Spirit of a Fighter1079 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1079

7 min read November 5, 2026

मोहन ने कालू काका की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — शायद शर्म।

"तू यहीं रुक," कालू काका ने उससे कहा। उनकी आवाज़ सख़्त थी। "तू मेरे साथ। और अगर तूने एक भी गलत हरकत की, तो याद रख — मैंने तुझे बचपन में गोद में खिलाया था। मैं तेरे चेहरे पर तेरे बाप की आँखें देख सकता हूँ।"

मोहन ने कुछ नहीं कहा। उसने सिर झुका लिया।

मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा। "तू माँ के पास रहना। कालू काका के साथ।"

"नहीं," गुड़िया ने कहा। उसकी आँखें भरी थीं, पर आवाज़ साफ़ थी। "मैं तेरे साथ चलूँगी।"

"गुड़िया…"

"भैया, मैंने एक बार माँ को अकेला छोड़ा और वो यहाँ आ गई।" उसका होंठ काँपा। "अब नहीं छोड़ूँगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी बारह साल की बहन। जिसकी उम्र खेलने की थी, और जो आज मेरे साथ खड़ी थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे पीछे रहेगी। हमेशा।"

उसने सिर हिलाया।

टिंकू ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "और शेराज़?"

"शेराज़ बाहर है," मीरा ने कहा। "मशाल लिए।"

"तो वो भी साथ चलेगा," मैंने कहा। "हमें रास्ता तो वही दिखाएगा।"

हम बाहर निकले। सूरज पूरा चढ़ आया था और अखाड़े की मिट्टी पर सुनहरी रोशनी पड़ रही थी। शेराज़ दरवाज़े के पास खड़ा था, मशाल अब बुझी हुई, बस धुआँ उठ रहा था।

"क्या हुआ?" उसने पूछा।

"गाँव चल रहे हैं," मैंने कहा। "और तू साथ चल रहा है।"

शेराज़ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने कंधे उठाए — जैसे कोई चारा न हो — और पीछे-पीछे चल पड़ा।

नहर किनारे का रास्ता सुबह की धूप में चमक रहा था। पानी ठंडा था और हवा में मिट्टी की गंध थी। हम तेज़ चल रहे थे — मैं आगे, मीरा मेरे बगल में, गुड़िया मेरे पीछे, टिंकू सबसे पीछे अपने बस्ते के साथ।

रास्ते में टिंकू ने गुड़िया के हाथ में एक लड्डू रखा।

"खा," उसने कहा। "भूखे पेट में डर ज़्यादा लगता है।"

गुड़िया ने लड्डू देखा। फिर उसने उसे मुँह में रखा और चलती रही।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके माथे पर पसीना था और बाल हवा में उड़ रहे थे।

"तूने अच्छा किया," मैंने कहा। "माँ के लिए।"

उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। "मैंने कुछ नहीं किया। तेरी माँ ने खुद साँस ली। मैंने सिर्फ़ हवा दी।"

"फिर भी।"

वो चलती रही। फिर बोली, "तेरी माँ के हाथ में जो कुछ है, वो कोई बीमारी नहीं है। वो ज़हर है। धीमा ज़हर। जो साँस को धीमा करता है। अगर हम देर करते, तो…"

"पर हमने नहीं की," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैं समझ नहीं पाया — गुस्सा, डर, और कुछ और भी।

"वीर," उसने कहा, "जब हम गाँव पहुँचेंगे, तो चंदा से सीधे बात करना। आरोप मत लगाना। पूछना। अगर वो डर से कुछ कर रही है, तो उसे बताना कि हम उसके साथ हैं।"

"और अगर वो सच में हमारे साथ नहीं है?"

"तो हमें पता चल जाएगा," उसने कहा। "और अगर वो सच में हमारे साथ नहीं है, तो उसका बाप उससे जो कह रहा है, वो हमें भी पता होना चाहिए।"

हम गाँव की तरफ़ मुड़े। दूर से नीम का पेड़ दिख रहा था, और उसके नीचे हमारा घर — कच्ची दीवारें, टूटी घड़ी, आँगन की चक्की।

और घर के बाहर, सड़क पर, धूल उठ रही थी।

मैंने कदम तेज़ किए। दूसरे भी तेज़ हुए।

घर के आँगन में चंदा बैठी थी। वो चक्की के पास बैठी थी और उसके हाथ में एक कटोरी थी — दाल या कुछ और। उसने हमें देखा और उठ खड़ी हुई।

"तुम लौट आए," उसने कहा। उसकी आवाज़ में चिंता थी — असली चिंता। "मैंने सोचा तुम सब…"

"चंदा," मैंने कहा। मैं रुका। मीरा की बात याद आई। "तेरे पिता ने तुझे कुछ भेजा है? कोई संदेश? कोई आदमी?"

चंदा का चेहरा बदला। उसने कटोरी नीचे रखी।

"कैसे जाना तुमने?" वो धीरे से बोली।

मेरा दिल धड़का। "क्या भेजा?"

"एक आदमी आया था," चंदा ने कहा। "सुबह। उसने कहा कि तुम सब अखाड़े में मारे गए। उसने कहा कि मैं तुम्हारे घर में इसलिए हूँ कि तुम्हारी माँ और बहन को… कि मैं उन्हें…" वो रुकी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। "मैंने उसे गाली दी और भगा दिया। मैंने कहा कि मैं अपने बाप की बेटी नहीं हूँ।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। गुड़िया ने भी।

मैंने चंदा की आँखों में देखा। वो सच बोल रही थी। मैं उसके चेहरे पर देख सकता था — उसका होंठ काँप रहा था, उसके हाथ कटोरी से चिपके हुए थे।

"तू हमारे साथ है?" मैंने पूछा।

"मैं तुम्हारे घर में आई," उसने कहा। "तुमने मुझे रखा। तुम मेरे बाप के दुश्मन हो — और तुमने मुझे रखा।" उसने सिर उठाया। "मैं किसके साथ हूँ, वो अब तुम बताओ।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने हल्का सिर हिलाया।

"तो फिर," मैंने कहा, "एक काम करना होगा। और वो काम सिर्फ़ तू कर सकती है।"

चंदा ने गला साफ़ किया। "क्या?"

"तेरे बाप ने जो आदमी भेजा था," मैंने कहा, "वो कहाँ गया? कहाँ मिलेगा उसका आदमी?"

चंदा ने कुछ सोचा। फिर उसकी आँखें चमकीं।

"वो जाते वक़्त बोला था," उसने कहा, "कि अगर मैं कुछ चाहूँ, तो नहर के पार पुराने भट्ठे पर आ जाऊँ। वहाँ कोई मिलेगा।"

मैंने मुट्ठी बांधी। भट्ठा। वही भट्ठा जहाँ से सुरंग जाती थी। वही जगह जहाँ कालू काका ने कहा था कि आग लगी थी।

"तो चले," मैंने कहा। "पर इस बार खेल बदल जाएगा।"

मैं पलटा और घर के भीतर गया। दीवार पर टूटी घड़ी टिक-टिक कर रही थी — जब से मुझे याद है, वही टिक-टिक। मैंने उसे देखा और मन में कहा — आज तेरी टिक-टिक बंद होगी, या हमारी।

मैंने अपनी धोती की जेब से वो काग़ज़ निकाला जो माँ ने दिया था। उसे खोला। उस पर भवानी की लिखाई थी — "पानी… मत… पीना"। मैंने उसे सीने से लगाया।

फिर मैं बाहर आया।

"गुड़िया," मैंने कहा, "तू माँ के पास रहेगी। ये बात अब बहुत साफ़ है।"

इस बार गुड़िया ने बहस नहीं की। उसने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।

"पर भैया," उसने कहा, "तू जीतकर आना। वरना मैं तुझे नहीं छोड़ूँगी।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"कालू काका," मैंने कहा, "तू माँ और गुड़िया के साथ रह। मोहन को भी अपने पास रख।"

कालू काका ने सिर हिलाया। उन्होंने मोहन की तरफ़ देखा। "चल," उन्होंने कहा, "तू मेरे साथ।"

मोहन उठा। उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा, फिर नज़रें नीचे कर लीं।

एक पल के लिए मुझे लगा कि उसके चेहरे पर कुछ कहने को है। पर वो चुप रहा।

हम बाहर आए — मैं, मीरा, टिंकू, चंदा और शेराज़। पाँच लोग। नहर के उस पार भट्ठे की तरफ़।

टिंकू ने अपना बस्ता कसकर बाँधा।

"भाई," उसने कहा, "एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"वो तवा काम आया ना?" उसकी आँखों में हल्की मुस्कान थी।

मैं हँसा। पहली बार उस दिन में। हँसी छोटी थी, पर आई।

"आया," मैंने कहा। "तू अब तक का सबसे बड़ा पहलवान है जो मिठाई बेचता है।"

"मैं तो कहता हूँ," टिंकू ने कहा, "कि मेरी मिठाई एक दिन जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाएगी। और आज वो दिन आ गया।"

हम चल पड़े। नहर का पुल पार किया। पानी की आवाज़ हमारे कदमों के साथ चल रही थी। सूरज सिर पर आ गया था और धूल गरम हो रही थी।

दूर भट्ठे की टूटी चिमनी दिख रही थी — काली, जली हुई, आधी गिरी।

मीरा मेरे बगल में चल रही थी। उसने धीरे से कहा, "वीर।"

"हाँ।"

"अगर वहाँ ठाकुर का आदमी है, तो वो हथियार लेकर होगा। हम पाँच हैं।"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

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