगी।"

मैंने शीशी देखी। फिर उसकी आँखों में देखा।

"तू मुझे ज़हर पिलाकर चंदा की जगह पूछेगा?" मैंने कहा। "तू समझता है मैं इतना बेवकूफ़ हूँ?"

"नहीं," देवेंद्र ने कहा। "मैं समझता हूँ कि तू अपनी बहन से प्यार करता है। और मैं जानता हूँ कि तू अपने पिता की हड्डियों को अकेला नहीं छोड़ेगा।"

वो उठा। उसने शीशी मेरे हाथ में रख दी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"कल सुबह आठ बजे," उसने कहा। "मैदान में। और लड्डू मत लाना — मुझे मिठाई पसंद नहीं।"

वो पलटा। करण ने रास्ता रोकना चाहा, पर मैंने हाथ उठा दिया।

"जाने दो," मैंने कहा।

करण ने मेरी तरफ़ देखा। "पर वो —"

"जाने दो," मैंने दोहराया, और मेरी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने खुद कभी नहीं सुनी थी। "वो कल आएगा। मैदान में। और वहीं हिसाब होगा।"

देवेंद्र दरवाज़े तक पहुँचा। वो रुका। उसने पलटकर देखा — और उसकी नज़र मेरे हाथ में पकड़ी पीली शीशी पर पड़ी।

"अच्छा," उसने कहा। "एक बात और। वो शीशी भवानी की नहीं है। वो मेरी है। और उसमें जो है, वो तुम्हारे पिता ने मरने से पहले पिया था। इसीलिए वो मरा।"

और वो चला गया।

मेरे हाथ में शीशी थी, और उसकी ठंडक पहले से भी ज़्यादा ठंडी लग रही थी।

टिंकू मेरे पास आया। उसने धीरे से कहा, "भैया, वो झूठ बोल रहा है।"

"हाँ," मैंने कहा। "पर इतनी आसानी से नहीं जानेंगे। वो शीशी मुझे देकर गया है — इसका मतलब वो चाहता है कि मैं इसे खोलूँ। और मैं इसे खोलूँगा, पर अपने वक़्त पर।"

मीरा आगे आई। उसने नकली चंदा की तरफ़ देखा — वो बेहोश होकर फ़र्श पर बैठी थी, करण के आदमी उसे सँभाल रहे थे।

"इसे उठाकर अखाड़े ले चलो," मीरा ने कहा। "इसके हाथ पर जो निशान है — वो किसी अखाड़े का नहीं है। ये भट्ठे की मिट्टी है।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"वीर," उसने कहा। "तुम्हारे पिता की कब्र पर जो सुरंग है — वो सच में है?"

मैंने याद किया। उस रात, कब्र खोदते वक़्त, मुझे जली मिट्टी की गंध आई थी। और उसके नीचे कुछ और भी था — एक गहरी, ठंडी हवा जो नीचे से आ रही थी।

"हाँ," मैंने कहा। "वहाँ नीचे कुछ है।"

टिंकू ने कहा, "तो चलते हैं।"

"नहीं," मैंने कहा। "अभी नहीं। पहले ये जानना है कि ये औरत कौन है। और फिर — फिर हम कब्र पर जाएँगे। पर अकेले नहीं।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"तुम्हारे पिता," मैंने कहा। "वो अब भी व्हीलचेयर पर हैं?"

मीरा ने सिर हिलाया। "पर वो —"

"उन्हें बुलाओ," मैंने कहा। "आज रात, कब्र पर। वो भवानी के सबसे पुराने साथी हैं। अगर किसी को पता होगा कि उस सुरंग में क्या है, तो उन्हें होगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला — जैसे किसी ने अंधेरे कमरे में दीया जलाया हो।

"वीर सिंह," उसने धीरे से कहा, और मेरा नाम उसके मुँह से एक दुआ जैसा लगा।

मैंने शीशी अपनी जेब में रखी। फिर मैंने मुड़कर सबकी तरफ़ देखा — टिंकू, करण, मीरा, और बेहोश पड़ी वो औरत।

"आज रात," मैंने कहा, "हम कब्र पर जाएँगे। और जो भी वहाँ होगा — सच या झूठ — वो बाहर आएगा।"

मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। बाहर अंधेरा था, और दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।

तभी मेरी जेब में कुछ हिला।

मेरे हाथ नीचे गए। जेब में वो शीशी थी — और उसके अंदर कुछ खटखटा रहा था। जैसे शीशी के अंदर कोई छोटी सी चीज़ घूम रही हो।

मैंने शीशी बाहर निकाली। उसे हिलाया।

देवेंद्र ने कहा था — इसमें सिर्फ़ एक घूँट है।

पर जो शीशी मेरे हाथ में थी, वो आधी भरी थी। और उसके अंदर, तरल के नीचे, कुछ सफ़ेद दिख रहा था — दाँत जैसा कुछ।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरी आँखों में देखकर समझ गई।

"ये ज़हर नहीं है," मैंने कहा। "ये कुछ और है।"

और फिर उस शीशी के अंदर, तरल के नीचे, मुझे एक काग़ज़ का कोना दिखा — इतना छोटा कि शीशी के मुँह से बाहर नहीं आ सकता था।

मैंने शीशी को रोशनी में उठाया।

काग़ज़ पर कुछ लिखा था। छोटे अक्षरों में।

और जब मैंने उसे पढ़ा, तो मेरे हाथ से शीशी छूटने ही वाली थी।

उस पर लिखा था — "वीर, ये मत पीना। ये तेरी माँ के लिए है। — भवानी सिंह।"

॥

शीशी मेरे हाथ में थी और वो काँप रही थी — नहीं, काँप तो मैं रहा था, शीशी नहीं। टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ी, तो पता चला मेरी उँगलियाँ इतनी कसी हुई थीं कि नाखून हथेली में धँस गए थे।

"भैया," टिंकू ने धीरे से कहा, "काग़ज़ तो बाहर नहीं आएगा इस मुँह से। तोड़नी पड़ेगी।"

"नहीं तोड़ेंगे।"

मीरा ने शीशी मेरे हाथ से ली। उसने उसे लालटेन की रोशनी में घुमाया, फिर अपनी जेब से रुमाल निकाला और शीशी को उसमें लपेट दिया।

"अभी नहीं," वो बोली। "अगर भवानी सिंह ने इसके अंदर काग़ज़ रखा है, तो उस काग़ज़ में वो बात है जिसके लिए किसी ने जान दी है। इसे हवा में खोलेंगे तो टुकड़े हो जाएगा। किसी साफ़ जगह, किसी करारे कपड़े पर, आराम से।"

मैंने सिर हिलाया। गला सूखा हुआ था।

उस कोठे में उस वक़्त पाँच लोग थे — मैं, मीरा, टिंकू, करण, और बेहोश पड़ी वो औरत। बाहर अंधेरा इतना गाढ़ा था कि दरवाज़े का आकार भी नहीं दिख रहा था।

करण ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला। स्क्रीन पर बत्तीस मिस्ड कॉल पड़ी थीं। सब गाँव के लोगों की।

"देवेंद्र ने जाते वक़्त कुछ कहा था?" मैंने पूछा।

करण ने मोबाइल जेब में रखा और मुँह फेर लिया। कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, "कहा तो बहुत कुछ था। पर एक बात बार-बार कह रहा था — 'चंदा उसी मकबरे में है जहाँ भवानी की हड्डियाँ हैं। और वो मकबरा ज़मीन के नीचे है, जहाँ कोई ढूँढने नहीं जाता।'"

"और?"

"और ये भी कहा कि अगर तुम उसे ढूँढने जाओगे, तो जो तुमने आज रात जीता है, वो सब खो दोगे।"

मैंने करण की तरफ़ देखा। उसका चेहरा मशाल की रोशनी में पीला पड़ा हुआ था, पर आँखें सीधी थीं।

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