Spirit of a Fighter – Chapter 1086
हम सब बाहर भागे।
फाटक के बाहर कोई नहीं था। पर ज़मीन पर, ठीक दहलीज़ के पास, एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था। पीला लिफ़ाफ़ा, जिस पर लाल स्याही से कुछ लिखा था। और लिफ़ाफ़े के कोने पर एक छोटा-सा गीला निशान — गुड़ की चाशनी।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उसमें काग़ज़ था।
मैंने पढ़ा।
"वीर सिंह,
अगर चंदा को ज़िंदा चाहते हो तो कल सुबह भारत केसरी के मैदान में अकेले आना। और हाँ — मीरा को साथ मत लाना। वरना दोनों की लाशें गिरेंगी।
तुझे वो लड़की चाहिए या अपनी ज़िद?
सोच ले। तेरे पास एक रात है।
— वो, जो तेरे पिता से भी पुराना है।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने काग़ज़ मीरा को दिया।
वो पढ़कर रुकी। उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"वो, जो तेरे पिता से भी पुराना है," उसने धीरे से दोहराया। "ये कौन है, वीर?"
मैंने काग़ज़ उसके हाथ से लिया और उसे सूँघा। स्याही में कुछ मिला था — नीम का तेल। और उसके नीचे, बहुत हल्का, चंदन।
"ये गंगा देवी नहीं लिख सकतीं," मैंने कहा। "गंगा देवी तो चंदन लगाती हैं, पर नीम का तेल… नीम का तेल वो आदमी लगाता है जो कब्रिस्तान में घूमता था। जो खुद को मोहन कहता है।"
"पर मोहन तो बँधा था," टिंकू ने कहा। "और अब गायब है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। मोहन गायब है, चंदा गायब है, और लिफ़ाफ़ा आया है। सब जुड़ा हुआ है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो मैंने पहली बार अखाड़े में देखी थी — जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था।
"तू अकेला नहीं जाएगा," उसने कहा।
"उसने कहा है…"
"मुझे पता है उसने क्या कहा है," मीरा ने काट दिया। "और मुझे ये भी पता है कि अगर तू अकेला गया, तो वो तुझे भी ले लेगा। एक-एक करके।"
"मीरा…"
"वीर सिंह," उसने मेरा पूरा नाम लिया, और उसका लहजा ऐसा था जैसे कोई ताला खोल रहा हो। "तूने मुझे कब्रिस्तान में अकेले जाने दिया था? नहीं। तूने मुझे नहर किनारे अकेले छोड़ा था? नहीं। तो अब मैं भी तुझे अकेले नहीं जाने दूँगी।"
उसकी आवाज़ काँपी, पर सिर्फ़ एक बार।
"और अगर उसे इतनी ही दिक्कत है मेरे साथ," उसने आगे कहा, "तो वो मेरी लाश गिराने की कोशिश करके देख ले। मैं उसकी लाश से पहले अपनी लाश नहीं गिराऊँगी।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़, और फिर एक लंबी साँस ली।
"मैं भी चलूँगा," उसने कहा।
"तू नहीं," मैंने कहा।
"मैं चलूँगा," टिंकू ने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी। "वो खीर मेरी दुकान की खीर थी, वीर। मेरे हाथों से बनी। मेरी मिठाई का इस्तेमाल मेरे ही भाई को डराने के लिए हुआ। अब मैं चुप नहीं बैठूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथों में अब भी हल्दी की गंध थी। उसके चेहरे पर वो मुस्कान नहीं थी जो हमेशा रहती थी। उसकी आँखों में कुछ ठंडा था।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर तेरा काम अलग होगा।"
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा।
"कालू काका, आप मेरे साथ चलेंगे।"
कालू काका ने सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था।
"मैं?" उन्होंने कहा। "मैं तो बीस साल चुप रहा…"
"और अब बोलने का वक़्त है," मैंने कहा। "मुझे भारत केसरी के मैदान का हर कोना चाहिए — कहाँ से घुसा जा सकता है, कहाँ से भागा जा सकता है, कौन-सा रास्ता बंद है। आपने वहाँ के पहलवानों को बड़ा होते देखा है। मुझे आपकी आँखें चाहिए।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपनी लाठी ज़मीन पर टेक दी और सीधे खड़े हो गए — जितना सीधे वो खड़े हो सकते थे।
"मेरी आँखें अब भी काम करती हैं," उन्होंने कहा। "बीस साल से मैं इन्हीं आँखों से मिट्टी देख रहा हूँ। अब एक बार इनसे सच भी देख लूँ।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "और करण?"
मैंने करण की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े पर खड़ा था, उसके हाथ बंधे हुए थे — जैसे वो खुद को रोक रहा हो।
"करण," मैंने कहा। "तेरे पास कितने आदमी हैं?"
"बत्तीस," उसने कहा। "और आज रात दस और आ रहे हैं।"
"तो उन्हें गाँव के चारों तरफ़ बिठा," मैंने कहा। "कोई भी अंदर न आए। माँ और गुड़िया के पास हमेशा दो आदमी रहें। और किसी को भी, किसी भी बहाने से, घर के अंदर मत आने देना।"
करण ने सिर हिलाया।
"और एक बात," मैंने कहा। मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला जो भवानी का आख़िरी काग़ज़ था — जो मोहन ने भट्ठे के संदूक में छोड़ा था। "ये काग़ज़ तेरे पास रहेगा। अगर कल शाम तक मैं न लौटूँ…"
"नहीं," करण ने कहा। उसने मेरा हाथ पकड़ा और काग़ज़ वापस मेरी जेब में रख दिया। "ये तेरे पास रहेगा। क्योंकि तू लौटेगा।"
उसकी आवाज़ में वो भरोसा था जो मुझे खुद पर नहीं था।
रात आई।
मैं आँगन में बैठा था। तारे साफ़ दिख रहे थे, जैसे किसी ने आसमान को धो दिया हो। चूल्हे पर माँ ने रोटी बनाई थी और मैंने दो खाईं। टिंकू ने अपनी दुकान से मिठाई की डिब्बी लाई थी और सबको बाँट दी थी — गुड़िया को, करण को, उसके आदमियों को। सबने खाई।
माँ मेरे पास आकर बैठीं।
"कल सुबह?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"अकेला?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "मीरा और टिंकू पीछे रहेंगे। करण के आदमी बाहर।"
माँ ने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। उनका हाथ सूखा था और उसमें आटे की गंध थी।
"वीर," उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने तुझे बहुत कुछ नहीं दिया। न पैसा, न नाम, न घर। बस ये चक्की दी और ये हाथ।"
"माँ…"
"सुन ले पहले," उन्होंने कहा। "जब तेरे पिता मरे, तो मैंने सोचा कि मैं भी मर जाऊँ। पर तू था। तू चार साल का था और तेरे हाथ में मेरी उँगली थी। उस दिन मैंने चक्की चलाई, और तब से रोज़ चलाई है। क्योंकि भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा। और तेरी दुआ… तेरी दुआ मेरे हाथों में है।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने सिर नीचा कर लिया ताकि वो देख न लें।
"कल तू जाएगा," उन्होंने कहा। "और जब लौटेगा, तो मैं तेरे लिए खीर बनाऊँगी। अपने हाथों से। और तू उसे खाएगा — चाहे वो ठाकुर की हो या किसी और की।"
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "गुड़िया…"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ स्थिर थी। "मुझे पता है वो किसकी बेटी है। पर वो मेरी बेटी है। और तेरी बहन। जब वो चार साल की थी और उसका बुखार नहीं उतरता था, तो मैंने रात भर उसका माथा सींकती रही। उस रात मैंने भगवान से कहा था — मेरी जान ले ले, पर इसे बचा ले।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। सूखा हाथ। काँपता हाथ। पर पकड़ मज़बूत।
"कल शाम," मैंने कहा। "मैं लौटूँगा। और गुड़िया को भी लाऊँगा। और चंदा को भी।"
"चंदा कौन है?" माँ ने पूछा।
मैं मुस्कुराया — पहली बार, कई दिनों में। "एक लड़की जो मेरी मिठाई बर्बाद करती है और जिसके हाथ में डायरी है।"
माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरा। "तेरे पिता भी ऐसे ही थे," उन्होंने कहा। "जब भी कोई मुसीबत आती, वो हँसते थे। मुझे लगता था वो पागल हैं। पर बाद में समझ आया — वो डर को हँसी से छुपाते थे।"
"मैं उनका बेटा हूँ," मैंने कहा।
"हाँ," माँ ने कहा। "तू उनका बेटा है।"
रात के तीसरे पहर में मैं उठा। मैंने अपनी धोती पहनी, बनियान पहनी, और अपनी जेब में वो चीज़ें रखीं — भवानी का काग़ज़, माँ की मिट्टी की गुड़िया, और वो चाँदी की अंगूठी जिस पर बाहरी पानी वाले आदमी का निशान था।
मैं बाहर निकला। आँगन में मीरा खड़ी थी।
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