Spirit of a Fighter1078 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1078

7 min read November 5, 2026

उसने हाथ बढ़ाया — पर उस वक़्त तक टिंकू पीछे से आ चुका था।

मुझे नहीं पता टिंकू वहाँ कब आया। मैंने उसे देखा भी नहीं था। पर जब मोहन ने हाथ बढ़ाया, तो टिंकू ने अपना तवा — वो गरम लोहे का तवा जो वो हमेशा अपने बस्ते में रखता था, किसी भी मिठाई वाले की तरह — मोहन के हाथ पर रख दिया।

मोहन चीख पड़ा। चीख इतनी तेज़ थी कि अपने आप निकली — जले हुए चेहरे वाले आदमी की आवाज़ में भी चीख पूरी होती है। उसने हाथ झटका और पीछे हटा। तवा खड़खड़ाता हुआ मिट्टी में गिरा।

"सॉरी," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में सच में सॉरी थी। "हाथ फिसल गया। मैं तो आपको लड्डू देने आया था।"

मैंने वो पल नहीं गँवाया। तीन कदम में खिड़की तक पहुँचा, पल्ले को धक्का दिया। जंग लगी कुंडी टूटी और पल्ला खुल गया। सुबह की ठंडी हवा कोठे में घुसी — तेज़, ताज़ी, नहर की गंध लिए।

मीरा ने शीशी माँ के होंठों से लगाई। एक बूँद, दो बूँद। उसने माँ का सिर थोड़ा ऊपर किया, अपने घुटने पर रखा, और धीरे से उनके गले में उतारा।

"हवा लग रही है," मीरा ने कहा। "अब रुकिए मत। साँस लीजिए। धीरे, पर लीजिए।"

मैंने माँ का हाथ पकड़ा। ठंडा था। सूखा था। वो हाथ जो रोज़ चार बजे चक्की पकड़ता था, आज मेरी उँगलियों में ऐसा पड़ा था जैसे कोई टहनी टूटकर गिरी हो।

"माँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भर आई। "माँ, देखो — मैं आ गया।"

उनकी पलकें फिर हिलीं। इस बार ज़्यादा। उन्होंने आँखें खोलने की कोशिश की और मुझे देखा — धुँधला, पर मुझे। और उनके होंठ हिले।

"बेटा…" आवाज़ इतनी धीमी थी कि मैंने ज़्यादा सुना महसूस किया। "तू… आ गया…"

मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने सिर हिलाया, कुछ कह नहीं पाया।

गुड़िया ने अपना हाथ मुँह से हटा दिया। वो रोई, पर इस बार आवाज़ निकली।

"भैया।" उसने मेरे गले में हाथ डाल दिए। उसका शरीर काँप रहा था। "मैंने उसे रोका, भैया, मैंने बहुत रोका — पर वो माँ को खींच लाया। मैंने कहा मत करो, पर…"

"तू बहादुर है," मैंने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा। "तू मेरी शेरनी है। तूने कुछ गलत नहीं किया।"

पीछे मोहन कराह रहा था। उसने अपना जला हाथ थामा हुआ था और दीवार से टेक लगाकर खड़ा था। उसकी आँखों में अब वो ठंडक नहीं थी — कुछ और था। डर। असली डर।

"तुम सब मरोगे," उसने कहा। आवाज़ में ज़हर लौट रहा था। "तुमने सोचा कि ठाकुर अंदर है और तुम बाहर हो? ठाकुर ने मुझे यहाँ नहीं रखा, वो मुझे यहाँ छोड़कर गया है। ठाकुर ने मुझे बताया कि मैं सिर्फ़ अगली सुबह तक ज़िंदा रहूँगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्यों?"

"क्योंकि मैं जानता हूँ वो कहाँ है," मोहन ने कहा। उसके होंठ मुड़े। "और जो जानता है, उसे ज़िंदा नहीं छोड़ते।"

कालू काका आगे आए। उन्होंने मोहन के हाथ को देखा — जला हुआ, छाले पड़े थे।

"तू बोल क्या रहा है," कालू काका ने कहा। "ठाकुर गिरफ़्तार है। इंस्पेक्टर शर्मा ने उसे कल ही पकड़ा था।"

मोहन हँसा। पर वो हँसी पहले जैसी नहीं थी। उसमें ज़ोर नहीं था।

"गिरफ़्तार?" उसने सिर हिलाया। "वो गिरफ़्तार नहीं हुआ। वो तुम्हें गिरफ़्तार करवाने गया था। और जब वो लौटा, तो लौटा उस काग़ज़ के साथ जो उसने तुम सबके सामने जलाया था। पर वो काग़ज़ जला नहीं था।"

मेरा दिल धड़का। "क्या मतलब?"

"मतलब ये," मोहन ने कहा, "कि जो इंस्पेक्टर कल तुम्हारे साथ खड़ा था, वो आज सुबह ठाकुर के आदमियों के साथ खड़ा होगा। और उसने मुझे यहाँ इसलिए छोड़ा है ताकि मैं तुम सबको एक जगह रोककर रखूँ। जब तक वो अपना काम नहीं कर लेता।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।

"वो क्या काम?" मैंने पूछा।

मोहन ने अपना जला हाथ नीचे किया। उसने कोठे की दीवार पर टिकी मशाल की तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।

"तुम सब यहाँ हो," उसने कहा। "अखाड़ा खाली है। गाँव में सिर्फ़ औरतें, बूढ़े और बच्चे हैं। और तुम्हारे घर में…" वो रुका। उसने होंठ चाटे। "…तुम्हारे घर में एक लड़की बैठी है जो ठाकुर की बेटी है। उसने कहा था कि वो तुम सबके साथ जाएगी, तुम्हारे घर में रहेगी। और तुमने उसे रख लिया।"

मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।

चंदा।

चंदा हमारे घर में थी। माँ की चारपाई के पास। गुड़िया की किताबों के पास। उस डायरी के साथ जिसमें उसने अपने ही पिता के जुर्म लिखे थे।

"चंदा को तुमने…" मैंने कहा, और आवाज़ फँस गई।

"चंदा को मैंने कुछ नहीं कहा," मोहन ने कहा। "पर उसका बाप उसे जानता है। और ठाकुर जानता है कि तुम उसकी बेटी को अपने घर में रखोगे — क्योंकि तुम भवानी के बेटे हो। तुम दया दिखाओगे। और दया ही तुम्हारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।"

कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर," उन्होंने कहा, "ये झूठ बोल रहा है। चंदा ने अपने बाप के सारे जुर्म खोले हैं। वो…"

"वो अपने बाप की बेटी है," मोहन ने काटा। "और बाप बेटी को कभी नहीं छोड़ता। चाहे बेटी कितनी भी सच्ची हो।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने माँ का हाथ छोड़ा और उठी। उसका चेहरा सख़्त था पर आँखें शांत।

"ये सबसे आसान चाल है," मीरा ने कहा। "हमें डराने की। हमें वापस भेजने की। अगर हम अभी गाँव की तरफ़ भागेंगे, तो अखाड़ा खाली छोड़ देंगे, और ठाकुर को वो मिल जाएगा जो उसे चाहिए।"

"और क्या चाहिए उसे?" मैंने पूछा।

"रजिस्टर," मीरा ने कहा। "जिसमें उसके आदमी का नाम है। भारत केसरी के लिए।"

मोहन ने हमारी बातें सुनीं। उसके चेहरे पर कुछ बदला। वो धीरे से हँसा, पर हँसी में ज़हर था।

"तुम अभी भी नहीं समझे," उसने कहा। "रजिस्टर की बात नहीं है। ठाकुर को रजिस्टर से क्या? उसे तुमसे मतलब है। तुम अगर अखाड़े में खड़े हो, तो उसका सारा खेल बेकार है। और तुम्हें अखाड़े से बाहर रखने का सबसे आसान तरीका है — तुम्हारा घर।"

उसने मेरी आँखों में देखा। और इस बार उसकी आवाज़ में वो ज़हर नहीं था। कुछ और था। कोई पुराना दर्द।

"तू भवानी का बेटा है," उसने कहा। "मुझे उस आदमी से बैर था। पर आज…" वो रुका। उसने अपना जला हाथ देखा। "…आज मुझे लगता है कि उसने मुझे जलाया नहीं था। शायद। और शायद इसीलिए मैं आज तुझे ये बता रहा हूँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "बता क्या रहा है?"

"चंदा को अपने घर से निकाल दे," मोहन ने कहा। "आज ही। अभी। वरना वो तेरे घर के सबसे कमज़ोर कोने से तेरे घर को जला देगी। और मैं नहीं कह रहा कि वो जान-बूझकर करेगी। मैं कह रहा हूँ कि उसके हाथ में उसके बाप का डर है। और डर के हाथ में आदमी अपने आप कुछ नहीं करता — उसके हाथ से हो जाता है।"

कोठे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ माँ की धीमी साँस सुनाई दे रही थी।

टिंकू ने अपना तवा उठाया और उसे अपने बस्ते में रखा। फिर उसने अपनी टोपी ठीक की — वो हरकत जो वो हमेशा करता था जब कुछ सोचता था।

"भाई," उसने कहा, "मैं एक बात कहूँ?"

"कह।"

"अगर चंदा ने सच में हमें धोखा दिया है, तो वो अपने बाप के पास वापस जा चुकी होगी। और अगर नहीं दिया है, तो वो हमारे घर में बैठी है और उसे पता भी नहीं कि उसका बाप उसे इस्तेमाल कर रहा है।" उसने कंधे उठाए। "दोनों हालत में हमें घर जाना तो पड़ेगा ही।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया — हल्का, पर हाँ।

"माँ को यहीं नहीं छोड़ सकते," मैंने कहा।

"मैं यहीं रहूँगी," कालू काका ने कहा। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और चरपाई के पास खड़े हो गए। "भवानी का बेटा और उसकी माँ — दोनों को मैंने बीस साल नहीं बचाया। अब मैं इन्हें अपनी लाठी के सहारे रखूँगा।"

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