Spirit of a Fighter – Chapter 1091
मैं आँगन के बीच में खड़ा था, पर मुझे लग रहा था जैसे मैं बीस साल पीछे खड़ा हूँ, भट्ठे की आग के सामने, और देख रहा हूँ कि मेरे पिता को कैसे मारा गया।
"तो कल मैदान में जो हमें मिलेगा," मैंने कहा, "वो ठाकुर नहीं होगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो कौन होगा?"
"देवेंद्र," मैंने कहा। "वो खुद आएगा। क्योंकि अब उसके पास और कोई नहीं बचा।"
तभी बाहर से आवाज़ आई।
दरवाज़े पर दस्तक हुई। धीमी, ठहरी हुई, जैसे कोई जानता हो कि अंदर कोई सो नहीं रहा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। कालू काका ने अपनी लाठी मज़बूती से पकड़ ली।
दस्तक फिर हुई। इस बार तीन बार। और फिर एक आवाज़ आई, नरम, मीठी, जैसे गुड़ घुल रहा हो पानी में।
"वीर सिंह। दरवाज़ा खोलो। मैं तुम्हें कल तक इंतज़ार में नहीं रखना चाहता।"
मेरी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई। वो आवाज़ मैंने पहले सुनी थी। कोठी में। जब वो आदमी खुद को कैदी बता रहा था और उसकी आवाज़ काँप रही थी। पर अब उस आवाज़ में कंपन नहीं था। अब उसमें वो चीज़ थी जो पहले छुपी हुई थी।
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर चाँदनी में एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, कंधों पर शाल, बाल सफ़ेद पर चेहरा ऐसा जैसे उम्र ने उसे छुआ ही न हो। और उसके हाथ में एक छोटी सी गुलाबी चप्पल थी, जिस पर धागे का फूल बना था। गुड़िया की चप्पल।
वो मुस्कुराया।
"मैं खुद आ गया," देवेंद्र सिंह ने कहा, "ताकि तुम्हें कल तक इंतज़ार न करना पड़े।"
मेरी आँखें उसकी चप्पल पर टिकी रहीं। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"गुड़िया कहाँ है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी।
देवेंद्र ने चप्पल ऊपर उठाई, ऐसे जैसे कोई कोई कीमती चीज़ दिखा रहा हो।
"तुम्हारी बहन ठीक है," उसने कहा। "थोड़ी डरी हुई है। बच्ची है, क्या करेगी। मैंने उसे खीर खिलाई है। तुम्हारे दोस्त टिंकू की तरह बनाई थी, पर मेरे हाथ की खीर में वो बात नहीं आई। टिंकू को बता देना, उसका हाथ अच्छा है।"
मैं आगे बढ़ा, पर कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ लिया।
"पहले सुन ले, बेटा," उन्होंने फुसफुसाया। "गुस्से में जो बोलता है, वो हार जाता है।"
देवेंद्र ने कालू काका की तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर कुछ पल के लिए वो ठंडक आई जो मैंने पहले भैरव की आँखों में देखी थी।
"कालू," उसने कहा। "तुम अब भी ज़िंदा हो। मैंने सोचा था बीस साल में तुम भूल जाओगे। पर तुमने तो सब याद रखा, है ना? उस रात भट्ठे पर तुमने मुझे देख लिया था। मैंने तुम्हें देखा था, पर कुछ नहीं कहा। जानते हो क्यों? क्योंकि तुम्हारे जैसे लोग कुछ नहीं बोलते। तुम्हारे जैसे लोग बस ज़िंदा रहते हैं।"
कालू काका का हाथ मेरे कंधे पर काँपा। पर वो चुप रहे।
देवेंद्र ने फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पिता भवानी," उसने कहा, "मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे। जानते हो? हम दोनों एक ही अखाड़े में पले-बढ़े। एक ही मिट्टी में। और एक ही लड़की से प्यार किया — तुम्हारी माँ से।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"माँ से?"
"सरस्वती," उसने कहा, और उसका नाम लेते वक़्त उसकी आवाज़ में कुछ बदला। "वो मुझसे पहले भवानी से मिली थी। मैंने सोचा था वो मेरी होगी। पर भवानी आया, और उसने मुझसे पहले हाथ बढ़ा दिया। मैंने कभी माफ़ नहीं किया।"
"इसलिए तुमने उसे मरवाया?" मेरी आवाज़ फट रही थी।
"मैंने उसे मरवाया नहीं," देवेंद्र ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी ईमानदारी थी जो मुझे डरा गई। "मैंने उसे एक रास्ता दिया। मैंने उससे कहा — अखाड़ा मेरा है, पैसा मेरा है, ताकत मेरी है। तू मेरे साथ आ जा। और वो नहीं आया। वो मिट्टी में रहा। उसने कहा — 'देवेंद्र, मिट्टी से बैर मत कर।' और मैंने कहा — 'मैं बैर नहीं कर रहा, मैं उसे अपना बना रहा हूँ।'"
उसने एक कदम आगे बढ़ा।
"तुम्हारे पिता ने खुद पीया था, वीर। मैंने नहीं पिलाया। उसने मेरे सामने शीशी उठाई और कहा — 'अगर मेरी मौत से मेरे बेटे की जान बचती है, तो मैं पी जाऊँगा।' और उसने पी लिया। मैंने उसे रोका नहीं।"
मेरे हाथ की मुट्ठी खुल गई। मैं उसकी तरफ़ बढ़ा, पर मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"वीर," उसने कहा, "नहीं।"
"इसीलिए गुड़िया को तुमने हमारे घर में रखवाया?" मैंने कहा। "ताकि माँ हमेशा डरी रहे?"
देवेंद्र ने सिर हिलाया। "गुड़िया मेरी बेटी है। महेंद्र की नहीं। महेंद्र तो सिर्फ़ मोहरा था, मैंने कहा ना। गुड़िया मेरी बेटी है, और उसकी माँ…"
वो रुका।
"मर गई। मेरे ही हाथों से मरी। क्योंकि वो तुम्हारी माँ जैसी थी — बोलने लगती थी। सच बोलने लगती थी।"
मुझे उल्टी आने लगी। मैंने अपनी आवाज़ को काबू में किया।
"तो अब क्या चाहते हो?" मैंने पूछा। "कल मैदान में मुझे हराना?"
देवेंद्र हँसा। ठंडी, सूखी हँसी।
"मैं तुम्हें हराना नहीं चाहता, वीर सिंह। तुम मेरे ही खून से बने हो — भवानी के बेटे हो, और भवानी मेरे दिल का हिस्सा था, चाहे उसने मुझे ठुकराया। मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ। तुम्हारे हाथ में वो ताकत है जो भैरव में नहीं थी, जो महेंद्र में नहीं थी। तुम मिट्टी को पहचानते हो। तुम वो काम कर सकते हो जो मैं बीस साल से करना चाहता था।"
"क्या काम?"
"तहखाने की मिट्टी," उसने धीरे से कहा, और उसकी आँखों में वो चमक आई जो भूखे आदमी की आँखों में होती है। "वो मिट्टी सिर्फ़ ईमानदार आदमी को ताकत देती है। मैंने बीस साल उसे अज़माया। भैरव गया, कुछ नहीं मिला। महेंद्र गया, कुछ नहीं मिला। पर तुम… तुम्हारे हाथ साफ़ हैं। तुम्हारे पास वो मिट्टी होगी, तो तुम अजेय हो जाओगे। और मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम्हारा हाथ ही मेरा हाथ होगा।"
मैंने एक लंबी साँस ली। आँगन में सन्नाटा था। चाँद ऊपर था, पर उसकी रोशनी देवेंद्र के चेहरे को और ठंडा बना रही थी।
"मेरे पिता ने तुम्हें ठुकराया था," मैंने कहा। "मेरी माँ ने तुम्हें ठुकराया था। और आज मैं तुम्हें ठुकराता हूँ।"
देवेंद्र की मुस्कान मिट गई।
"उस मिट्टी में ताकत है, पर तुम्हारे जैसे लालची के लिए वो सिर्फ़ मिट्टी है," मैंने कहा। "कालू काका ने ये बात मुझे बहुत पहले सिखाई थी। तुम बीस साल से कोशिश कर रहे हो, पर तुम्हें कभी कुछ नहीं मिला — क्योंकि तुम्हारे हाथ साफ़ नहीं हैं।"
देवेंद्र ने चप्पल अपनी जेब में रखी और अपनी शाल ठीक की।
"तो कल," उसने कहा, "मैदान में।"
"मैदान में," मैंने कहा।
"और गुड़िया?"
"अगर तूने उसे एक बाल भी बाँका किया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ऐसी थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी — शांत, ठंडी, अपनी नहीं लग रही थी, "तो मैं तेरी वो शाल उतारकर तेरे ही हाथ से तुझे बाँधूँगा, और पूरे गाँव के सामने घसीटूँगा।"
देवेंद्र मुस्कुराया। एक पल के लिए उसकी आँखों में कुछ ऐसा दिखा जो मैंने पहले नहीं देखा था — डर नहीं, कुछ और। मानो वो मुझमें किसी और को देख रहा हो।
"तुम भवानी की तरह बोलते हो," उसने धीरे से कहा। "बिलकुल वैसे ही।"
वो पलटा और चाँदनी में चल पड़ा। उसकी शाल हवा में हिल रही थी। दूर, नीम के पेड़ के पास, एक लालटेन जल रही थी — कोई उसका इंतज़ार कर रहा था।
जब वो गया, तो मेरे पैर काँप गए। मैं आँगन की मिट्टी पर बैठ गया। मीरा मेरे पास बैठी और उसने मेरा हाथ पकड़ा।
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