Spirit of a Fighter – Chapter 1073
"माफ़ कर दो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ किसी और आदमी की थी। "मैंने… मैंने शुरू में नहीं चाहा था।" वो साँस नहीं ले पा रहा था। "मैं सिर्फ़ अपने पिता की नज़र में बड़ा होना चाहता था। वो हमेशा कहते थे कि मैं भवानी के सामने कुछ नहीं हूँ। मैंने सोचा कि अगर मैं अखाड़ा अपने हाथ में ले लूँ, तो वो मुझे देखेंगे।"
उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था — असली पानी, वो पानी जो बीस साल की आग से निकलता है।
"पर वो कभी नहीं देखा। वो दो साल पहले मरे, और मरते वक़्त भी उन्होंने मेरा नाम नहीं लिया। उन्होंने भवानी का नाम लिया।"
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ भी नहीं था — न गुस्सा, न तरस। सिर्फ़ एक लंबी थकान।
"महेंद्र," उन्होंने कहा, "तेरे पिता ने भवानी का नाम इसलिए लिया, क्योंकि भवानी ने उन्हें बचाया था। उस रात जब तूने पहली शीशी भवानी को दी, तेरे पिता वहीं थे। उन्होंने देखा कि तू क्या कर रहा है। और वो चुप रहे। तेरे पिता भी मोहन थे, महेंद्र।"
ठाकुर की आँखें फैल गईं। वो कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
तभी चंदा आगे आई। वो धीरे-धीरे चल रही थी, अपनी डायरी छाती से लगाए। उसने अपने पिता के सामने घुटने टेके और उनके हाथ अपने हाथों में लिए।
"पापा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि आँगन में सबने सुना। "मैं आपकी बेटी हूँ। आपके खून की हूँ। पर आज मैं सच की बेटी बनूँगी।"
ठाकुर ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर कुछ टूटा। उसने अपना हाथ बढ़ाया और चंदा के सिर पर रखा।
"तू…" उसकी आवाज़ रुक गई। "तू मेरी बेटी है। तू मेरी नहीं होनी चाहिए थी। मैंने तेरी माँ को…" वो रोने लगा। सच में रोया — वो रोना जो आदमी तब रोता है जब उसके अंदर का आदमी खत्म हो जाता है।
चंदा ने उसे गले लगा लिया। उसकी डायरी ज़मीन पर गिरी, पर किसी ने उसे उठाया नहीं। आँगन में सब चुप थे। कुछ औरतें रो रही थीं। दयाराम अपने बेटे का नाम लेकर बड़बड़ा रहा था।
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए। उनके हाथ में हथकड़ी थी।
"महेंद्र सिंह," उन्होंने कहा, "तुम पर ज़हर देने, जाली काग़ज़ बनवाने, और बीस साल की साज़िश का इल्ज़ाम है। तुम गिरफ़्तार हो।"
ठाकुर ने चंदा को धीरे से छोड़ा। उसने अपने हाथ आगे किए। हथकड़ी की आवाज़ आई — टक। और फिर टक।
जब उन्हें खींचकर ले जाया जा रहा था, तो उसने एक बार पलटकर देखा। उसकी नज़र चंदा पर पड़ी, फिर रणवीर सिंह पर, फिर मेरी तरफ़।
"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास लौट आई थी जो भैरव की थी। "तू जीतेगा। पर जान ले — मोहन अभी खत्म नहीं हुआ। वो बाहर है। और वो तुझे ऐसे ही नहीं छोड़ेगा।"
फिर उसे सिपाही ले गए।
आँगन में सन्नाटा था। मशालें अब भी जल रही थीं और उनकी लौ धीरे-धीरे कम हो रही थी।
मैं बाहर निकला। रात का आसमान साफ़ था, तारे दिख रहे थे, और हवा में नहर की गंध थी। मैंने आसमान की तरफ़ देखा और गहरी साँस ली। मेरे हाथ काँप रहे थे। मेरे पैर थक गए थे। मेरे सिर में दर्द था।
मुझे माँ की बात याद आई — "आज बोल दिया। अब तेरी बारी है।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई।
"भाई!"
मैं पलटा। टिंकू दौड़कर आ रहा था, उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो किसी भी मुश्किल के बाद आती है।
"अभी तो मुकाबला बाकी है!" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो जोश था जो सिर्फ़ टिंकू में होता है। "भारत केसरी का मैदान खाली पड़ा है और पूरा शहर तेरा इंतज़ार कर रहा है!"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया। मिठाई की डिब्बी उसके हाथ में हिल रही थी, वो खुद हाँफ रहा था — पता नहीं कितनी दूर से दौड़कर आया था।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू अंदर क्यों नहीं आया? सब कुछ तेरे सामने हो रहा था।"
"मैं अंदर था," उसने डिब्बी मेरे हाथ में थमाई। "पीछे, दीवार के पास। पर भाई, जब ठाकुर ने वो बात कही — कि मोहन बाहर है — तब मैं बाहर निकल आया। मुझे डर लगा।"
"डर?"
"ये नहीं कि मोहन कुछ करेगा।" उसने अपना गला साफ़ किया। "ये कि तू सब जीतकर भी अखाड़ा छोड़ देगा। क्योंकि तेरी आँखों में वो बात थी जो मेरे पिता की आँखों में थी — जब उन्होंने हल छोड़ दिया था।"
मेरे हाथ में डिब्बी भारी लगने लगी। टिंकू कभी ऐसी बातें नहीं करता। वो हँसाता है, चिढ़ाता है, मेरी जेब से पैसे चुराकर मिठाई खरीद लाता है। पर आज उसकी आवाज़ में कुछ और था।
"तेरे पिता ने हल क्यों छोड़ा था?" मैंने पूछा।
"क्योंकि एक बार उन्होंने मुझसे कहा था — बेटा, जब खेत सूख जाए, तो हल अच्छा नहीं लगता। आदमी को लगता है कि हल ही बेकार है।" उसने मेरी कलाई पकड़ी। "पर भाई, तेरी मिट्टी सूखी नहीं है। अभी तो तूने उसमें बीज बोया है।"
अंदर से आवाज़ें आ रही थीं — कमला देवी किसी को डाँट रही थीं, दयाराम अपने बेटे का नाम लेकर फिर बड़बड़ा रहा था। मशालों की रोशनी दरवाज़े से बाहर आँगन में फैल रही थी।
"भारत केसरी," मैंने धीरे से कहा। "टिंकू, मैं अभी ठाकुर के आँगन से निकला हूँ। मेरे पैर काँप रहे हैं। मेरी कमर में वो दर्द लौट आया है जो अखाड़े में गिरने से होता था। और तू मुझे मुकाबले की बात सुना रहा है?"
"हाँ," वो बिलकुल सीधा बोला। "क्योंकि अगर तू आज रुक गया, तो कल कोई और खड़ा होगा — और वो ठाकुर का आदमी होगा।"
मैं चुप हो गया। उसकी बात में वो सच था जो मुझे अंदर से चुभ रहा था।
तभी दरवाज़े पर साया पड़ा। रणवीर सिंह खुद आ रहे थे — एक हाथ कमला देवी के कंधे पर, दूसरा लाठी पर। उन्होंने मेरे पास आकर रुककर मेरा चेहरा देखा।
"मैंने सुना," उन्होंने कहा। "टिंकू ठीक कह रहा है। पर एक बात मैं भी कहूँ?" उन्होंने लाठी ज़मीन पर टिकाई। "मुकाबला जीतने के बाद तेरे पास क्या रहेगा, वीर? ये सोच। क्योंकि ठाकुर ने जो बीज बोए, वो एक मुकाबले से नहीं उखड़ेंगे।"
"तो क्या करूँ?"
"जो तूने आज किया," उन्होंने कहा। "सच बोल। और अब सबके सामने बोल — अखाड़े में, मिट्टी पर, उसी जगह से जहाँ से भवानी ने शुरू किया था।"
टिंकू ने डिब्बी खोली। अंदर लड्डू थे — गरम, घी की गंध वाले। उसने एक मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"खा," उसने कहा। "तेरी माँ ने भेजे हैं। उसने कहा — बोल देना कि आज मेरा बेटा लड़ा है, अब कल लड़ेगा।"
मैंने लड्डू हाथ में लिया। मेरी आँखें भर आईं, पर मैंने मुँह में रख लिया। मीठा था — और उसमें वो स्वाद था जो सिर्फ़ माँ के हाथ में होता है।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। तारे अब भी थे। मेरे हाथ अब भी काँप रहे थे, पर कुछ कम।
"टिंकू," मैंने कहा, "कल सुबह अखाड़े में। सबको बुला ले।"
उसका चेहरा खिल गया।
"पर एक बात," मैंने उसकी तरफ़ उँगली उठाई। "अगर मैं जीता, तो मिठाई तेरी जेब से।"
"और अगर हारा?"
"तो भी तेरी जेब से," मैं हँसा। "क्योंकि तूने मुझे ये सब याद दिलाया।"
टिंकू ने मेरी पीठ थपथपाई और दौड़कर अंदर चला गया — शायद सबको खबर देने। रणवीर सिंह मुस्कुराए, कमला देवी ने मेरे सिर पर हाथ रखा और कुछ नहीं कहा।
मैं वहीं खड़ा रहा, आसमान देखता हुआ। ठाकुर की आख़िरी बात मेरे कानों में गूँज रही थी — "मोहन अभी खत्म नहीं हुआ।"
पर आज रात मैं उससे नहीं डरूँगा। आज रात मैं सिर्फ़ ये याद रखूँगा कि एक लड़की ने अपने पिता से कहा था — मैं सच की बेटी बनूँगी।
और कल, मैं उस सच का बेटा बनूँगा।
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