Spirit of a Fighter1089 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1089

7 min read November 5, 2026

"वीर! शेराज़!"

मैंने देखा। शेराज़ दीवार के पीछे से निकल रहा था, हाथ में मशाल। और उसके पीछे, दीवार के एक छेद से, धुआँ और तेज़ होकर उठने लगा।

"वो आग फिर भड़का रहा है!" मीरा चिल्लाई। "वीर, ये धुआँ ज़हरीला है!"

मैंने अपना हाथ उठाया। "सब पीछे! नीचे झुककर! मुँह कपड़े से ढक लो!"

गंगा देवी हँसीं।

"तूने सोचा था," उन्होंने कहा, "कि ये लड़ाई तलवारों की है। नहीं, वीर सिंह। ये लड़ाई हवा की है। जो पहले साँस लेगा, वो पहले मरेगा।"

मैंने अपनी धोती का कोना फाड़ा और मुँह पर बाँधा। फिर मैंने देखा — मैदान के बीच में, जहाँ ज़मीन थोड़ी धँसी थी, वहाँ से सफ़ेद धुआँ नहीं, काला धुआँ आ रहा था। और उसके नीचे, ज़मीन के भीतर से, मुझे एक गंध आई — नम मिट्टी और ठंडी हवा।

यानी नीचे कुछ खुला था।

"टिंकू," मैंने ज़ोर से कहा, "मेरे पीछे आ! और ज़मीन पर नज़र रख — कोई सुरंग का मुँह दिखे तो बताना!"

गंगा देवी मेरी तरफ़ बढ़ीं। उनके हाथ में अब एक छोटी छुरी थी, जो उन्होंने अपनी साड़ी के भीतर से निकाली।

"तेरे पिता ने भी ऐसे ही मुझसे लड़ने की कोशिश की थी," उन्होंने कहा। "और वो मिट्टी में गिरा।"

मैंने अपना पैर पीछे किया और अपना वज़न अपनी एड़ियों पर डाला। मेरी साँस धीमी थी, पर मेरी आँखें उनके हाथ पर थीं।

"मेरे पिता ने तुझसे नहीं लड़ा था," मैंने कहा। "उन्होंने अपनी जान दी थी। और मैं उनकी जान बेकार नहीं जाने दूँगा।"

वो मेरी तरफ़ झपटीं। उनकी छुरी हवा में चमकी। मैंने अपना कंधा घुमाया और उनका हाथ पकड़ा। उनकी कलाई मेरी मुट्ठी में थी — पतली, सूखी, पर ज़ोरदार। वो छटपटाईं।

"तू अभी भी बच्चा है," उन्होंने कहा। "तू नहीं जानता कि दुश्मी को कैसे खत्म करते हैं।"

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा, और मैंने उनका हाथ मरोड़ा। छुरी गिरी। "दुश्मी को खत्म नहीं करते — उसका सच खोलते हैं। और तेरा सच," मैंने उनकी आँखों में देखा, "ये है कि तू आज भी अपने बेटे से डरती है।"

वो रुकीं।

"क्या?"

"तूने भैरव को शीशियाँ दीं," मैंने कहा, "पर तू उससे कभी नहीं लड़ी। क्योंकि तू जानती थी कि अगर तू उसके रास्ते में आई, तो वो तुझे भी ज़हर दे देगा। तू आज तक अपने बेटे से डरती आई है। और इसीलिए तू मुझसे लड़ रही है — क्योंकि मुझसे लड़ना आसान है।"

गंगा देवी की आँखें भर आईं। पहली बार। उनकी आवाज़ टूटी।

"तू झूठ बोलता है," उन्होंने कहा, पर उनकी आवाज़ में दम नहीं था।

"नहीं," मैंने कहा। "मैं सूंघता हूँ। और तेरे पसीने में अभी वो गंध है जो डर की होती है। वही गंध जो तेरे बेटे के पसीने में थी, जिस दिन उसे जेल ले जाया गया।"

वो मेरी पकड़ से छूटीं और दो कदम पीछे हटीं। उनका चेहरा पीला पड़ गया।

तभी ज़मीन से एक आवाज़ आई। धीमी, दबी हुई। जैसे कोई नीचे से दीवार पीट रहा हो।

मैंने नीचे देखा। मैदान के बीच में, उसी गड्ढे के पास, ज़मीन का एक हिस्सा धँसा और वहाँ से एक हाथ निकला — छोटा, पतला, मिट्टी से सना।

मैं दौड़ा। टिंकू मेरे पीछे भागा।

"ये क्या है?" टिंकू ने कहा।

मैंने घुटनों के बल बैठकर मिट्टी हटाई। और मैंने देखा — एक लोहे का जाल, जिसके नीचे एक सुरंग थी। और उस सुरंग से एक आवाज़ आ रही थी।

"वीर… वीर…"

माँ की आवाज़।

"माँ!" मैंने चिल्लाकर कहा। "मैं यहाँ हूँ! मैं आ रहा हूँ!"

मैंने जाल को खींचा। वो भारी था, ज़ंग लगा हुआ। टिंकू ने दूसरी तरफ़ से पकड़ा और हम दोनों ने मिलकर खींचा। जाल हिला, फिर उखड़ा, और उसके नीचे एक सीढ़ी दिखी जो नीचे जाती थी।

"मैं नीचे जा रहा हूँ," मैंने कहा।

"मैं भी," टिंकू ने कहा।

"नहीं, तू ऊपर रुक। अगर गंगा देवी भागे, तो उसे रोकना।"

टिंकू ने सिर हिलाया। उसने अपनी टोकरी नीचे रखी और उसमें से एक लोहे का डंडा निकाला जो उसने कभी नहीं दिखाया था।

"ये कब से तेरे पास है?" मैंने पूछा।

"आज सुबह से," उसने कहा। "मैंने सोचा, मिठाई के साथ थोड़ा नमक भी चाहिए।"

मैं हँसा और नीचे उतरा। सीढ़ियाँ उमस भरी थीं और हवा घुट रही थी। पर नीचे जाते ही मुझे एक रोशनी दिखी — लालटेन की।

माँ एक कोने में बैठी थीं। उनके हाथ बंधे थे और आँखों पर कपड़ा बँधा था।

"माँ," मैंने कहा और उनकी तरफ़ दौड़ा।

उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनका शरीर ढीला पड़ा।

"वीर," वो फुसफुसाईं। "बेटा, तू आ गया।"

मैंने उनके हाथ खोले और उनकी आँखों से कपड़ा हटाया। उनके चेहरे पर खरोंचें थीं और उनके होंठ सूखे थे।

"पानी," मैंने कहा। टिंकू ने ऊपर से अपनी बोतल नीचे फेंकी। मैंने माँ को पानी पिलाया।

"वो औरत," माँ ने कहा, "वो पागल है। उसने कहा कि वो तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगी।"

"अब वो कुछ नहीं करेगी," मैंने कहा। "मैं उसे ऊपर छोड़ आया हूँ, और उसके हाथ खाली हैं।"

माँ ने मेरा चेहरा देखा। फिर उन्होंने मेरे गाल पर हाथ रखा।

"तेरे पिता ने भी ऐसा ही कहा था," वो फुसफुसाईं। "और वो लौटकर नहीं आए।"

मेरा गला भर आया। मैंने उनका हाथ पकड़ा।

"मैं लौटूँगा," मैंने कहा। "क्योंकि मैं अकेला नहीं आया हूँ।"

हम ऊपर आए। जैसे ही मैंने मैदान में पैर रखा, मैंने देखा — गंगा देवी वहीं खड़ी थीं, पर उनके हाथ बंधे थे। करण ने उन्हें पकड़ लिया था। और उनके पीछे, शेराज़ ज़मीन पर बैठा था, रणवीर सिंह की व्हीलचेयर के पहिये ने उसकी टाँग दबा रखी थी।

"मैंने कहा था ना," रणवीर सिंह ने कहा, "मैं इस मैदान का हर कोना जानता हूँ। ये शेराज़ जब आग भड़का रहा था, मैंने इसे उसी गड्ढे में धक्का दिया जिसमें ये गिरने वाला था।"

मीरा ने गुड़िया को साथ लेकर मेरी तरफ़ दौड़ा। उसने माँ को देखा और दौड़कर उनसे लिपट गई।

"माँ," वो रोई। "माँ, तुम ठीक हो?"

माँ ने उसका सिर सहलाया। "अब ठीक हूँ," उन्होंने कहा। "तू ठीक है, बस यही काफ़ी है।"

फिर माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुराईं।

"तूने मुझे ढूँढ लिया," उन्होंने कहा।

"मैं तुझे कभी नहीं खोता," मैंने कहा।

गंगा देवी ने एक आवाज़ निकाली। हम सबने उनकी तरफ़ देखा।

"तू जीत गया," उन्होंने धीरे से कहा। "पर तू ये मत सोच कि ये खेल खत्म हो गया। मेरा बेटा जेल में है, पर उसके हाथ अभी भी बाहर हैं। और जब तक वो ज़िंदा है, तेरे पीछे कोई न कोई शीशी खुलती रहेगी।"

"तो तेरा बेटा भी जाएगा," मैंने कहा। "उसी दिन, जिस दिन तेरा हिसाब पूरा होगा।"

पुलिस आई। इंस्पेक्टर शर्मा ने गंगा देवी को गिरफ़्तार किया और शेराज़ को बंधक बनाकर ले गए। मैंने उन्हें अपनी मुट्ठी में छिपी वो चीज़ दी जो गुड़िया ने मुझे दी थी — एक छोटी पीली शीशी, जिस पर "गंगा" नाम खुदा था। ये मुझे गड्ढे के पास मिली थी, उस जगह जहाँ गंगा देवी खड़ी थीं।

"ये सबूत है," मैंने कहा। "इस पर उसका नाम है, और अंदर जो है, वो ज़हर है।"

इंस्पेक्टर शर्मा ने शीशी थैली में रखी और सिर हिलाया।

"आज के बाद," उन्होंने कहा, "इस इलाक़े में कोई ज़हर की शीशी नहीं बिकेगी। ये मेरा वादा है।"

मैंने सिर हिलाया। पर मेरे भीतर कुछ कह रहा था कि ये खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। गंगा देवी के शब्द मेरे कानों में गूँज रहे थे — "मेरा बेटा जेल में है, पर उसके हाथ बाहर हैं।"

शाम को हम गाँव लौटे। रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। थकान सबके चेहरों पर थी। माँ को करण की गाड़ी में लिटाया गया था और गुड़िया उनके पास बैठी थी। टिंकू ने अपनी मिठाई की डिब्बी खोली और सबको बाँटी। किसी ने कुछ नहीं कहा, पर सबने खाया।

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