Spirit of a Fighter – Chapter 1070
"तुम्हारा हाथ," उसने कहा, और मेरी कलाई की तरफ़ इशारा किया।
मैंने देखा। ठाकुर की कलाई पकड़ते वक़्त मेरी हथेली में उसकी अँगूठी का निशान छूट गया था। खून की एक पतली लकीर मेरी उँगली से बह रही थी। मुझे पता ही नहीं चला।
मीरा ने अपना बैग खोला और वही हरी शीशी निकाली। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मरहम लगाया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत। मैंने उसके हाथ से नज़र नहीं हटाई।
"तुम्हें बुरी आदत है," उसने धीरे से कहा, बिना ऊपर देखे। "हर बार अपना हाथ बीच में डाल देते हो।"
"और तुम्हें?" मैंने कहा। "हर बार मरहम लेकर पहुँच जाती हो।"
उसने सिर उठाया। हम दोनों हँसे। हँसी में थोड़ा पानी भी था, पर हँसी थी।
पीछे भीड़ छँटने लगी। लोग धीरे-धीरे पास आने लगे — पहले डर से, फिर हिम्मत करके। रामू और बैजू दौड़कर आए और रणवीर सिंह की व्हीलचेयर ले आए, जो पीछे किसी के सहारे खड़ी थी। रणवीर सिंह के हाथ मेरी तरफ़ बढ़े थे, और उनकी आँखों में वो गुस्सा था जो बीस साल से सुलग रहा था — पर अब उसमें एक चीज़ और थी। राहत।
"तूने कर दिया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "भवानी, तेरे बेटे ने कर दिया।"
देवेंद्र ने अपना सिर उठाया। उसने पहली बार आँगन के बाहर देखा, जैसे बीस साल के अंधेरे से बाहर आ रहा हो।
"मुझे भी गवाही देनी है," उसने कहा। "मैंने अपनी आँखों से देखा है। मैं उन्नीस साल… नहीं, बीस साल से इस कमरे में बंद था। मैं बताऊँगा कि उसने मुझे क्यों बंद किया।"
शर्मा ने ठाकुर को धकेला। ठाकुर ने एक कदम बढ़ाया, फिर रुक गया। वो पलटा और उसने एक बार पूरे आँगन को देखा — जलती मशालें, खड़े लोग, और उसकी बेटी जो अपनी डायरी छाती से लगाए खड़ी थी।
उसके होठों पर कुछ आया। मुझे लगा वो कोई धमकी देगा। पर वो बोला —
"तुम सब मुझे बाद में याद करोगे। जिस दिन तुम्हें मेरी ज़रूरत होगी, उस दिन मैं नहीं मिलूँगा।"
कोई नहीं बोला। कोई नहीं हँसा। शर्मा उसे ले गए।
और जैसे ही वो फाटक पार कर रहा था, बाहर अंधेरे में कुछ हिला।
मैंने उस तरफ़ देखा। मशालों की रोशनी फाटक तक नहीं पहुँच रही थी। पर मेरी नाक ने कुछ पकड़ा — कपूर, बादाम का तेल, और… गायब होती हुई स्याही की गंध। वही स्याही जो वारंट पर थी। जो कचहरी के बाहर बिकती है।
मेरी साँस रुक गई।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा। "वो अकेला नहीं आया था।"
"क्या मतलब?"
"काग़ज़ जाली है," मैंने कहा। "पर जिसने इसे बनाया, वो अभी भी बाहर है। ठाकुर तो सिर्फ़ हाथ था। असली सिर वहीं खड़ा है।"
मैं फाटक की तरफ़ बढ़ा। मेरे पीछे कालू काका की आवाज़ आई — "बेटा, रुक!"
पर मैं रुक नहीं सका।
फाटक के पार अंधेरा था। एक पेड़ था, और उसके नीचे ज़मीन पर कुछ पड़ा था। मैंने झुककर उसे उठाया।
एक पीली शीशी। खाली। और उसके अंदर से एक काग़ज़ का टुकड़ा निकला, जिस पर स्याही अभी भी गीली थी।
उस पर चार शब्द लिखे थे।
"अगली बार भवानी का बेटा नहीं… उसका बेटा।"
मैंने शीशी पलटी। उसके पेंदे पर वही निशान था जो चाँदी की अँगूठी पर — बाहरी पानी वाले आदमी का निशान। पर इस बार उसके नीचे एक और नाम खुदा था, छोटे अक्षरों में, जो अभी-अभी बना था।
मैंने उसे पढ़ा और मेरा खून जम गया।
"मोहन।"
मैं पलटा। मेरे पीछे मीरा खड़ी थी, और उसके पीछे आँगन की मशालें, और मशालों के बीच मेरी माँ — जो अपने आँचल से गुड़िया का चेहरा पोंछ रही थी।
"वीर?" मीरा ने कहा। "क्या हुआ?"
मैंने शीशी उसकी तरफ़ बढ़ाई।
"कालू काका ने कहा था," मैंने धीरे से कहा, "कि भवानी की डायरी में मोहन का नाम था। जिसका पिता की जान बचाई थी।"
"हाँ।"
"तो मोहन कौन है, मीरा?"
मीरा ने शीशी पकड़ी। उसके हाथ काँप रहे थे।
"वो… वो वही है जिसे हम बीस साल से ढूँढ रहे हैं," उसने कहा। "जो ठाकुर के पीछे खड़ा था। जिसने सारे काग़ज़ बनाए। जिसने भवानी को मारा।"
मैंने पीछे आँगन की तरफ़ देखा। माँ अब भी मशालों के बीच खड़ी थी। उसके चेहरे पर वो चमक जो अभी-अभी आई थी, अब किसी और चीज़ में बदल रही थी।
मैंने शीशी मुट्ठी में कस ली।
"तो मोहन ज़िंदा है," मैंने कहा। "और वो हमारे बीच में है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो मेरी आँखों में भी था — कौन?
और तभी पीछे, आँगन के कोने में, खड़े मुंशीजी ने अचानक अपना चश्मा उतारा और उसे पोंछने लगे। उनके हाथ पहले काँप रहे थे, पर अब वो स्थिर थे। बहुत स्थिर।
कालू काका ने उन्हें देखा। उनकी आँखें सिकुड़ीं। उन्होंने धीरे से, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सका, कहा —
"बेटा… मुंशीजी का असली नाम क्या है?"
मेरे हाथ से शीशी फिसल गई।
॥
शीशी मेरे हाथ से फिसलकर मिट्टी में गिरी और लुढ़कती हुई मीरा के पैरों तक गई। मैंने उसे उठाने की कोशिश नहीं की। मेरी आँखें मुंशीजी पर टिकी थीं — वो अब भी अपना चश्मा पोंछ रहे थे, बहुत आराम से, जैसे किसी ने उनसे पूछा हो कि आज मौसम कैसा है।
"कालू काका," मैंने बिना उनसे नज़र हटाए कहा, "आपने क्या कहा?"
कालू काका मेरे पास आए। उनकी लाठी मिट्टी में इस तरह धँसी जैसे उनके पैर कमज़ोर पड़ गए हों।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं तीस साल से इस अखाड़े में झाड़ू लगा रहा हूँ। हर आदमी की परछाई मैंने देखी है। पर मुंशीजी की परछाई कभी नहीं देखी।"
"क्या मतलब?"
"जब सूरज पश्चिम में होता है, तो सबकी परछाई पूरब में पड़ती है। पर मुंशीजी की —" उन्होंने लाठी से आँगन की मिट्टी पर एक लकीर खींची — "उनकी परछाई कभी यहाँ नहीं दिखी। हमेशा उनके पीछे, दीवार में मिल जाती है।"
मुझे कुछ समझ नहीं आया। पर मीरा ने शीशी उठाते हुए कहा, "कालू काका, ये परछाई की बात नहीं है। आपको कुछ और पता है।"
कालू काका ने आँगन के कोने में खड़े मुंशीजी की तरफ़ देखा। मुंशीजी ने चश्मा पहन लिया था और अब वो अपनी फ़ाइलें समेट रहे थे, बिलकुल स्थिर हाथों से, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"बीस साल पहले," कालू काका ने कहा, "जिस रात भवानी मरे, उस रात मैंने तहखाने की सीढ़ियों पर एक आदमी को बैठा देखा था। वो रो रहा था। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा, पर उसके हाथ में एक काग़ज़ था और वो काग़ज़ जलाने की कोशिश कर रहा था। आग नहीं पकड़ रही थी।"
"और?"
"और वो आदमी बोल रहा था — बार-बार एक ही बात। 'मैंने तो सिर्फ़ उसका हिसाब रखा था। मैंने तो सिर्फ़ काग़ज़ लिखे।'"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
"मुंशीजी," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर वो रुके, पर पलटे नहीं। "आप बीस साल से अखाड़े का हिसाब रख रहे हैं। हर मौत का काग़ज़ आपने लिखा। हर पहलवान का नाम आपने दर्ज किया।"
"मेरा काम यही है, बेटा।" उनकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी। "हिसाब रखना।"
"तो अब हिसाब खोलिए।"
मैंने हाथ बढ़ाया। पर मुंशीजी ने अपनी फ़ाइलें छाती से लगाईं और पीछे हटे।
तभी आँगन में एक और आवाज़ आई — कमज़ोर, पर साफ़।
"मुंशीजी, आप रुकिए।"
ये रणवीर सिंह थे। वो अपनी व्हीलचेयर में बैठे थे, पर उनका शरीर आगे झुका हुआ था, दोनों हाथ आर्मरेस्ट पर जमे हुए, और उनकी आँखों में वो आग जल रही थी जो मैंने पहली बार देखी।
"बीस साल मैंने आपको अपने हिसाब का रखवाला समझा," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी। "बीस साल मैंने आपको अपना आदमी समझा।"
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