Spirit of a Fighter – Chapter 1092
"तूने ठीक किया," उसने कहा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "मुझे कुछ नहीं पता। बस इतना पता है कि गुड़िया वहाँ है और मैं यहाँ बैठा हूँ।"
कालू काका मेरे सामने घुटनों के बल बैठे।
"बेटा," उन्होंने कहा, "एक बात याद रख। देवेंद्र जो चाहता है, वो ताकत नहीं है। वो चाहता है कि कोई उससे प्यार करे। भवानी ने नहीं किया, तेरी माँ ने नहीं किया। इसलिए वो बीस साल से जल रहा है। कल मैदान में वो तुझे हराने नहीं आएगा — वो तुझे अपना बनाने आएगा। और वही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले सिर्फ़ रणवीर सिंह की आँखों में देखी थी — भरोसा।
मैं उठा। मैंने मिट्टी को हाथ में लिया और अपने माथे पर लगाया।
"कल," मैंने कहा, "मैं उससे पूछूँगा कि मेरे पिता ने क्या कहा था, जब उसने आख़िरी बार साँस ली थी।"
मीरा उठी। उसने अपना बैग उठाया।
"मैं अभी तेरे लिए कुछ बनाती हूँ," उसने कहा। "सो जा। दो घंटे सो। कल तेरे पास वक़्त नहीं होगा।"
"मैं सो नहीं सकता।"
"मुझे पता है," उसने कहा। "इसलिए मैं तेरे पास बैठूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर थकान थी, धूल थी, पर आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे अब हर मुश्किल में सहारा देती थी।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "अगर कल कुछ हो जाए…"
"तो क्या?" उसने सख़्ती से कहा। "तू मेरे बारे में बात करेगा? नहीं। कल तू सिर्फ़ अपने बारे में सोचेगा — कि तुझे कैसे जीतना है। बाकी सब बाद में।"
वो अंदर चली गई। मैं आँगन में खड़ा रहा। देवेंद्र की शाल की गंध हवा में अब भी थी — चंदन और कपूर। वही गंध जो कब्र पर मिली थी। वही गंध जो शेर सिंह के काग़ज़ पर थी।
मैंने अपनी धोती की जेब से चंदा की डायरी निकाली और उसे दोबारा खोला। आख़िरी पन्ना। देवेंद्र का नाम। और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में चंदा ने कुछ लिखा था जो मैंने पहली बार में नहीं पढ़ा था।
मैंने लालटेन उठाई और पास ले जाकर पढ़ा।
"वो हर साल भवानी की कब्र पर जाता है। उसी दिन, उसी वक़्त। तीन बजे रात को। मैंने उसे एक बार देखा था — रोता हुआ। वो भवानी से माफ़ी माँगता है। पर माफ़ी नहीं मिलती, इसलिए वो और बुरा होता जाता है।"
मैंने डायरी बंद की।
कल मैदान में सिर्फ़ कुश्ती नहीं होगी। कल वहाँ देवेंद्र का बीस साल पुराना दर्द खुलेगा। और मुझे उस दर्द से लड़ना होगा — उसके गुस्से से नहीं, उसकी माफ़ी की भूख से।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। तारे अब भी वहीं थे, पर कुछ बदल गया था। कल इस वक़्त तक सब तय हो जाएगा।
तभी दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।
इस बार सिर्फ़ एक बार। और आवाज़ आई — टिंकू की।
"भाई, खोल। जल्दी खोल।"
मैंने दरवाज़ा खोला। टिंकू वहाँ खड़ा था, हाँफ रहा था, और उसके हाथ में एक पीली शीशी थी।
"ये मुझे सुक्खी बुआ ने दी," उसने कहा, साँस फूलती हुई। "कह रही थी — देवेंद्र ने भेजी है। कह रहा है कि ये तेरे हिस्से की है।"
मैंने शीशी उसके हाथ से ली। उस पर कोई नाम नहीं था। सिर्फ़ एक निशान — तराजू।
"और सुक्खी बुआ ने कहा," टिंकू ने धीरे से कहा, "कि देवेंद्र के पास तेरे घर की चाबी है। और वो कल सुबह तक तेरे घर में आने वाला है।"
मैंने शीशी मुट्ठी में पकड़ी। शीशी की ठंडक हथेली से सीधे दिल तक गई।
"तो फिर इंतज़ार क्यों?" मैंने कहा। "अब चलते हैं।"
॥
शीशी मेरी मुट्ठी में थी, और उसकी ठंडक अब भी हथेली से सीधे दिल तक जा रही थी। टिंकू सामने खड़ा हाँफ रहा था। उसकी टोपी तिरछी हो गई थी, कान के पीछे की पेंसिल गिरकर ज़मीन पर पड़ी थी और वो उसे उठाना भी भूल गया था।
"चाबी?" मैंने पूछा। "तूने कहा देवेंद्र के पास घर की चाबी है?"
"सुक्खी बुआ ने कहा," टिंकू ने गला साफ़ करते हुए कहा। "पर भाई, बुआ की बातों का क्या? वो तो कह रही थी कि देवेंद्र के पास हमारी गाय भी है और ब्याहता बहू भी।"
"फिर भी वो शीशी तो सच निकली ना," मैंने कहा।
टिंकू चुप हो गया। उसने गर्दन झुकाई और पेंसिल उठाई और कान के पीछे खोंस ली, फिर बोला, "हाँ। ये सच है।"
मैं आँगन से बाहर निकला। रात खत्म हो रही थी। पूरब में आसमान धुँधला नीला हो रहा था और नीम के पत्तों पर ओस जम गई थी। मैंने मीरा को आवाज़ दी।
वो बाहर आई, हाथ में छोटी पीतल की केतली थी जिसमें उसने कुछ उबाला था। गरम भाप में अदरक और तुलसी की गंध थी।
"कहाँ?" उसने सिर्फ़ इतना पूछा।
"घर आ रहा है।"
उसने केतली मेज़ पर रख दी और अपना बैग उठाया। "फिर हम बैठकर इंतज़ार क्यों करें?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल बिखरे थे, आँखों के नीचे कालापन था, पर आवाज़ में वो ज़िद अभी भी थी जो पहले दिन अखाड़े के फाटक पर थी, जब उसने मुझे जूते पहनकर मिट्टी में घुसने पर धक्का देकर बाहर किया था।
"नहीं," मैंने कहा। "इस बार हम उसके घर नहीं जाएँगे। वो खुद आएगा। और जब आएगा, तो हम उसे वहीं मिलेंगे जहाँ हमें ताकत मिली है।"
"अखाड़ा?"
"हाँ। वो अखाड़े की ज़मीन का काग़ज़ लेने आएगा। तो अखाड़े में ही मिलेगा।"
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की।
"मैं कालू काका को बुलाता हूँ," वो बोला और दौड़ गया।
मीरा ने केतली से एक कटोरी में काढ़ा डाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पी।"
"मुझे भूख नहीं—"
"मैंने भूख के लिए नहीं कहा," उसने कहा। "तेरे हाथ काँप रहे हैं। ये पी, तो हाथ रुकेंगे।"
मैंने कटोरी पकड़ी। हाथ सच में काँप रहे थे। मैंने एक घूँट पिया। कड़वा था। मुँह में जाते ही गले से नीचे तक गरमी गई और पेट में एक गोला-सा बन गया।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर वो सच में चंदा को… अगर कुछ भी हो जाए उसे—"
उसने मेरी बात काटी। "तो क्या तू ज़मीन दे देगा?"
मैं चुप रहा।
"मैं तुझसे पूछ रही हूँ, वीर सिंह।"
"मैं नहीं जानता," मैंने सच बोल दिया। "मैंने कभी किसी को खोया नहीं जो मेरा हो… माँ के अलावा। और अब गुड़िया है, और चंदा भी। मैं जानता हूँ ये ज़मीन मेरी नहीं, इस मिट्टी की है। पर अगर बदले में किसी की जान हो…"
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"ये सोच," उसने कहा, "कि वो तुझे ज़मीन दिलाने के लिए चंदा को छोड़ देगा? वो आदमी बीस साल से मुर्दों से माफ़ी माँग रहा है। माफ़ी नहीं मिली, तो वो और बुरा होता गया। अगर तू आज झुक गया, तो कल वो तेरी माँ को उठा ले जाएगा, फिर गुड़िया को, फिर टिंकू को। ऐसे आदमी की भूख कभी नहीं मिटती।"
मैंने कटोरी खत्म की।
"तू ठीक कहती है," मैंने कहा। "पर मैं उसे चंदा की जान से नहीं खेलने दूँगा। वो जो भी माँगेगा, उसका जवाब मेरे पास है।"
हम अखाड़े पहुँचे तो आसमान में पहली किरण फूट चुकी थी। लाल मिट्टी ओस से पोली लग रही थी और उसकी गंध इतनी तेज़ थी कि मेरा सीना एक बार में भर गया। चारों तरफ़ ऊँची मिट्टी की दीवार, बीच में गोल मैदान, और कोने में वो पुराना मंदिर जैसा ढाँचा जिसमें हनुमान जी की मूर्ति थी और जिसके नीचे पीतल का घंटा लटकता था।
कालू काका पहले से वहाँ थे। वो अपनी कमर पर हाथ रखकर खड़े थे और उनके हाथ में लालटेन अभी भी जल रही थी, हालाँकि उजाला हो गया था।
"मिट्टी सूख रही थी," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "मैंने पानी डाल दिया। मुकाबले के दिन मिट्टी को भूखा नहीं रखते।"
"काका, आज मुकाबला नहीं—"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno