Spirit of a Fighter – Chapter 1077
मीरा ने शीशी अपनी हथेली में कसकर पकड़ ली। "तो अब क्या? हम अखाड़े जा रहे हैं — और वहाँ ठाकुर के आदमी पहले से होंगे।"
"होंगे," मैंने कहा। "पर वो नहीं जानते कि हम जानते हैं।"
मोहन ने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार उसके चेहरे पर कुछ बदला — जैसे कोई पुराना पहलवान जाग रहा हो।
"तू सोच क्या रहा है?" उसने पूछा।
"मैं सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि अगर ठाकुर मुकाबले में अपना आदमी जिताना चाहता है, तो उसे उस आदमी का नाम अखाड़े के रजिस्टर में लिखवाना पड़ेगा। और रजिस्टर रात को ताला बंद करके गुरुजी के कमरे में रखा जाता है।"
"तो?" टिंकू ने कहा।
"तो हम उस रजिस्टर में देखेंगे। नाम पता चला, तो खेल पता चला।"
हम फिर चल पड़े। सूरज अब पूरा निकल आया था और नहर का पानी सुनहरा दिख रहा था। दूर अखाड़े की दीवार दिखने लगी थी — ऊँची, मिट्टी के रंग की, और उसके पीछे से हल्की धूल उठ रही थी, जैसे किसी ने अभी-अभी मिट्टी सींची हो।
अखाड़े का लोहे का दरवाज़ा खुला था, पर उसके भीतर से एक आवाज़ आ रही थी जिसने मेरे पैर रोक दिए।
"एक… दो… तीन…"
गिनती। धीमी, साफ़, एक-एक अंक पर रुकती हुई।
मैंने दरवाज़ा धक्का दिया। वो अंदर से बंद था।
शेराज़ मशाल लेकर सामने खड़ा था। मशाल की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी और हँसी उसके दाँतों पर चमक रही थी।
"गुरुजी गिनती में माहिर हैं," उसने कहा। "हर साँस का हिसाब रखते हैं।"
कालू काका मशाल के पास झुके और दरवाज़े की जंग लगी कुंडी देखी। उन्होंने उँगली उस पर फेरी और फिर पीछे हट गए।
"ये बाहर से बंद नहीं है," उन्होंने कहा। "ये अंदर से खुल रहा है।"
मैंने कंधा लगाया। लोहा चरमराया, जंग टूटकर गिरी, और दरवाज़ा खुल गया।
अंदर अंधेरा था और बादाम के तेल की तेज़ गंध। मेरी आँखों में पानी आ गया।
एक बूढ़ा आदमी चरपाई के पास बैठा था। उसका चेहरा जला हुआ था, बाल सफ़ेद, और गाल पर एक लंबा टाँका। वो उँगली से गिन रहा था — होंठ हिल रहे थे पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
चरपाई पर माँ पड़ी थी। साँस धीमी, छाती मुश्किल से उठ रही थी।
और कोने में गुड़िया बैठी थी।
वो रो रही थी। चुपचाप। उसने मुँह पर अपना हाथ रखा हुआ था और आँसू उसकी उँगलियों के बीच से बह रहे थे। मुझे देखकर उसके कंधे और ज़ोर से हिलने लगे, पर उसने हाथ नहीं हटाया। जैसे उसे बता दिया गया हो कि आवाज़ की तो बात ही नहीं।
मेरा गला भर आया।
"मैं तेरे पास हूँ, गुड़िया," मैंने धीरे से कहा।
उसकी आँखें मुझ पर टिकी रहीं। आँसू गिरते रहे और होंठ हिले — "भैया" — पर आवाज़ नहीं निकली।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
"रुक जा," बूढ़े ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी लकड़ी की तरह चटकी। "अगला कदम बढ़ाया तो मैं रुक जाऊँगा — और फिर साँस गिनने का काम कोई नहीं करेगा।"
मैं ठिठक गया।
बूढ़ा उठा। उसने अपनी कमीज़ का कॉलर खोला और अपनी सीने की तरफ़ इशारा किया।
"देख," उसने कहा। "मेरे सीने पर ये निशान किसने बनाए — तेरे पिता भवानी ने। और मैं उनका सबसे बड़ा शिष्य था। मेरा नाम याद है? मोहन।"
॥
मोहन।
नाम सुनते ही मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया। तहखाने की स्लेट पर वही नाम खुदा था — कालू काका ने मेरी आँखों के सामने उँगली से मिटाया था, पर अक्षर आज भी मेरे भीतर बैठे थे। शीशी के पेंदे पर वही नाम। मुंशीजी के हर काग़ज़ पर वही निशान।
"मोहन," मैंने धीरे से दोहराया। मेरी आवाज़ अपने कानों में पराई लगी।
बूढ़े के होंठ हिले। "हाँ। तेरे पापा का सबसे बड़ा शिष्य। जिसे वो अपने बेटे की तरह रखते थे। जिसे उन्होंने अखाड़े से निकाल दिया — रात के अंधेरे में, एक लाठी के सहारे, बिना वजह बताए।"
उसने अपनी कमीज़ का कॉलर और नीचे खींचा। उसके सीने पर एक पुराना निशान था — जला हुआ, झुर्रियों में बदला हुआ, गोल। जैसे कोई दीया उसकी छाती पर रखकर जला हो।
"ये तेरे पिता की देन है," उसने कहा। "मुझे तेल से भिगोकर जलाया गया था। मैं चीखता रहा, और वो खड़े देखते रहे।"
मेरा हाथ मुट्ठी में बंध गया। खून मेरे कानों में बजने लगा। मैं उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ा ही रहा था कि कालू काका मेरे आगे आ गए। उनका कुबड़ा शरीर मेरे और मोहन के बीच दीवार बन गया।
"झूठ," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर बोल रही थी। "भवानी ने आग नहीं लगाई थी। वो रात मैं भट्ठे पर था। आग तो उस वक़्त लगी जब ये खुद शीशियाँ छुपा रहा था और उसका हाथ फिसल गया। भवानी तो उसे बचाने दौड़े थे — अपनी जान जोखिम में डालकर। मैंने अपनी आँखों से देखा, भवानी ने अपनी धोती उतारकर इसके सीने की आग बुझाई थी।"
मोहन के चेहरे पर जो हुआ, वो मैंने देखा। जले हुए चेहरे पर भी एक पल के लिए कुछ टूटा — जैसे बीस साल की दीवार में पहली बार कोई दरार पड़ी हो। पर वो टिका नहीं। उसने होंठ कसे।
"बूढ़ा हो गया है कालू," उसने कहा। "बीस साल में यादें बदल जाती हैं।"
"यादें नहीं बदलतीं," कालू काका ने कहा। "बदनाम करने की आदत बदलती है।"
मैंने उस पल का फ़ायदा उठाया। एक कदम और — चरपाई की तरफ़। पर मोहन की नज़र मुझ पर थी। उसने अपना हाथ उठाया।
"एक कदम और," उसने कहा, "और मैं साँस गिनना बंद कर दूँगा।"
मैं ठिठक गया। माँ की छाती धीरे-धीरे उठ रही थी — इतनी धीमी कि मुझे देखने के लिए रुकना पड़ता था। गुड़िया की आँखें मुझ पर टिकी थीं, आँसू से भरी, और उसका हाथ अब भी मुँह पर था।
मीरा मेरे पीछे से आगे बढ़ी। उसने मेरा कंधा छुआ — हल्का, पर पक्का।
"मैं जानती हूँ ये क्या है," उसने धीरे से कहा, सिर्फ़ मेरे लिए। "ये ज़हर नहीं है। ये बेहोशी की दवा है। पर इतनी ज़्यादा मात्रा में कि साँस रुक जाए। मुझे उनके पास जाने दो।"
मोहन ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें मीरा पर ठंडी पड़ीं।
"तू वही लड़की है," उसने कहा। "अखाड़े वाले की बेटी। तेरे बाप ने भी मेरे साथ अच्छा नहीं किया था।"
"मेरे बाप ने आपके साथ क्या किया, वो मुझे नहीं पता," मीरा ने साफ़ आवाज़ में कहा। "पर मुझे ये पता है कि अगर ये बूढ़ी औरत अभी नहीं उठी, तो आप पर हत्या का इलज़ाम लगेगा। और हत्या के इलज़ाम में आपकी जली हुई सूरत किसी काम नहीं आएगी।"
मोहन की आँखें सिकुड़ीं। वो कुछ सोच रहा था — मैं उसके चेहरे पर देख सकता था। ठाकुर ने उसे ज़िंदा रखने को कहा था। शायद मरने को नहीं।
"मैं तेरे पास आ रही हूँ," मीरा ने कहा। "धीरे से। तेरे हाथ पर हाथ नहीं रखूँगी।"
वो एक कदम बढ़ी। मोहन का हाथ उठा रहा, पर वो रुका। मीरा ने दूसरा कदम बढ़ाया। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी हरी शीशी निकाली — अदरक-तुलसी वाली, जो उसने सुरंग में दिखाई थी। शीशी का ढक्कन खोलते ही हवा में तीखी गंध फैल गई।
"माँ जी," मीरा ने चरपाई के पास बैठकर कहा। उसकी आवाज़ अब नरम थी, जैसे कोई बीमार के सिरहाने बैठा हो। "सुन रही हैं? मैं मीरा हूँ। रणवीर सिंह की बेटी।"
माँ की पलकें हिलीं। मुश्किल से।
मीरा ने उनकी नाड़ी पकड़ी। उसकी उँगलियाँ माँ की कलाई पर टिकीं और उसका चेहरा सख़्त हो गया। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"नाड़ी बहुत धीमी है," उसने कहा। "पर चल रही है। इन्हें तुरंत हवा चाहिए। खिड़की खोलो — जल्दी।"
मैं पलटा। कोठे की दीवार पर एक छोटी खिड़की थी, लकड़ी के पुराने पल्ले वाली। मैं उसकी तरफ़ बढ़ा।
"नहीं!" मोहन चीखा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno