Spirit of a Fighter – Chapter 1080
"तो हम क्या करेंगे?"
मैंने भट्ठे की तरफ़ देखा। फिर मीरा की तरफ़।
"हम सीधे नहीं जाएँगे," मैंने कहा। "पहले सूंघेंगे।"
हवा में कुछ था। मैंने आँखें बंद कीं और साँस भीतर खींची।
गरम मिट्टी, जली ईंटों की राख, और उसके नीचे — गुड़ की चाशनी की वो बू जो मुझे अब पहचान हो चुकी थी। शेराज़ के कपड़ों की बू। यानी कोई और भी वहाँ है जो शेराज़ की तरह भैरव का आदमी है।
पर उसके साथ एक और गंध थी। मैंने आँखें खोलीं।
"वहाँ दो लोग हैं," मैंने कहा। "एक शेराज़ की तरह गुड़ के पानी में भीगा हुआ। और दूसरा…"
"दूसरा?"
"दूसरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई, "वो गंध है जो मैंने आज सुबह मोहन के कोठे में सूंघी थी। बादाम का तेल। वो कोई और नहीं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मोहन?" उसने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "मोहन से जुड़ा कोई। जिसने उसके जले हुए शरीर पर मरहम लगाया। जिसने उसे कोठे में रखा। जो उसके हर ज़ख्म को जानता है।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। धूल मेरे नाखूनों के नीचे भर गई।
"तो भट्ठे पर मिलेगा," मैंने कहा। "वो आदमी जो मोहन का डॉक्टर है। और शायद ठाकुर का सबसे पुराना आदमी।"
हम भट्ठे की तरफ़ बढ़े। मेरे कदमों के नीचे सूखी मिट्टी चटक रही थी, और दूर चिमनी से धुआँ नहीं, बस एक पतला-सा सफ़ेद धागा उठ रहा था।
कोई वहाँ है।
और मुझे लगा कि ये बात मैंने अभी तक किसी को नहीं बताई — भट्ठे की मिट्टी में उस वक़्त अचानक एक नई गंध आई, जो बीस साल पुरानी थी। गंध सिर्फ़ मोहन के जले शरीर की नहीं थी। वो भवानी की थी। मेरे पापा की। जैसे वो आज भी उस भट्ठे में खड़े हों और मेरा इंतज़ार कर रहे हों।
मैंने कदम रोके और पीछे मुड़कर देखा।
गाँव की तरफ़ से एक बैलगाड़ी आ रही थी। उस पर कोई बैठा था — सफ़ेद कपड़े में। बैलगाड़ी तेज़ी से हमारी तरफ़ आ रही थी और उसके पहियों की आवाज़ दूर से आ रही थी।
"टिंकू," मैंने कहा, "वो कौन है?"
टिंकू ने आँखें सिकोड़कर देखा। फिर उसका मुँह खुला।
"अरे," टिंकू ने धीरे से कहा, "ये तो वो औरत है जो कल रात गाँव के बाहर मिली थी। सफ़ेद ओढ़नी वाली।"
मेरी नसें खिंच गईं। बैलगाड़ी पास आई और रुकी। सफ़ेद ओढ़नी वाली औरत उतरी। उसकी आँखें लाल थीं, होंठ सूखे। वो सीधे मेरे पास आई।
"तू भवानी का बेटा है?" उसने पूछा। आवाज़ रूखी थी, जैसे बहुत देर से बोल रही हो।
"हाँ।"
"मेरा नाम रामकली है। मैं मोहन की बहन हूँ।"
हवा एक पल के लिए रुक गई। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके हाथ बैग पर जमे थे।
"मैं बीस साल से उसे ढूँढ रही हूँ," रामकली ने कहा। "आज सुबह खबर मिली कि वो ज़िंदा है। पर मुझे ये भी बताया गया कि तू उसे मारने चल पड़ा है।"
"वो ठाकुर का आदमी है," मैंने कहा।
"वो ठाकुर का गुलाम है," उसने मेरी आवाज़ काटी। "और गुलाम अपनी मर्ज़ी से नहीं चलता।"
रामकली ने अपनी ओढ़नी खोली। उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी। फटी, जली हुई। उसमें दो बच्चे खड़े थे — एक लड़का, एक लड़की। और उनके पीछे एक आदमी।
मैंने देखा और मेरा गला सूख गया। वो आदमी मेरे पापा थे। जवान, हँसते हुए।
"ये तस्वीर भट्ठे की आग से बची है," रामकली ने कहा। "उस रात भट्ठे में आग लगी थी, तब मोहन वहाँ था और भवानी भी। मेरा भाई जला, पर मेरे पापा ने उसे बचाया था। भवानी ने, वीर। उसने मोहन की जान बचाई थी।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।
"तो मोहन ने मुझसे झूठ कहा?"
"मोहन को बीस साल तक ठाकुर ने यही बताया," रामकली ने कहा। "कि भवानी ने उसे जलाया। जो आदमी उसका बचाने वाला था, उसी से ठाकुर ने उसे नफ़रत करवा दी। ये ठाकुर का सबसे बड़ा खेल है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर रामकली की तरफ़।
"मैडम," टिंकू ने कहा, "जो आदमी आग लगाकर दूसरे को बचाने वाला बताता है, वो तुम्हें बचाएगा?"
रामकली टिंकू को देखकर रुकी।
"तेरी आवाज़ में सच है, बेटा," उसने कहा। "इसीलिए मैं तुझे साथ ले चलूँगी। मोहन मेरी बात सुनेगा। और अगर नहीं सुना…" उसकी आवाज़ भर आई, "तो मैं उसके सामने मर जाऊँगी।"
हम चले। भट्ठा अब करीब था। टूटी दीवार के पीछे से आवाज़ आई।
"रुक जाओ।"
मोहन निकला। एक हाथ में लोहे की छड़, दूसरे में कुछ छिपा। उसने रामकली को देखा।
"रामकली?"
"हाँ, भाई," वो आगे बढ़ी। "मैं हूँ। और अब तू मेरी बात सुनेगा।"
मोहन का हाथ काँपा। "तू वहाँ क्यों आई? ठाकुर जान जाएगा तो…"
"तो क्या?" रामकली ने कहा। "जैसे उसने तेरी जान छोड़ी है? भाई, तू जला। बीस साल जला। और बचाने वाले को कोसता रहा।"
मोहन की छड़ नीचे लटक गई। उसके चेहरे पर पसीना था और आँखें फटी हुई थीं। "नहीं… भवानी ने…"
"भवानी ने तुझे उठाया था!" रामकली चीखी। "आग में से खींचा था उसने। उसके हाथ भी जले थे।"
मोहन ने छड़ फेंक दी। वो धूल में बैठ गया, दोनों हाथों से अपना जला हुआ चेहरा ढक लिया। सिसकियाँ उसके हाथों के बीच से निकलीं। किसी बूढ़े आदमी की आवाज़ आई, जो बच्चे की तरह रो रहा हो।
रामकली ने उसके सिर पर हाथ रखा। "बस, भाई। अब बता। ठाकुर ने तुझे क्या कहा था?"
मोहन ने हाथ हटाए। उसके गालों पर आँसुओं की लकीरें थीं, जो जले हुए होने की वजह से सूखते ही झुर्रियों में भर गईं।
"ठाकुर ने मुझे कहा था," वो कराहा, "कि मैं उस लड़की को ज़िंदा रखूँ। जो उसकी बेटी है। वो मुझे नहीं, उसे ज़िंदा चाहता था।"
"कौन?" मीरा ने पूछा। "कौन-सी लड़की?"
"वो," मोहन ने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, "ये जो तेरे पीछे चल रही है।"
मैंने पलटकर देखा। मीरा खड़ी थी।
"मुझसे मत पूछो," मीरा ने कहा, "मैंने ठाकुर को कभी नहीं देखा।"
मोहन हँसा। बुरी, टूटी हँसी।
"तूने उसे देखा है," वो बोला। "हर बार जब आईने में देखती है। और आज सुबह से वो तेरे गाँव में बैठी चाय पी रही है। तेरे घर में। तेरे भैया के साथ।"
मीरा का चेहरा सफ़ेद हो गया।
"क्या बक रहा है?" मैंने कहा।
"तेरे घर में," मोहन ने खाँसते हुए कहा, "तूने जिसे गुड़िया कहा, वो ठाकुर की बेटी है।"
॥
वो शब्द मेरे कानों में घुसा और मेरे भीतर कुछ टूट गया।
गुड़िया। ठाकुर की बेटी।
मैंने मोहन को देखा। वो धूल में बैठा था, उसका जला चेहरा पसीने और आँसू से भीगा था, और उसकी आँखें मुझ पर टिकी थीं।
"बोल," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी। "गुड़िया के बारे में बोल।"
"मैं क्या बोलूँ?" मोहन ने कहा। उसकी आवाज़ रेत जैसी थी। "जो सच है, वो बोल दिया। ठाकुर ने उसे तेरे घर में रखवाया था। तेरी माँ को बोला था कि ये अनाथ लड़की है, पाल ले। और तेरी माँ ने पाल लिया। बारह साल।"
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसका हाथ ठंडा था, पर पकड़ मज़बूत थी।
"वीर," वो धीरे बोली, "चंदा अकेली नहीं है। करण और हरनाम वहाँ हैं। गाँव में।"
"तू कैसे जानती है कि वो वहाँ हैं?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ कड़वी निकली। "तू कैसे जानती है कि ठाकुर ने अपना आदमी वहाँ नहीं भेजा?"
मीरा रुकी। उसने मेरी आँखों में देखा और मुझे लगा कि वो कुछ कहना चाहती है, पर फिर उसने होंठ भींच लिए।
"तो चलकर देख लेते हैं," वो बोली। "यहीं बहस करके क्या होगा?"
मैंने मोहन की तरफ़ देखा। वो अब भी धूल में बैठा था, उसकी छड़ दूर पड़ी थी। मेरे भीतर एक गुस्सा उठ रहा था जो मेरी छाती को चौड़ा किए दे रहा था।
"टिंकू," मैंने कहा। "रस्सी है?"
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