Spirit of a Fighter1075 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1075

7 min read November 5, 2026

"नहीं पीते थे," उसने सिर हिलाया। "यही तो बात है। उन्होंने कहा — मोहन, ताकत पानी में नहीं, तेरे हाथों में है। और मैंने कहा — गुरुजी, मेरे हाथों में नहीं आती। मैं कमज़ोर हूँ। मैं हर मुकाबले में पिछड़ जाता हूँ। और उन्होंने मेरी छाती पर हाथ रखा और कहा — तेरी कमज़ोरी तेरी ताकत है। पर मैंने नहीं माना।"

वो चौकी पर फिर बैठ गया, पर इस बार उसकी आँखें चरपाई पर थीं — माँ पर।

"और फिर एक रात," उसने कहा, "एक आदमी अखाड़े में आया। पीली शीशी लेकर। उसने कहा — एक घूँट, और तू अपने गुरु से आगे निकल जाएगा। मैंने एक घूँट पी लिया।"

कमरे में सन्नाटा हो गया। माँ की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी — धीमी, रुकी हुई, पर चल रही थी।

"और उसके बाद," मोहन बोला, "मैंने पहली बार गुरुजी को हराया। अखाड़े में। सबके सामने। मैं दंग रह गया। मैंने सोचा — यही तो ताकत है। यही तो असली चीज़ है। पर अगले महीने मेरे हाथ काँपने लगे। पसीना बदबू मारने लगा। और एक दिन मैं आईने के सामने खड़ा था, और मेरी आँखों के नीचे काला घेरा था और मेरे बाल झड़ रहे थे — पच्चीस साल की उम्र में।"

उसने अपनी आवाज़ धीमी कर ली।

"मैं गुरुजी के पास गया। रोया। कहा — गुरुजी, मुझे बचाओ। और उन्होंने मुझे गोद में उठाया, जैसे बच्चे को उठाते हैं, और कहा — मोहन, मैं तुझे बचाऊँगा। पर तुझे उस आदमी का नाम बताना होगा जिसने तुझे ये पानी दिया।"

वो रुका। उसने अपने जले हुए गाल पर उँगली रखी।

"और मैंने नाम बता दिया।"

कमरे में हवा भारी हो गई।

"अगली रात," मोहन ने कहा, "मेरे गुरुजी उसी आदमी के आदमियों के हाथ लग गए। और मैं — मैं अखाड़े में सो रहा था। मुझे कुछ पता नहीं चला। सुबह उठा तो खबर आई कि भवानी सिंह मर गए। ज़हर से।"

उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ हिला।

"मैं उनकी लाश के पास गया। मैंने उनका हाथ पकड़ा। और उनका हाथ ठंडा था। और मैंने सोचा — ये मेरी वजह से है। मैंने नाम बताया, और उन्होंने मेरा गुरु मार दिया।"

"तो तूने…" मेरी आवाज़ रुक गई। "तूने उसके बाद क्या किया?"

"मैं भाग गया," उसने कहा। "डर के मारे।" उसने अपना जला हुआ चेहरा छुआ। "पर वो आदमी मेरे पीछे आया। और उसने मुझे जला दिया — मशाल से, इसी चेहरे पर। कहा — जा, और किसी को मत बता कि तूने मेरा नाम किसी को दिया था। और मैंने किसी को नहीं बताया। मैं बीस साल से किसी को नहीं बताया।"

"तो आज क्यों बता रहा है?" मैंने कहा।

वो मेरी तरफ़ देखने लगा। उसकी बड़ी आँख में कुछ बदला।

"क्योंकि आज वो आदमी मर रहा है," उसने कहा। "ठाकुर महेंद्र सिंह। और मरने से पहले वो मुझसे एक बात कह गया है जो मुझे नींद नहीं लेने दे रही।"

"क्या बात?"

मोहन ने मेरी माँ की तरफ़ देखा, फिर गुड़िया की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।

"उसने कहा — मोहन, तूने जिस आदमी का नाम बीस साल पहले मुझे दिया था, वो आज भी ज़िंदा है। और वो अब मेरे साथ नहीं है। वो अब तेरे साथ है।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने दीवार का सहारा लिया।

"क्या मतलब?" मेरी आवाज़ बाहर निकली, किसी और की आवाज़ जैसी। "किसका नाम? पापा को ज़हर किसने दिया, वो आदमी कौन था?"

मोहन ने अपनी कमीज़ के बटन बंद किए, एक-एक करके, बहुत धीरे।

"मैं तुझे बताता हूँ," उसने कहा, "पर पहले एक काम कर।"

"क्या?"

"तेरी बहन को देख।"

मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं बैठी थी, आँखें बंद, होंठ सिले हुए, हाथ मुँह पर। उसके कंधे अब भी काँप रहे थे।

"इसने डेढ़ घंटे से एक आवाज़ नहीं निकाली," मोहन ने कहा। "मैंने इसे डराया था। कहा था — अगर तूने आवाज़ निकाली, तो तेरी माँ की साँस रुक जाएगी। ये बच्ची डेढ़ घंटे से अपनी साँस भी नहीं छोड़ रही ठीक से।"

मेरा गला भर गया।

"तो अब कह," मैंने कहा। "कह दे कि वो डर खत्म है।"

मोहन ने गुड़िया की तरफ़ देखा।

"बेटा," उसने कहा, धीरे से, किसी और आवाज़ में — एक ऐसी आवाज़ जो शायद बीस साल पहले उसकी थी। "अब हाथ नीचे कर दे। तेरा भैया आ गया है।"

गुड़िया ने हाथ नीचे किए।

और फिर जो आवाज़ निकली, वो किसी बच्ची की नहीं थी। वो एक ऐसी चीख थी जो डेढ़ घंटे से दबी हुई थी, और अब फूट पड़ी थी।

"भैया!"

वो दौड़कर मेरी तरफ़ आई। मैंने घुटने टेके और उसे पकड़ लिया। वो मेरी गर्दन में लिपट गई, अपना चेहरा मेरे कंधे में दबा दिया, और फूट-फूटकर रोने लगी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था, और उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि लगा वो मुझे छोड़ेगी नहीं।

"भैया," वो रो रही थी, "मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने एक आवाज़ नहीं निकाली। मैं डर गई थी। वो कह रहा था कि अगर मैंने आवाज़ निकाली तो माँ की साँस रुक जाएगी।"

"तूने ठीक किया," मैंने उसके बालों में मुँह दबाकर कहा। "तूने बहुत अच्छा किया, गुड़िया। तू बहादुर है।"

"मैं डर गई थी," वो फिर बोली।

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "मैं भी डरा हुआ था।"

वो थोड़ी पीछे हटी और मेरा चेहरा देखा। उसकी नाक बह रही थी, आँखें लाल थीं, और माथे पर मिट्टी का निशान था।

"माँ," उसने कहा, और चरपाई की तरफ़ इशारा किया। "वो उन्हें उठा नहीं रहा। वो बस गिन रहा है।"

मैं उठा और चरपाई के पास गया। माँ का चेहरा पीला था, होंठ सूखे थे, और उनकी साँसें बहुत धीमी — कभी एक, कभी दो, फिर रुक जाती, फिर फिर शुरू। मैंने उनकी कलाई पकड़ी। नाड़ी धीमी थी, पर थी।

"तूने उन्हें क्या दिया?" मैंने मोहन की तरफ़ पलटकर पूछा।

"वही जो मुझे कभी दिया गया था," उसने कहा। "पर बहुत कम। मैंने सोचा — अगर तू आया, तो लड़ेगा। और अगर लड़ेगा, तो मुझे देखना है कि तू कैसे लड़ता है।"

"तो अब देख ले," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ में वो चीज़ आई जो मैंने कभी अपने अंदर नहीं सुनी थी।

मोहन मुस्कुराया। उसकी सिकुड़ी आँख उस मुस्कान में और छोटी हो गई।

"मैंने देख लिया," उसने कहा। "तू अंदर आया — अंधेरे में, गंध में, अपनी बहन को रोते देखकर भी तू भागा नहीं। तूने मुझे मारने की कोशिश नहीं की। तूने पहले अपनी बहन से बात की। तेरे पिता भी ऐसे ही थे।" उसने एक गहरी साँस ली। "और यही वजह है कि मैं तुझे वो नाम बताऊँगा।"

वो उठा और दीवार के पास रखी एक मटकी के पास गया। उसमें से उसने एक लोटा भरा और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"पहले तेरी माँ को पिला," उसने कहा। "ये बादाम के तेल में उबाला हुआ पानी है। इससे ज़हर का असर कम होता है। मैंने इसे खुद बनाया है। ज़हर देने वाले भी कभी-कभी दवा बनाना सीख जाते हैं।"

मैंने लोटा लिया और माँ के होंठों से लगाया। पहले तो कुछ नहीं गया, फिर उनका गला हिला और एक घूँट उतरा। फिर दूसरा।

"अब बता," मैंने कहा, लोटा चरपाई के पास रखकर। "पापा को ज़हर किसने दिया?"

मोहन मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा — एक ऐसा हाथ जिसकी उँगलियाँ जली हुई थीं और त्वचा सख़्त थी।

"उस रात मैंने ठाकुर को एक नाम दिया था," उसने कहा। "एक आदमी का नाम जिसने मुझे शीशी दी थी। और ठाकुर ने उसी नाम के आदमी से जाकर कहा — भवानी को मार डालो।"

"कौन था वो?"

"एक व्यापारी," मोहन ने कहा। "शहर का। शीशियाँ बनवाता था, अखाड़ों में पहुँचाता था। उसका नाम…"

वो रुका। उसने मेरी आँखों में देखा।

"उसका नाम दयाराम था।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। मेरे कानों में एक लंबी सीटी बजी। दयाराम। वो आदमी जिसके आँगन से मैं अभी निकला हूँ। जिसने मुझे सरेआम कहा था कि तू भवानी का बेटा है। जो पंचायत में बैठा था। जो मेरे सामने अपने बेटे का नाम लेकर फफक रहा था।

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