Spirit of a Fighter – Chapter 1088
मीरा मेरे सामने खड़ी थी। उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
"अब मेरी बात सुन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो कोर्ट में होती है। "मैं वैद्य की बेटी हूँ। मैं जानती हूँ ज़हर कैसे काटा जाता है। मैं जानती हूँ कि कौन-सी जड़ किस ज़हर को रोकती है, और कितनी देर में रोकती है। तू जानता है लड़ना। मैं जानती हूँ बचाना। अगर तू अकेला गया, तो तू लड़ेगा और वो तुझे ज़हर दे देगी — और तेरी लड़ाई वहीं खत्म। पर अगर मैं साथ गई, तो तेरे पीछे कोई खड़ा होगा जो उस ज़हर को पहचानता है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो मेरी आँखों से नहीं हटी।
"मैं डरकर पीछे बैठने वाली नहीं हूँ, वीर सिंह," उसने कहा। "मैं वो लड़की नहीं हूँ जिसे तू पीछे छोड़कर जाएगा। तूने मुझे मेरे पिता के सामने खड़ा किया था। तूने मेरे हाथ में मिट्टी दी थी। अब मुझे पीछे मत धकेल।"
मेरी आवाज़ कहीं गहरे से निकली।
"मीरा," मैंने कहा, "मैं तुझे खो नहीं सकता।"
वो एक पल चुप रही। फिर उसने मेरा हाथ अपनी दोनों हथेलियों में लिया।
"तो फिर मेरे साथ चल," उसने कहा। "और मुझे खोने का मौका किसी को मत दे।"
पीछे से पहियों की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा — रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर आ रहे थे, और उनके पीछे कमला देवी और करण थे। रणवीर सिंह के हाथ पहियों पर थे और उनकी आँखें मैदान की तरफ़ थीं।
"मैं भी चलूँगा," उन्होंने कहा।
"पिताजी—" मीरा ने कहा।
"ये मैदान मेरा पुराना अखाड़ा है," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो उनके पैरों ने छोड़ दी थी। "मैं यहाँ का हर कोना जानता हूँ। यहाँ की मिट्टी ने मेरी जवानी देखी है। यहाँ की हवा जब बदलती है, मुझे पता चल जाता है।"
"पर आप—"
"मैं व्हीलचेयर पर हूँ, अंधा नहीं," उन्होंने कहा। "और ये मैदान मेरे दोस्त भवानी की मौत का गवाह है। आज मैं इस मैदान का सच देखने जाऊँगा, चाहे कुछ भी हो।"
कालू काका आगे आए। उनकी लालटेन अब भी जल रही थी, दिन होने के बाद भी।
"और मैं उस सुरंग को जानता हूँ," उन्होंने कहा, "जो सीधे इस मैदान के नीचे जाती है। बीस साल पहले, जिस रात भवानी मरे, मैं उसी सुरंग से निकला था। मैं उसके हर मोड़ को याद हूँ।"
टिंकू ने अपनी टोकरी उठाई। उसके हाथ में वो पुरानी टीन की डिब्बी थी जिसमें वो मिठाई रखता था।
"और मैं मिठाई लेकर चलूँगा," उसने कहा।
सबने उसे देखा।
"क्यों?" करण ने पूछा।
"क्योंकि जीत के बाद कुछ मीठा तो चाहिए," टिंकू ने कहा। "और अगर हार गए, तो भी — आख़िरी मिठाई तो सबको मिलनी चाहिए।"
मैं हँसा। मेरे हँसने में डर था, पर हँसी थी।
"तू पागल है," मैंने कहा।
"पागल नहीं," टिंकू ने कहा। "तेरा भाई हूँ। भाई पागल होते हैं।"
गंगा देवी ने कुर्सी से कहा, "बातें खत्म, वीर सिंह? या मैं लड़की से शुरू करूँ?"
"रुको!" मैंने कहा। मैंने आगे एक कदम रखा और धुएँ से बचते हुए बोला, "मैं अकेले आऊँगा। पर पहले मेरी एक बात सुन।"
गंगा देवी ने सिर झुकाया।
"तूने बीस साल में जो किया," मैंने कहा, "वो सब सच है। तूने भवानी को ज़हर दिया, तूने भैरव को पाला, तूने मुंशीजी से काग़ज़ छिपवाए। पर एक बात तू नहीं जानती।"
"क्या?"
"भवानी ने अपनी मौत से पहले एक डायरी लिखी थी। और उसमें तेरा नाम है। पर सिर्फ़ तेरा नहीं — उसमें ये भी लिखा है कि तू कौन थी।"
गंगा देवी की मुस्कान पहली बार थोड़ी रुकी।
"तू झूठ बोल रहा है," उन्होंने कहा।
"मैं झूठ नहीं बोलता," मैंने कहा। "मैं सूंघता हूँ। और तूने अभी जो साँस ली — उसमें डर था।"
वो एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया और दोनों आदमियों को इशारा किया।
"छोड़ दो लड़की को," उन्होंने कहा।
गुड़िया को छोड़ दिया गया। वो दौड़कर मेरे पास आई और मेरे पेट से चिपक गई। उसका शरीर काँप रहा था।
"भैया," वो फुसफुसाई, "माँ को भी ले आना। वो अंदर हैं। उस कमरे में जहाँ बहुत अंधेरा है।"
मैंने उसे मीरा की तरफ़ धकेला।
"मीरा, इसे लेकर पीछे जाओ।"
मीरा ने गुड़िया का हाथ पकड़ा, पर मुझे देखा।
"तू आएगा ना?" उसने पूछा।
"आऊँगा," मैंने कहा। "मैंने तुझे वादा किया था — मैं अकेले नहीं हूँ।"
मैं मैदान की तरफ़ बढ़ा। धुआँ अब हल्का हो रहा था, हवा उसे बहा रही थी। पर उसके नीचे की गंध अब भी ज़मीन से चिपकी थी।
गंगा देवी उठीं। उनकी सफ़ेद साड़ी हवा में लहराई।
"अंदर आ," उन्होंने कहा। "तेरी माँ तेरा इंतज़ार कर रही है।"
मैंने पहला कदम रखा और मेरी नाक में एक नई गंध आई — चंदन, सूखा कपूर, और उसके नीचे मीठी गंध। गुड़ की चाशनी। यानी शेराज़ कहीं आसपास था।
मैं रुका और फुसफुसाया, "टिंकू, तू मेरे पीछे-पीछे आ। शेराज़ अंदर है। उसे देखते ही आवाज़ करना।"
टिंकू ने सिर हिलाया। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी और उसकी आँखों में डर था, पर वो पीछे नहीं हटा।
मैं मैदान के अंदर गया। ये मैदान बड़ा था — चारों तरफ़ ऊँची मिट्टी की दीवारें, बीच में लाल मिट्टी का गोल घेरा। पर आज मिट्टी पर कुछ और था। काले धब्बे। जले हुए निशान। और कोने में एक बड़ा सा गड्ढा जिसमें से अब भी धुआँ उठ रहा था।
गंगा देवी मेरे सामने खड़ी थीं। उनके हाथ में अब भी वो पीली शीशी थी, पर खाली।
"तूने पूछा था कि मैं कौन हूँ," उन्होंने कहा। "आज बता दूँ। मैं भवानी की चचेरी बहन थी। हम एक ही आँगन में खेले थे। पर जब वो अखाड़े का मालिक बना, तो मैं उसकी नौकर बन गई। और मेरा बेटा — विक्रम — उसका शिष्य। भवानी ने उसे अपना हाथ बनाया, फिर उसे ख़ुद से दूर किया। जब विक्रम ने अखाड़ा सँभालना चाहा, तो भवानी ने मना कर दिया — कहा, तू अभी तैयार नहीं है। और मेरे बेटे ने क्या किया? उसने अपना रास्ता खुद बनाया। मैंने उसे रोका नहीं। मैंने उसे शीशियाँ दीं।"
"तो भैरव तेरा बेटा था?" मैंने कहा। "विक्रम?"
"हाँ," उन्होंने कहा। "और भवानी ने उसे मारने की कोशिश की। उसने उसे ज़हर दिया — पर वो बच गया। और उसके बाद जो हुआ, वो मेरे बेटे ने किया। मैंने नहीं।"
"तू झूठ बोल रही है," मैंने कहा। "तूने भवानी को खुद ज़हर दिया था।"
गंगा देवी ने अपना सिर हिलाया। धीरे-धीरे। जैसे कोई बोझ उतार रही हो।
"नहीं," उन्होंने कहा। "दिया तो था, पर… वो ज़हर उसने खुद पिया। भवानी ने खुद। मैंने उसे शीशी दी थी, पर मैंने उसे पीने को नहीं कहा था। उसने खुद पी लिया।"
मेरी साँस रुक गई।
"क्यों?"
"क्योंकि उसने देख लिया था," गंगा देवी ने कहा, "कि मैं उसके बेटे — तेरे — को मारने वाली थी। और उसने अपनी जान देकर तुझे बचाया।"
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे पैर जैसे मिट्टी में धँस गए।
"तू… तू मेरी माँ को मारने वाली थी?"
"मैंने सोचा था," गंगा देवी ने कहा। "पर जब भवानी ने खुद ज़हर पी लिया, तो मैं रुक गई। क्योंकि उसने मुझसे एक वादा लिया था — कि मैं तुझे छोड़ दूँगी। और मैंने छोड़ दिया।"
मेरी आवाज़ काँप रही थी।
"तो आज क्यों?"
"क्योंकि आज सब खत्म होना चाहिए," उन्होंने कहा। "मेरा बेटा जेल में है, ठाकुर पकड़ा गया, और मेरा नाम अब किसी काग़ज़ में नहीं बचा। सिर्फ़ एक चीज़ बची है — तू। और मैं उसे खत्म करके अपना हिसाब पूरा करूँगी।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी।
"तो फिर तेरा हिसाब," मैंने कहा, "आज पूरा होगा।"
पर तभी, मैदान के पीछे से एक आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा — टिंकू ने ज़ोर से चिल्लाया।
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