Spirit of a Fighter – Chapter 1076
"दयाराम," मैंने धीरे से दोहराया, जैसे नाम को ज़ुबान पर रखकर तौल रहा हो।
"हाँ," मोहन ने कहा। "और उसका बेटा जो पंचायत में था — वो भी उसी धंधे में है। बाप बीमार है अब, पर बेटा संभाल रहा है। और तेरी माँ को यहाँ लाने का हुक्म भी उसी ने दिया था।"
गुड़िया ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं।
"भैया," वो फुसफुसाई, "वो बूढ़ा जो पंचायत में रो रहा था? वही?"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो वो रो रहा था…" उसकी आवाज़ रुक गई।
"अपने बेटे के लिए," मैंने कहा। "अपने गुनाह के लिए नहीं।"
मोहन ने एक लंबी साँस ली और चौकी पर बैठ गया। उसकी आँखें अब थकी हुई थीं, बीस साल की थकान उनमें भर गई थी।
"अब तेरा फ़ैसला," उसने कहा। "मैंने तुझे सब बता दिया। अब तू क्या करेगा — मुझे मारेगा, या मुझे पकड़वाएगा, या मुझे साथ रखेगा?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका जला हुआ चेहरा, वो टाँका, वो छोटी आँख। और उसके पीछे, दीवार पर, चरपाई पर पड़ी मेरी माँ।
"तूने मेरे पिता को धोखा दिया," मैंने कहा।
"हाँ।"
"और तूने मेरी बहन को डराया।"
"हाँ।"
"और तूने मेरी माँ को ज़हर दिया।"
वो कुछ नहीं बोला। बस सिर झुका लिया।
मैंने उसकी कमीज़ का कॉलर पकड़ा और उसे खींचकर अपने पास लाया। उसका चेहरा मेरे चेहरे के करीब आ गया — जला हुआ, टाँके वाला, बूढ़ा।
"पर तूने आज मेरी बहन को हाथ नहीं लगाया," मैंने कहा। "और तूने माँ को मारने के लिए पूरी खुराक नहीं दी। और तूने मुझे वो नाम दिया जो बीस साल से किसी ने मुझे नहीं दिया।"
मैंने उसे छोड़ दिया। वो चौकी पर गिर गया, हाँफते हुए।
"तू मेरे साथ चलेगा," मैंने कहा। "अखाड़े तक। और वहाँ जो मैं कहूँगा, तू वो बोलेगा। सबके सामने।"
मोहन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी आ गया — एक आँख से, जो बची थी।
"तू मुझे माफ़ कर रहा है?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुझे माफ़ नहीं कर रहा। मैं तुझे इस्तेमाल कर रहा हूँ। क्योंकि तेरे पास वो नाम है जो मेरे पिता की मौत को सच बनाता है। और आज मैं उस सच को अखाड़े में बोलूँगा।"
मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में आँसू अब भी थे, पर उनमें कुछ और भी था — वो चमक जो मैंने उस दिन देखी थी जब उसने पहली बार मुझे अखाड़े की मिट्टी दी थी।
"भैया," उसने कहा, "मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"माँ भी चलेंगी।"
मैंने चरपाई की तरफ़ देखा। माँ की आँखें खुल रही थीं — धीरे-धीरे, जैसे पानी के नीचे से कोई ऊपर आ रहा हो। उनकी उँगलियाँ चादर पर हिलीं, और फिर उनके होंठ फड़के।
"वीर…"
मैं उनके पास झुक गया। उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे उनके होंठों के पास कान ले जाना पड़ा।
"वो काग़ज़," उन्होंने कहा, "जो तूने मेरी अलमारी में पाया था… उसके पीछे एक और लिखा है। पानी से लिखा है। गरम करने पर आता है।"
मेरी साँस रुक गई।
"माँ," मैंने कहा, "तूने ये पहले क्यों नहीं बताया?"
उनके होंठ मुस्कुराने की कोशिश कर गए, जैसे हल्की-सी हँसी।
"क्योंकि मैं डरती थी," उन्होंने कहा, "कि तू उसे पढ़कर उसी रास्ते पर निकल जाएगा जिस पर तेरे पिता निकले थे।"
मैं वहीं बैठ गया, चरपाई के पास, फर्श पर। मेरे घुटने काँप रहे थे और मेरी आँखें भर आई थीं।
"माँ," मैंने कहा, "आज मैं वही रास्ता चुन रहा हूँ जो पापा ने चुना था। पर मैं उस पर अकेला नहीं हूँ।"
उन्होंने मेरा सिर सहलाया। उनका हाथ अब भी ठंडा था, पर उसमें वो चीज़ थी जो चक्की पर बैठकर भी कभी नहीं गई थी।
"जा," उन्होंने कहा। "अखाड़े जा। और सबको बता।"
मैं उठा। मैंने मोहन का कंधा पकड़ा और उसे खींचकर खड़ा किया।
"चल," मैंने कहा।
"वीर," वो बोला, "एक बात।"
"क्या?"
उसने अपनी जेब से एक छोटी-सी लोहे की डिबिया निकाली। उसे खोला। उसमें एक सूखा हुआ पत्ता था — गहरा हरा, नसों वाला, जैसे कोई पीपल का पत्ता जो बहुत पुराना हो चुका हो।
"ये तेरे पिता का था," उसने कहा। "उन्होंने उस रात मुझे दिया था जब मैंने उन्हें बताया था कि मैंने पानी पीना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा था — जब तू बच जाए, तो ये पत्ता किसी ऐसे आदमी को देना जो मिट्टी से मोहब्बत करता हो।" उसने डिबिया मेरी हथेली पर रख दी। "बीस साल से मैं इसे अपनी जेब में रखे हुए हूँ। आज ये अपने हक़दार तक पहुँचा।"
मैंने डिबिया अपनी मुट्ठी में भींच ली। पत्ता सूखा था, पर उसमें एक हल्की गंध थी — गीली मिट्टी की, अखाड़े की लाल मिट्टी की।
मैंने गुड़िया का हाथ पकड़ा और मोहन का कंधा। और हम बाहर निकले।
बाहर उजाला हो रहा था। पूरब में आसमान फट रहा था, और उस फटन से एक पीली-लाल रेखा निकल रही थी। नहर का पानी उस रोशनी में ताँबे जैसा दिख रहा था।
कालू काका दरवाज़े के बाहर खड़े थे, और उनके साथ मीरा और टिंकू भी थे। मीरा के हाथ में मेरी माँ की हरी शीशी थी और टिंकू के हाथ में लड्डू की डिब्बी अब भी खुली थी।
"माँ ठीक है," मैंने कहा, किसी के पूछने से पहले। "गुड़िया ठीक है। और ये…" मैंने मोहन की तरफ़ देखा, "ये मेरे साथ अखाड़े चलेगा।"
मीरा ने मोहन को देखा। उसके चेहरे पर शक था, पर उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरी तरफ़ देखकर एक बार सिर हिलाया — जैसे कह रही हो, जो तूने चुना, ठीक है।
टिंकू ने लड्डू की डिब्बी आगे बढ़ाई।
"एक खा," उसने कहा। "तेरा चेहरा देखकर लगता है तूने पूरी रात कुछ नहीं खाया।"
मैंने लड्डू लिया और मुँह में रख लिया। मीठा था, और उसमें वो स्वाद था। मैंने चबाया और फिर अपने साथियों की तरफ़ देखा।
"अखाड़े चलो," मैंने कहा। "सूरज निकलते-निकलते वहाँ पहुँचना है।"
हम चले। नहर किनारे-किनारे, पगडंडी से, वही रास्ता जिससे कल रात आए थे। पर आज रास्ता अलग लग रहा था। कल रात मैं भाग रहा था, आज मैं जा रहा था।
रास्ते में मोहन ने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "वीर, एक बात और।"
"क्या?"
"ठाकुर ने मुझसे कहा था कि दयाराम के बेटे ने एक नया काम शुरू किया है। वो शीशियाँ शहर के अखाड़ों में नहीं भेज रहा। वो उन्हें सीधे भारत केसरी के मुकाबले में भेज रहा है।"
"भारत केसरी के मुकाबले?" मैं रुक गया। पगडंडी पर धूल उड़ रही थी और मेरे जूते उसमें धँस गए। "मतलब वो शीशियाँ उन पहलवानों को पिलाई जा रही हैं जो मुकाबले में उतरेंगे?"
मोहन ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में वो थकान थी जो बीस साल की चुप्पी से आती है।
"सोच। अगर मुकाबले के दिन सबसे ताक़तवर पहलवान अचानक बेहोश हो जाए, या उसकी साँस ही रुक जाए, तो कौन जीतेगा?"
"जिसकी शीशी नहीं पी।" मेरे मुँह से निकला।
"और वो कौन होगा?" मोहन ने मेरी तरफ़ देखा। "जिसका कोई नाम न हो। कोई चेहरा न हो। बस ठाकुर का आदमी।"
टिंकू ने लड्डू की डिब्बी बंद कर दी। उसका मुँह लटक गया था। "मतलब वो पूरा मुकाबला ही जाल है?"
कालू काका ने लाठी ज़मीन पर टेक दी। "बीस साल पहले भी ऐसा ही हुआ था," उन्होंने धीरे से कहा। "उस साल भी भवानी मुकाबले में उतरने वाले थे। और ठीक उसके पहले रात… वो बीमार पड़े।"
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनके होंठ काँप रहे थे, पर आँखें सूखी थीं — जैसे बहुत पहले रो चुके हों।
"तुम्हें पता था?" मैंने पूछा।
"शक था," उन्होंने कहा। "शक से आगे कभी नहीं बढ़ पाया। डर था कि बढ़ा तो अगली बारी मेरी होगी।"
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