Spirit of a Fighter – Chapter 1087
उसने अपने बाल पीछे बाँधे थे और हाथ में एक छोटा-सा थैला था। उसके चेहरे पर वो ज़िद थी जो अब मैं पहचानता था।
"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा। "और मत कहना कि नहीं।"
"मीरा…"
"वीर," उसने कहा। "मैं तेरे पीछे रहूँगी। मैदान के बाहर। जब तक तू अंदर है, मैं बाहर रहूँगी। पर अगर तू एक घंटे में बाहर नहीं आया, तो मैं अंदर आऊँगी। और फिर जो होगा, वो देख लेंगे।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो नहीं हिली।
"तू जानती है," मैंने धीरे से कहा, "कि अगर तू अंदर आई, तो वो तुझे भी…"
"मुझे पता है," उसने कहा। "पर मुझे ये भी पता है कि अगर तू अकेला गया और तुझे कुछ हो गया, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं करूँगी। और मुझे माफ़ी से ज़्यादा तेरी ज़रूरत है।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं मिले।
तभी टिंकू बाहर आया। उसके हाथ में मिठाई की एक छोटी डिब्बी थी, और उसकी आँखें लाल थीं — जैसे वो सोया ही न हो।
"ये ले," उसने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "रास्ते में खा लेना।"
"टिंकू…"
"और वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी। "अगर तू नहीं लौटा, तो मैं उस ठाकुर को ढूँढकर निकालूँगा। और मैं उसे अपनी खीर खिलाऊँगा — वो खीर जिसमें ज़हर होगा।"
मैं हँसा। पहली बार, दिल से।
"तू तो कसरत कल से शुरू करने वाला था," मैंने कहा।
"कल से," टिंकू ने कहा। "पर आज मैं तेरे पीछे-पीछे चलूँगा। बस दूर से।"
मैंने उसे गले लगाया। उसके कंधे पर हल्दी और घी की गंध थी — वो गंध जो मेरे बचपन से जुड़ी है।
हम निकले। सुबह की पहली किरण आसमान पर उतर रही थी। गाँव सो रहा था, पर फाटक पर करण के आदमी जाग रहे थे।
रास्ते में कालू काका मेरे पास आए।
"वीर," उन्होंने कहा। "एक बात कहनी है।"
"कहिए।"
"मैदान के पीछे एक पुराना कुआँ है," उन्होंने कहा। "वहाँ से सुरंग जाती है — उसी तरह जैसे अखाड़े में। भैरव ने वो भी बनवाई थी। अगर तुझे रास्ता चाहिए, तो वो कुआँ तेरा रास्ता है।"
"आप कैसे जानते हैं?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — पुराना दर्द।
"क्योंकि बीस साल पहले," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं वहीं से भागा था। उस रात, जब भवानी मरे। भैरव ने मुझे उसी सुरंग से निकाला था — कहा, जा, और कभी मत लौटना। पर मैं लौटा। क्योंकि मेरा बेटा यहीं था।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"आज आप मेरे साथ चलेंगे," मैंने कहा। "और आज कोई नहीं भागेगा।"
कालू काका ने सिर हिलाया। उनकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुराए।
हम मैदान की तरफ़ बढ़े। दूर से भारत केसरी का मैदान दिख रहा था — बड़ा, खुला, चारों तरफ़ ऊँची मिट्टी की दीवार। और उस दीवार के ऊपर, सुबह की धूप में, कुछ साये खड़े थे।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "वो देख।"
मैंने देखा।
मैदान के फाटक पर एक कुर्सी रखी थी। और उस कुर्सी पर, सफ़ेद साड़ी में, गंगा देवी बैठी थीं।
उनके हाथ में एक छोटी पीली शीशी थी।
और उनके पैरों के पास, ज़मीन पर, चंदा बैठी थी — हाथ बंधे, मुँह पर कपड़ा।
गंगा देवी ने हमें देखा। उन्होंने शीशी हवा में उठाई और मुस्कुराईं।
"आ गया, भवानी का बेटा," उनकी आवाज़ हवा में फैल गई। "मैंने कहा था ना — तेरे पास एक रात है। अब बता, तेरी बहन पहले, या ये लड़की?"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। मेरी हथेली में माँ की मिट्टी की गुड़िया थी — ठंडी, छोटी, पर मज़बूत।
"दोनों," मैंने धीरे से कहा। "दोनों लेकर जाऊँगा। और तेरे हाथ में जो शीशी है — वो भी।"
गंगा देवी हँसीं। उनकी हँसी सूखी थी, जैसे पुराने पेड़ की टहनी चटके।
"तो आ," उन्होंने कहा। "अंदर आ। पर याद रख — ये मैदान तेरे पिता की मौत का गवाह है। आज ये तेरी मौत का गवाह बनेगा या तेरी जीत का — ये तू तय करेगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरा हाथ दबाया।
और मैं मैदान की तरफ़ बढ़ा।
पर जैसे ही मैंने पहला कदम रखा, मेरी नाक में एक गंध आई — तेज़, तीखी, पहचानी हुई। कपूर। हल्दी। चंदन।
और उसके नीचे, बहुत गहरा, कुछ और — जली हुई मिट्टी की गंध।
मैं ठिठक गया।
क्योंकि ये गंध सिर्फ़ एक जगह से आ सकती थी — उस तहखाने से जो अभी भी जल रहा था।
और गंगा देवी की आँखों में कुछ ऐसा चमका जो मैंने पहले नहीं देखा था — जीत की चमक।
"रुक," मैंने कहा। मैंने मीरा का हाथ कसकर पकड़ा। "ये मैदान नहीं है।"
"क्या?" मीरा ने कहा।
"वो हमें मैदान में नहीं बुला रही," मैंने कहा। "वो हमें तहखाने में बुला रही है। और मैदान सिर्फ़ दिखावा है।"
तभी मैदान के पीछे से एक आवाज़ आई। धीमी। घसीटती हुई।
और मैंने देखा — मैदान की दीवार के पीछे से, धुएँ का एक काला स्तंभ उठ रहा था।
आग।
फिर से आग।
गंगा देवी ने शीशी खोली और उसे हवा में उलट दिया।
"तेरे पास एक रात थी, वीर सिंह," उन्होंने कहा। "अब तेरे पास एक घड़ी है।"
और शीशी से जो गिरा, वो पानी नहीं था।
वो ज़हर था — और वो मैदान की मिट्टी पर गिरते ही धुआँ बनकर उठने लगा।
॥
धुआँ ज़मीन से उठ रहा था, पतला और पीला, और उसमें से एक गंध आ रही थी जो मेरे मुँह में कड़वाहट घोल रही थी। मैंने नाक से साँस खींची और तुरंत मुँह फेर लिया। ये वही गंध थी जो उस रात तहखाने में थी — जली मिट्टी, कपूर, और कुछ सड़ा हुआ जो नाम नहीं ले सकता।
"पीछे हटो," मैंने मीरा और टिंकू को धक्का दिया। "ये धुआँ ज़हर है। साँस मत लेना।"
गंगा देवी कुर्सी पर बैठी रहीं। उनके चेहरे पर वो हल्की मुस्कान थी जो बुढ़ापे में भी नहीं मुरझाई थी।
"अरे, वीर सिंह," उन्होंने कहा, "तू तो बड़ा सूंघने वाला निकला। मैंने सोचा था तू दौड़कर अंदर आएगा।"
"अंदर आने से पहले," मैंने कहा, "मैं ये जानना चाहता हूँ कि मेरी बहन कहाँ है।"
गंगा देवी ने अपना हाथ उठाया और पीछे इशारा किया। मैदान का फाटक खुला और अंदर से दो आदमी गुड़िया को पकड़कर लाए। उसके हाथ बंधे थे, आँखों में आँसू, और मुँह पर कपड़ा बँधा था। पर जैसे ही उसने मुझे देखा, वो उछलने लगी।
"भैया!"
मेरे पेट में एक चाकू सा घुसा।
"गुड़िया," मैंने ज़ोर से कहा, "घबराना मत। मैं यही हूँ।"
गंगा देवी हँसीं।
"अब बात सुन," उन्होंने कहा। "ये मैदान मेरा है आज। तेरे पिता का नहीं, तेरा नहीं। और यहाँ शर्त एक ही है — तू मुझसे अकेले लड़ेगा। तेरे पीछे जो खड़े हैं, वो पीछे ही रहेंगे। अगर कोई आगे आया, तो ये लड़की वहीं मरेगी, और उसके बाद चंदा, और उसके बाद तेरी माँ।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें कड़क थीं।
"मत मान," उसने धीरे से कहा। "ये जाल है।"
"मीरा—"
"वीर, ये जाल है। वो तुझे अकेला चाहती है।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "पर मेरी बहन वहाँ है।"
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"तो फिर हम साथ जाएँगे," उसने कहा।
"नहीं।"
"वीर—"
"नहीं!" मेरी आवाज़ उससे ज़्यादा ऊँची निकल गई जितनी मैं चाहता था। "तू समझती नहीं। वो लोग पागल हैं, मीरा। ये औरत अपने ही भतीजे को ज़हर दे सकती है, अपनी बहन को जला सकती है। तू क्या समझती है कि वो तुझे छोड़ देगी? तू वहाँ गई तो तेरा मुँह देखूँगा और—"
मैं रुक गया। मेरी साँस फूल रही थी और मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने अपनी आवाज़ धीमी की।
"तू वहाँ गई तो," मैंने कहा, "मैं तुझे बचा भी नहीं पाऊँगा। क्योंकि मैं एक ही जगह खड़ा हो सकता हूँ। या गुड़िया के पास, या तेरे पास। और अगर मैंने एक पल भी इधर-उधर देखा, तो वो पल काफ़ी होगा।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno