Spirit of a Fighter – Chapter 1094
अब मेरा दिमाग़ रुक गया।
"क्या कहा तूने?" मैंने कदम आगे बढ़ाया।
देवेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अब मुस्कुरा नहीं रही थीं।
"तेरे पिता भवानी सिंह," उसने कहा, "के दो बेटे थे। एक तू, जो सरस्वती से पैदा हुआ। और दूसरा… मैं।"
रणवीर सिंह की कुर्सी पीछे सरकी। मीरा ने उन्हें पकड़ा।
"तू झूठ बोल रहा है," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी।
"मैं बीस साल से झूठ बोल रहा हूँ," देवेंद्र ने कहा। "आज सच बोल रहा हूँ। मेरी माँ भवानी की पहली पत्नी थी। जिसे उसने छोड़ दिया जब वो तेरे अखाड़े में आया। मेरी माँ मर गई और मुझे भवानी ने नहीं पहचाना। रणवीर सिंह ने पाला, फिर अपने अहंकार में दबा दिया।"
मैं उसके चेहरे को देख रहा था। मैंने अपनी नाक से हवा खींची। चंदन, कपूर, गीली मिट्टी, और उसके पीछे… कुछ और। ऐसी गंध जो मैंने पहले भवानी के काग़ज़ों में पकड़ी थी। सूखी लकड़ी और पुराना काग़ज़।
"अगर तू भवानी का बेटा है," मैंने धीरे से कहा, "तो तेरे पास उसका कुछ तो होगा। कोई निशान। कोई याद।"
देवेंद्र की आँखें कुछ पल के लिए हिलीं। उसने अपनी शाल के नीचे से कुछ निकाला — एक छोटी सी, फटी हुई, पीली पोटली। उसे खोला। उसमें एक अधूरी माला थी — सिर्फ़ सात दाने, और उन पर हल्दी के दाग़।
मैंने उसे देखा। मेरी साँस रुक गई।
वही माला। वही माला जो माँ के आँचल में मिली थी जिस दिन भवानी की मौत हुई थी। वही माला जिसके दाने भवानी ने खुद पिरोए थे, अपने दोनों बेटों के लिए — एक के लिए पूरी, एक के लिए अधूरी।
"ये मेरी माँ ने मुझे दी थी," देवेंद्र ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरम हुआ। "जिस दिन वो मरी, उस दिन उसने कहा था — 'तेरे पिता तुझे नहीं पहचानेंगे, पर ये माला पहचानेगी।'"
मैंने अपनी जेब से वो माला निकाली जो माँ ने मुझे दी थी। उसे देवेंद्र के सामने उठाया। मेरी माला पूरी थी — बत्तीस दाने।
देवेंद्र ने उसे देखा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"वो माला," उसने धीरे से कहा, "वो मेरी है।"
"नहीं," मैंने कहा। "ये मेरी है। और तेरी वो है जो तूने खुद तोड़ी। जिसे तूने सात दानों पर रोक दिया। तेरी माँ ने तुझे दी थी, और तूने उसे अधूरा छोड़ दिया। क्योंकि तू बदला चाहता था, प्यार नहीं।"
देवेंद्र का हाथ काँपा। उसने माला को उलटा-सीधा किया। उसकी आँखें भर आईं।
"मैंने तेरे पिता से माफ़ी माँगी," उसने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ अब किसी दुकानदार की नहीं, किसी बेटे की थी। "हर साल, उसी दिन, तीन बजे रात को, उसी कब्र पर। मैं रोता हूँ, वो मुझे सुनता है, पर जवाब नहीं देता।"
"वो तुझे सुनता है," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ अब भारी नहीं थी, बस थकी हुई थी। "पर वो तुझे माफ़ नहीं करेगा। क्योंकि तूने माफ़ी माँगी, और फिर वही किया। तूने मेरे अखाड़े को खोखला किया। तूने मेरे पैरों के नीचे से मिट्टी खिसकाई। तूने मेरे बेटे को—"
वो रुक गए। उनका हाथ मीरा के हाथ पर था, और उनकी आँखों से पानी बह रहा था।
"तेरे जैसे आदमी ने मेरा अखाड़ा खाया," रणवीर सिंह ने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी, "और मैं तुझे अपने बेटे जैसा मानता रहा। मैं तेरी बीमारी में तेरे पास बैठा। मैंने तुझे अपने हाथ से दवा पिलाई। मैंने तेरे लिए अखाड़े की ज़मीन की कीमत चुकाई।"
देवेंद्र ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"आपने मुझे कभी अपना नहीं कहा," उसने कहा।
"क्योंकि तूने कभी अपना होने की कोशिश नहीं की," रणवीर सिंह ने कहा। "तू हर वक़्त बदला माँगता रहा।"
मैंने पीछे के आँगन से आती हुई एक गंध पकड़ी। पसीना। डर। और गीली मिट्टी।
मैं पलटा।
दीवार के पीछे, मंदिर के ठीक पीछे, दो लोग खड़े थे — एक बूढ़ी औरत, और उसके हाथ में एक छोटी लड़की का हाथ। वो चंदा थी। उसके बाल बिखरे थे और उसके मुँह पर कपड़ा बँधा था, पर वो खड़ी थी। ज़िंदा।
मैंने देवेंद्र की तरफ़ देखा।
"तूने कहा था वो तेरे पास है।"
"वो मेरे पास है," देवेंद्र ने कहा, और उसने आँखें खोलीं। उसकी आवाज़ में फिर वो ठंडक लौट आई थी। "पर मैंने कभी नहीं कहा कि वो बंधी है। मैंने कहा था — वो मेरे पास है। और वो है। वो मेरी बेटी है।"
चंदा ने अपने मुँह से कपड़ा खींचा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
"मैं तेरी बेटी नहीं हूँ," वो चिल्लाई। "मेरे पिता ठाकुर हैं!"
देवेंद्र ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो मुस्कान फिर आई, पर अब वो मुस्कान नहीं, किसी घाव का निशान लग रही थी।
"तेरे पिता ठाकुर ने तुझे बेच दिया था," उसने कहा। "बीस साल पहले। जब तू पैदा हुई थी। मैंने तुझे खरीदा था — अपने भाई की बेटी को। और तेरी माँ को भी। और जिस दिन तूने मेरा नाम लेना शुरू किया, उस दिन मैंने तुझे अपने नाम से पुकारा। पर तू चंदा है। मेरी चंदा।"
चंदा ने अपना हाथ छुड़ाया और दौड़कर मीरा के पास आई। मीरा ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया।
मैंने देवेंद्र की तरफ़ देखा। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मेरी आवाज़ साफ़ थी।
"मैं तुझसे एक बात कहूँ, देवेंद्र सिंह?" मैंने कहा। "अगर तू भवानी का बेटा है, तो तू मेरा भाई है। और मैं अपने भाई से ये नहीं कहूँगा कि वो मेरा दुश्मन है। मैं उससे ये कहूँगा — आ, मेरे साथ खड़ा हो। ये ज़मीन तेरी भी है। ये मिट्टी तेरी भी है।"
देवेंद्र मेरी तरफ़ देखता रहा। उसकी आँखों में कुछ हिला।
"तू मुझे माफ़ कर रहा है?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में विश्वास नहीं था।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुझे माफ़ नहीं कर रहा। मैं तुझे मौका दे रहा हूँ। माफ़ी तू अपने आप से माँग। और तेरे पास वक़्त है — कल के मुकाबले से पहले।"
देवेंद्र ने अपनी आँखें मींच लीं। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
और फिर उसने कुछ किया जो मैंने उम्मीद नहीं की थी।
वो उठा, काग़ज़ उठाया, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ टूट रहा था। "ये ज़मीन तेरी है। मैं इसे अपने नाम नहीं करूँगा। मैं कल मैदान में नहीं आऊँगा। मैं तुझे नहीं हराऊँगा।"
वो पलटा। उसने अपनी शाल समेटी।
और फिर उसने अपनी जेब से एक मोबाइल निकाला।
मैंने उसे देखा। वो मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में अब भी कुछ ठंडा था।
"बहुत बढ़िया," उसने धीरे से कहा। "यही जवाब चाहिए था मुझे।"
उसने मोबाइल मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। उसकी स्क्रीन पर एक हरा बटन जल रहा था — कॉल चल रही थी, और उस पर वक़्त चल रहा था। सत्ताईस मिनट।
"अब इसमें बोल," देवेंद्र ने कहा। उसकी आवाज़ मीठी थी, पर आँखें ठंडी। "कि तूने मेरे भाई ठाकुर को फँसाया। झूठे सबूत बनाए। चंदा को अगवा किया। पूरा गाँव सुन रहा है।"
मेरी साँस रुक गई।
उसने मोबाइल की स्क्रीन दिखाई। उस पर एक नाम चमक रहा था — "गाँव की पंचायत।"
"तेरे पास एक मिनट है," देवेंद्र ने कहा। "या तो तू बोलेगा, और पूरा गाँव सुनेगा कि तूने सब किया। या तू चुप रहेगा, और ये रिकॉर्डिंग कल सुबह पुलिस के पास जाएगी। तेरी माँ, तेरी बहन, तेरा टिंकू — सब देखेंगे कि तू क्या है।"
उसने मोबाइल मेरी तरफ़ और बढ़ा दिया।
"बोल, वीर सिंह। बोल।"
मेरे हाथ में वो मोबाइल था, और उसकी स्क्रीन पर हरा बटन और सत्ताईस मिनट की गिनती, और मेरे पीछे टिंकू की रुकी हुई साँस, और सामने देवेंद्र की ठंडी आँखें।
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