Spirit of a Fighter – Chapter 1090
रात में मैं अखाड़े में गया। मैदान खाली था, मिट्टी पर आग के निशान अब भी ताज़े थे। मैंने अपना हाथ मिट्टी पर रखा। ठंडी थी।
फिर मैं चंदा की चारपाई के पास गया, जो अखाड़े के कोने में बनी थी। वो अब भी पुलिस के पास थी — गवाही के लिए। उसकी चारपाई खाली थी, पर उसके तकिये के नीचे कुछ चमक रहा था।
मैंने वो चीज़ उठाई। छोटी सी डायरी थी, काले कवर वाली, जिसके कोने फटे हुए थे। मैंने उसे खोला और पहला पन्ना पढ़ा। चंदा की छोटी, टेढ़ी लिखाई में लिखा था —
"अगर मैं न लौटूँ, तो ये डायरी वीर सिंह को दे देना। इसमें मेरे पिता के हर ज़हर का हिसाब है। और आख़िरी पन्ने पर वो नाम है जिसने सब शुरू किया था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने पन्ने पलटे। हर पन्ने पर तारीख़, नाम, और ज़हर की मात्रा लिखी थी। पचास से ज़्यादा नाम। पचास से ज़्यादा मौतें।
मैंने आख़िरी पन्ना खोला।
वहाँ बड़े अक्षरों में एक नाम लिखा था। और उसके नीचे चंदा की लिखाई में एक लाइन —
"ये वो आदमी है जिसने सब शुरू किया। ये मेरा पिता नहीं है। ये उससे भी बड़ा है।"
मैंने वो नाम पढ़ा।
और मेरे हाथ से डायरी गिर गई।
क्योंकि वो नाम मैं जानता था। वो नाम हर उस काग़ज़ पर था जो मुझे मिला था — कब्र में, तहखाने में, माँ की अलमारी में। वो नाम जो मैं बीस साल से सुनता आया था, पर कभी किसी के मुँह से नहीं सुना था।
वो नाम था — दयाराम।
वही दयाराम। वो व्यापारी जिसका ज़हर भवानी ने खुद पिया था। जिसका बेटा अब भी शीशियाँ बनाता था। जिसका नाम मोहन ने फुसफुसाकर बताया था।
पर अब मैं जानता था — वो सिर्फ़ एक व्यापारी नहीं था। वो इस पूरे खेल का जड़ था। जिसने गंगा देवी को शीशियाँ दीं, जिसने भैरव को पाला, जिसने ठाकुर को खरीदा।
और वो अभी भी ज़िंदा था।
मैंने डायरी उठाई और अपनी धोती की जेब में रखी।
फिर मैंने आसमान की तरफ़ देखा। रात बहुत काली थी।
"तू कहीं भी हो, दयाराम," मैंने धीरे से कहा। "मैं तुझे ढूँढ लूँगा। और जब मिलूँगा, तो तेरे पास कोई शीशी नहीं होगी।"
पीछे से पैरों की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा — मीरा खड़ी थी, हाथ में लालटेन।
"क्या हुआ?" उसने पूछा। "तू यहाँ क्यों खड़ा है?"
मैंने डायरी जेब से निकाली और उसकी तरफ़ बढ़ाई।
"पढ़," मैंने कहा। "और फिर बता — हम कल कहाँ जा रहे हैं।"
मीरा ने डायरी पकड़ी और पहला पन्ना पलटा। लालटेन की रोशनी में उसका चेहरा पढ़ते-पढ़ते बदलने लगा।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये तो…"
"हाँ," मैंने कहा। "अब असली खेल शुरू होता है।"
॥
डायरी मेरे हाथ में थी, और उसका काला कवर उँगलियों में चिपचिपा लग रहा था। मीरा ने लालटेन मेरे हाथ के पास की, और पीली रोशनी में चंदा की टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई जैसे ज़िंदा हो उठी।
मैंने पन्ने पलटे। पहला पन्ना — तारीख़ें। दूसरा — नाम। तीसरा — शीशियों की गिनती, ठीक उसी तरह जैसे कोई दुकानदार अपना हिसाब लिखता है। "चार शीशी — लुट्टन। दो शीशी — बलराम। तीन — शेरू।"
"ये तो…" मीरा की आवाज़ रुक गई।
"हिसाब है," मैंने कहा। "मौत का हिसाब।"
मैंने आगे के पन्ने पलटे। हर पन्ने पर कुछ नया था — किसी की उम्र, किसी का गाँव, किसी की माँ का नाम। चंदा ने सिर्फ़ नाम नहीं लिखे थे। उसने ये भी लिखा था कि हर पहलवान के घर में कौन रोया। जैसे वो बदला ले रही हो, अपने पिता के हर ज़ुल्म का हिसाब रखकर।
मेरी उँगली आख़िरी पन्ने पर आकर रुक गई।
वहाँ बड़े अक्षरों में एक नाम लिखा था, और उसके नीचे एक लाइन — "ये वो आदमी है जिसने सब शुरू किया। ये मेरा पिता नहीं है। ये उससे भी बड़ा है।"
मैंने वो नाम पढ़ा।
"देवेंद्र सिंह।"
मेरी साँस रुक गई। मैंने दोबारा पढ़ा। वही नाम था। साफ़, बड़ा, नीले पेन से लिखा हुआ।
मीरा ने लालटेन नीचे की और मेरे चेहरे को देखा।
"देवेंद्र?" उसकी आवाज़ में यकीन नहीं था। "वो देवेंद्र? जो खुद को ठाकुर का कैदी बता रहा था? जिसने हमें कोठी में बुलाया था, जिसने कहा था मैं बीस साल से कैदी हूँ?"
मैं चुप खड़ा रहा। मेरे भीतर वो पूरी रात घूमने लगी — कोठी का वो कमरा, देवेंद्र का काँपता हाथ, उसकी नरम आवाज़, वो तरीका जिससे उसने चाय का प्याला पकड़ा था जैसे उसके हाथ में जान ही न हो। और वो लाइन, जो उसने बड़े दुख से कही थी — "मैं बीस साल से इस कोठी में कैद हूँ।"
"वो कैदी नहीं था," मैंने धीरे से कहा। "वो हमें कैदी दिखा रहा था।"
पीछे से लाठी की आवाज़ आई। कालू काका आँगन की मिट्टी पर अपनी लाठी टेकते हुए आए। उनके चेहरे पर वो पीली रोशनी पड़ रही थी जो सिर्फ़ डर के वक़्त आती है। उन्होंने मेरे हाथ से डायरी ली, आँखों के बहुत पास ले गए, और देर तक देखते रहे। फिर उनका हाथ काँपने लगा।
"काका?" मैंने कहा।
"ये नाम…" उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने इस नाम को बीस साल से मुँह पर नहीं लिया।"
"आप जानते हैं इसे?"
कालू काका ने डायरी मेरे हाथ में वापस रखी और अपनी लाठी पर झुक गए, जैसे अचानक उनका पूरा बोझ बढ़ गया हो।
"बीस साल पहले," उन्होंने कहा, "एक रात मैं भट्ठे पर गया था। भैरव ने बुलाया था — कहा कुछ काम है। मैं पहुँचा तो भट्ठे की आग जल रही थी। और उस आग के सामने दो आदमी खड़े थे। एक भैरव था। और दूसरा…"
वो रुके। उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं।
"दूसरा देवेंद्र था। और उसके हाथ में एक शीशी थी। पीली शीशी। वो भैरव से कह रहा था — 'इस बार वाला पानी तेज़ है, ध्यान से देना।' और भैरव उसके हाथ से शीशी ले रहा था, ऐसे जैसे कोई चेला अपने गुरु से प्रसाद लेता है।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा उतर गया। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके होंठ खुले रह गए थे।
"तो ठाकुर…" मीरा ने कहा।
"ठाकुर मोहरा था," मैंने कहा। "देवेंद्र खिलाड़ी है।"
कालू काका ने सिर हिलाया। "मैं उस रात डर गया था। भाग आया। और फिर कभी उस तरफ़ नहीं देखा। पर एक बात मैंने उस रात देखी थी जो मैं आज तक नहीं भूला।"
"क्या?"
"देवेंद्र के हाथ में एक और चीज़ थी। एक लोहे की डिबिया। और उसने वो डिबिया भैरव को दी थी, ये कहकर — 'इस बार भवानी पर आख़िरी दवा चलेगी।'"
मेरी छाती में कुछ फटा। भवानी। मेरे पिता। मेरे असली पिता, जिन्हें मैंने कभी जीते-जी नहीं देखा।
"तो पापा को ज़हर…" मेरी आवाज़ रुंध गई।
"देवेंद्र के हुक्म से दिया गया था, बेटा," कालू काका ने कहा। "भैरव सिर्फ़ हाथ था। दिमाग़ देवेंद्र का था।"
मैंने डायरी फिर खोली। आख़िरी पन्ने पर चंदा ने जो लिखा था, वो मैंने मीरा को पढ़कर सुनाया — "ये वो आदमी है जिसने सब शुरू किया।"
मीरा ने लालटेन ज़मीन पर रख दी और अपने माथे पर हाथ रख लिया।
"इसीलिए ठाकुर ने अदालत में इतनी जल्दी हार मान ली," उसने कहा, धीरे-धीरे जैसे तस्वीर जुड़ रही हो। "जब जज ने कहा कि ज़मीन वीर के नाम होगी, और उसे गिरफ़्तार करने का हुक्म दिया, तो वो क्यों नहीं चिल्लाया? क्यों नहीं कहा कि मैं बेकसूर हूँ? क्योंकि वो जानता था कि अगर वो बोलेगा, तो सबसे पहले देवेंद्र का नाम निकलेगा। वो अपने भाई को बचा रहा था।"
"अपने भाई को?" मैंने पूछा।
"देवेंद्र ठाकुर का बड़ा भाई है," कालू काका बोले। "सबसे बड़ा। तीन भाई थे — देवेंद्र, महेंद्र, और एक और जो बचपन में मर गया। देवेंद्र ने ही महेंद्र को ठाकुर बनाया था। उसने ही उसे वो ज़मीनें दीं, वो रुतबा दिया। महेंद्र सिर्फ़ दिखावा था — असली मालिक हमेशा देवेंद्र रहा।"
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