Spirit of a Fighter1074 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1074

7 min read November 5, 2026

एक।

दो।

तीन।

आवाज़ दरवाज़े के उस पार से आ रही थी, धीमी, रुकी हुई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी ही साँसों का हिसाब कर रहा हो। मैंने दोनों हाथों से लोहे का दरवाज़ा धक्का दिया। वो हिला, जंग खाई कुंडी से चरमराया, पर खुला नहीं।

"गुरुजी गिनती में माहिर हैं," शेराज़ ने पीछे से कहा। मशाल की लौ उसके चेहरे पर नाच रही थी। "हर साँस का हिसाब रखते हैं। किसी की कम हो गई तो वो अपनी गिनती में ही बता देंगे।"

मैंने पलटकर उसे देखा। नहर किनारे वाली वो मशाल अब भी उसके हाथ में जल रही थी, और उसकी लौ में मुझे अपनी माँ की चरपाई दिख रही थी — बस अनुमान में, पर दिख रही थी।

"चार," अंदर से आवाज़ आई। "पाँच।"

कालू काका मेरे पास आए, लालटेन ऊपर उठाई और दरवाज़े की कुंडी पर रोशनी डाली। उन्होंने बहुत देर तक देखा। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में लालटेन की रोशनी काँप रही थी।

"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "ये कुंडी बाहर से बंद नहीं है।"

"क्या मतलब?"

"देख, जंग कुंडी के उस किनारे पर ज़्यादा है जो अंदर की तरफ़ है। बाहर से तो कोई चाबी लगाई ही नहीं गई।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "ये दरवाज़ा अंदर से खुल रहा है, वीर। जो अंदर है, वो खुद इसे खोल सकता है। पर नहीं खोल रहा।"

"छह," अंदर से आवाज़ आई। "सात।"

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।

"वीर," वो फुसफुसाई, "ये गिनती… ये किसी की साँसें नहीं हैं। ये बहुत धीमी हैं। मेरी पढ़ाई में पढ़ा था — जब कोई बहुत कमज़ोर होता है, तो साँसें ऐसी ही चलती हैं।"

मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई। मैंने कंधा दरवाज़े पर लगाया और पूरा ज़ोर लगा दिया। जंग चरमराई, कुंडी उखड़ने को हुई, और दरवाज़ा एक हाथ पीछे हटा।

"आठ," आवाज़ आई। फिर रुकी। फिर बोली, "नौ।"

दरवाज़े से अंदर अंधेरा झाँका। और उस अंधेरे के साथ एक गंध आई — इतनी तेज़ कि मेरे नथुनों में चुभ गई। बादाम का तेल। इतना ज़्यादा कि लगा किसी ने पूरी बोतल फर्श पर उँडेल दी हो।

"मैं जा रहा हूँ अंदर," मैंने कहा।

"तो जा," शेराज़ ने कहा। "पर याद रख — गुरुजी बोलने से पहले नहीं मारते। और उन्होंने तुझसे बात करनी है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मशाल की लौ में उसका लंगड़ा पैर मिट्टी पर टिका था और उसकी आँखों में कोई डर नहीं था — बस वो अजीब ठंडक जो मैंने पहले भी देखी थी।

"तू अंदर नहीं आएगा?" मैंने पूछा।

"मेरा काम बाहर है," उसने कहा। "गुरुजी ने कहा था — जब ये आए, तो दरवाज़ा दिखा देना। बाकी वो खुद कर लेंगे।"

मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उन्होंने लालटेन मुझे थमाई और धीरे से कहा, "मैं साथ हूँ।"

"नहीं," मैंने कहा। "आप बाहर रहिए। अगर दरवाज़ा बंद हो जाए, तो आप ही खोलेंगे।"

कालू काका ने कुछ कहना चाहा, पर फिर चुप हो गए। उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया और पीछे हट गए।

मैंने दरवाज़ा पूरा धक्का दिया। वो खुला, और मैं अंदर घुसा।

अंदर अंधेरा था, पर मेरी आँखें उससे पहले ही आदी हो चुकी थीं। दीवारों पर सीलन थी, फर्श पर पुरानी राख थी, और हवा में वो बादाम के तेल की गंध इतनी भारी थी कि मेरा सिर चकराने लगा। मैंने लालटेन ऊपर उठाई।

कमरे के बीचोंबीच एक चरपाई रखी थी। उस पर माँ लेटी थी। बेहोश। उनका मुँह खुला था, साँस धीमी, बस होंठ काँप रहे थे। उनके बाल बिखरे थे और माथे पर हल्दी का टीका अब भी लगा था — थोड़ा उतरा हुआ, पर लगा हुआ।

चरपाई के पास एक चौकी थी। उस पर बैठा एक बूढ़ा आदमी अपनी उँगली से हवा में गिन रहा था — एक, दो, तीन, चार — जैसे कोई बच्चा पहाड़ा याद कर रहा हो।

और कोने में, दीवार से चिपकी, गुड़िया बैठी थी।

उसके घुटने ठुड्डी से चिपके थे, दोनों चोटियाँ खुल गई थीं और आँखें — मेरी छोटी बहन की आँखें — मुझे देख रही थीं। उसकी आँखों से आँसू लगातार गिर रहे थे, गालों पर चमकते हुए सीधे गर्दन तक।

वो रो रही थी, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। होंठ हिल रहे थे, गला फूल रहा था, सीना ऊपर-नीचे हो रहा था — पर आवाज़ कोई नहीं। वो अपने मुँह पर दोनों हाथ रखे हुए थी, इतनी ज़ोर से दबाए हुए कि उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।

मेरे दिल में एक ऐसी चोट पड़ी जो मैंने उस दिन महसूस की थी जब माँ ने बताया था कि पापा नहीं रहे। मेरा पूरा शरीर जम गया, और मैं एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया।

"रुक जा," बूढ़े ने कहा। उसकी आवाज़ पतली थी, बसी हुई, जैसे किसी पुरानी नली से हवा निकल रही हो। "अगला कदम बढ़ाया, तो मैं रुक जाऊँगा। और फिर साँस गिनने का काम कोई नहीं करेगा।"

"तू कौन है?" मेरी आवाज़ फटी हुई निकली।

"बैठ जा," उसने कहा। "मैं तुझे बता रहा हूँ।"

"मैं नहीं बैठूँगा।"

"तो खड़ा रह। पर बोलना मेरी बात सुनकर।"

मैं रुका। मेरे पैर जमीन पर टिके थे, पर हर नस में एक झुनझुनी दौड़ रही थी। मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा। उसकी आँखें मुझ पर टिकी थीं, और उसके हाथ अब भी उसके मुँह पर थे। मैंने धीरे से, बहुत धीरे से कहा, इतना धीमे से कि बूढ़ा भी न सुने:

"मैं यहाँ हूँ, गुड़िया।"

उसके होंठ काँपे। आँसू और तेज़ बहे। पर उसने हाथ नहीं हटाए। बस सिर हिलाया — एक बार, बहुत छोटा-सा — जैसे कह रही हो, मुझे पता है भैया, तू आ गया, अब मैं डरती नहीं। और फिर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और ज़ोर से साँस लेने की कोशिश की, और उसके कंधे हिलने लगे।

बूढ़े ने अपनी उँगली नीचे की और चरपाई की तरफ़ इशारा किया।

"तेरी माँ की साँसें गिन रहा था। अभी एक सौ बीस चलीं। अच्छा है — वो ज़िंदा है। पर वो दवा का असर है। मैंने उसे बहुत कम दी। पर्याप्त है। मैं बीस साल से इस काम में हूँ, वीर सिंह। मुझे पता है कितनी देनी है कि आदमी मरे नहीं, पर जागे भी नहीं।"

वो उठा। उसके घुटने चटकने की आवाज़ आई। वो खड़ा हुआ, और लालटेन की रोशनी में मुझे उसका चेहरा पूरा दिखा।

आधा चेहरा जला हुआ था। खाल सिकुड़ी हुई, चमकदार, और उस पर एक टाँका — काला, मोटा, गाल से कान तक खींचा हुआ। और उसकी एक आँख छोटी थी, सिकुड़ी हुई, जैसे किसी ने उसे आधा बंद करके सिल दिया हो। दूसरी आँख — बड़ी, काली, और इतनी शांत कि उसे देखकर मेरे अंदर कुछ ठंडा उतर गया।

"नाम तो सुन ही चुका है," उसने कहा। "पर सुन ले फिर से। मोहन।"

उसने अपनी कमीज़ का कॉलर खोला।

उसकी छाती पर एक निशान था। पुराना, सफ़ेद, गोल — जैसे कभी कोई सिक्का जलाकर वहाँ दबा दिया गया हो। और उसके नीचे, थोड़ा और नीचे, तीन सीधी लकीरें — किसी उँगली के नाखूनों के निशान, जो अब तक मांस में धँसे दिख रहे थे।

"ये निशान किसने बनाए, जानता है?" उसने पूछा।

मैंने नहीं कहा।

"तेरे पिता ने। भवानी सिंह ने।" उसने उँगली उस जले हुए निशान पर रखी। "यहाँ, इसी सीने पर, उन्होंने अपना हाथ रखा था और कहा था — मोहन, तू मेरा सबसे बड़ा शिष्य है। और मैं उस दिन उनका सबसे बड़ा शिष्य था, वीर। सबसे बड़ा। सबसे तेज़। सबसे वफ़ादार।"

उसने कमीज़ बंद नहीं की। वो मेरे सामने खड़ा रहा, सीना खुला, जैसे दिखाना चाहता हो कि मेरे पास जो सबूत है, वो मेरे शरीर पर ही लिखा है।

"तेरे पिता ने मुझे ये दिया," उसने कहा। "जब मैंने उनसे कहा कि मैं भी ताकत बढ़ाना चाहता हूँ, वैसे ही जैसे वो बढ़ाते थे।"

"तेरे पिता पानी नहीं पीते थे," मैंने कहा। आवाज़ मेरी कड़ी थी।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho