Spirit of a Fighter – Chapter 1068
मैंने चंदा की तरफ़ देखा। उसने अपना चेहरा नीचे कर लिया था। पंद्रह साल की उम्र में कोई लड़की ऐसे हिसाब नहीं रखती। मैंने उससे पूछा, "तुमने ये सब क्यों किया? तुम तो उनकी बेटी हो। तुम्हें सब कुछ मिल सकता था।"
चंदा ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में सूखा गुस्सा था।
"मेरी माँ मरी," उसने कहा। "बीस साल पहले। किसी ने उसे ज़हर दिया था और सबने कहा कि वो बीमारी थी। मैं तब आठ साल की थी। मैंने अपनी माँ को खून उलटते देखा था। और मेरे पिता उसी रात भैरव के साथ बैठे थे, हिसाब लगा रहे थे कि उसकी मौत से कितना पैसा बचेगा।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया।
"तो तुम बीस साल से…"
"मैं बीस साल से उनके काग़ज़ात लिख रही हूँ," चंदा ने कहा। "हर एक कीमत। हर एक नाम। मुझे पता था कि एक दिन कोई आएगा जो इसे पढ़ेगा। और उस दिन मैं अपनी माँ का नाम उसी काग़ज़ पर लिखूँगी।"
मैं चुप खड़ा रहा। धुएँ के बीच से माँ की आवाज़ आई, बहुत धीमी, पर साफ़।
"तू ठीक कर रही है, बेटी," माँ ने कहा। "हिसाब ही तो एक दिन सच बन जाता है।"
चंदा ने माँ की तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं। पहली बार।
तभी बाहर से ज़ोर की आवाज़ आई — घोड़ों की टापें और लाठियों की खनक। मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा और मेरी आँखों के सामने अंधेरा-सा छा गया।
देवेंद्र घबराकर अंदर आया। उसका चेहरा पसीने से भीगा था और हाथ में टूटी मशाल थी।
"वो लौट आया है," उसने कहा, साँस नहीं आ रही थी। "ठाकुर, अपने सारे आदमियों के साथ। और इस बार उसके हाथ में पुलिस का वारंट है।"
॥
"वो लौट आया है," देवेंद्र ने कहा था, और उसकी आवाज़ में जो काँप था वो मेरी हड्डियों तक उतर गया।
मैंने चंदा की तरफ़ देखा। उसके हाथ से बर्तन तो गिर चुका था, पर अब उसकी उँगलियाँ अपनी डायरी पर कसकर जम गई थीं। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। बाहर घोड़ों की टापें पत्थर पर ऐसी बज रही थीं जैसे कोई हथौड़ा ठोंक रहा हो।
देवेंद्र ने टूटी मशाल ज़मीन पर पटक दी।
"पचास आदमी हैं," उसने कहा। "और वो इंस्पेक्टर भी साथ है। शर्मा। मैंने उसे खुद देखा, गाड़ी से उतरते हुए।"
मेरा पेट कड़ा हो गया। इंस्पेक्टर शर्मा। जिसने तहखाने में मेरी कलाई पकड़ी थी, जिसने सबूत थैली में डालने को कहा था, जो शेराज़ को बाँधकर ले गया था। वो अगर ठाकुर के साथ है, तो मतलब वो पूरे वक़्त ठाकुर का आदमी था।
टिंकू मेरे पास आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था, पर हाथ में उसने मिठाई की डिब्बी कसकर पकड़ रखी थी, जैसे वो ही उसका हथियार हो।
"भाई," उसने धीरे से कहा। "ये बात ठीक नहीं लग रही। पुलिस के साथ आया है, यानी काग़ज़ पक्का होगा।"
"काग़ज़ पक्का नहीं होता," मैंने कहा। "जो लिखता है, वो पक्का होता है।"
कमला देवी मेरे पीछे खड़ी थीं। उन्होंने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और मुंशीजी की तरफ़ देखा, जो दरवाज़े के पास सहमे खड़े थे।
"मुंशीजी," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जिससे कमरे का हवा तक रुक गया। "अब भी वक़्त है। तुम इनके साथ जाओगे, या सच के साथ?"
मुंशीजी ने अपना चश्मा उतारा। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने कुछ कहने की कोशिश की, पर गला सूख गया। फिर उन्होंने चश्मा अपनी कमीज़ में पोंछा और सिर नीचा कर लिया।
"मैं… मैं बीस साल उनके हिसाब लिखता रहा," उन्होंने कहा। "और हर बार सोचता था कि अगली बार मना कर दूँगा। पर अगली बार कभी नहीं आई।"
"तो आज आई है," कमला देवी ने कहा।
बाहर आवाज़ और तेज़ हो गई। किसी ने दरवाज़े पर ज़ोर से हाथ मारा, तीन बार, ऐसे जैसे कोई बंद कमरे में घुसने से पहले गिनती कर रहा हो।
फिर वो आवाज़ आई। ठाकुर की आवाज़। मीठी, ठंडी, जैसे गुड़ के लड्डू में काँच की चीनी मिली हो।
"वीर सिंह! भवानी के बेटे! दरवाज़ा खोलो। आज कोई लड़ाई नहीं होगी। आज सिर्फ़ काग़ज़ है। और काग़ज़ से तो तुम लड़ नहीं सकते, है ना?"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"दरवाज़ा मत खोलो," उसने कहा। "अंदर रहो, सबूत संभालो।"
"नहीं," मैंने कहा। "अगर हम दरवाज़ा नहीं खोलेंगे, तो वो इसे तोड़ेगा और सबको दिखाएगा कि हम डर गए। फिर जो अंदर है, वो भी झूठ लगेगा।"
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मेरे पीछे कालू काका की आवाज़ आई — "बेटा, अंधेरे में मत जा।"
"काका," मैंने पलटकर कहा। "मैं अंधेरे में नहीं जा रहा। मैं अपने घर के दरवाज़े पर जा रहा हूँ।"
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर आँगन में मशालों की पूरी कतार थी। पचास से ज़्यादा आदमी, हाथों में लाठियाँ, मुँह पर वो चुप्पी जो सिर्फ़ तब आती है जब किसी ने पैसे लिए हों। और उनके बीच में, दो मशालों के बीच खड़ा ठाकुर महेंद्र सिंह — लाल शेरवानी, सिर पर साफ़ा, हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ जिस पर सरकारी मुहर लगी थी।
उसके ठीक पीछे इंस्पेक्टर शर्मा खड़े थे। उनका चेहरा उतरा हुआ था, आँखें ज़मीन पर। उन्होंने मुझसे नज़र मिलाने की कोशिश भी नहीं की।
"इंस्पेक्टर साहब," मैंने कहा। "आपने कहा था कि सबूत थैली में डालिए। मैंने डाला। फिर आप यहाँ किस मुँह से खड़े हैं?"
शर्मा ने सिर उठाया। उनके होठों पर कुछ काँपा, पर फिर वो चुप हो गए। ठाकुर हँसा।
"इंस्पेक्टर साहब को ऊपर से आदेश मिला है," उसने कहा। "और ऊपर वाले को मैं जानता हूँ। अब सुनो, वीर सिंह। ये काग़ज़ अखाड़े की ज़मीन का है। इसमें साफ़ लिखा है कि रणवीर सिंह ने दो साल पहले ये ज़मीन मुझे बेच दी थी। तुम, तुम्हारे साथी, ये बूढ़ी औरत, ये लड़की — सब अवैध रूप से घुसे हुए हो। कब्ज़े का केस है।"
भीड़ में हड़कंप मच गया। पीछे किसी ने कहा — "अरे, अखाड़े की ज़मीन तो रणवीर सिंह की है, ये क्या बोल रहा है?"
ठाकुर ने वही मुड़ा काग़ज़ ऊपर उठाया। मशाल की रोशनी में उस पर लगी मुहर चमकी।
"सबूत है," उसने कहा। "हस्ताक्षर हैं। गवाह हैं।"
तभी पीछे से एक आवाज़ आई। बूढ़ी, पर साफ़, ऐसी जैसे सूखी लकड़ी में अचानक आग लग गई हो।
"झूठ।"
कमला देवी आगे आईं। लाठी टेकती, धीरे-धीरे, पर हर कदम पर भीड़ पीछे हटती गई। वो ठाकुर के सामने आकर रुकीं और उसके हाथ में पकड़े काग़ज़ की तरफ़ देखा।
"ये वारंट जाली है," उन्होंने कहा। "और मैं जानती हूँ क्यों, क्योंकि अखाड़े की ज़मीन का असली काग़ज़ मेरे पास है। वो काग़ज़ जो भवानी सिंह ने मरने से तीन दिन पहले मेरे हाथ में रखा था, इस डर से कि कहीं उसके बाद ये ज़मीन किसी और के हाथ न लग जाए।"
ठाकुर की आँखें सिकुड़ीं। उसने काग़ज़ नीचे किया।
"कमला देवी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ से मिठास गायब हो गई थी। "आप बूढ़ी हो रही हैं। आपको क्या पता कि कौन-सा काग़ज़ असली है?"
"मुझे पता है," कमला देवी ने कहा, "क्योंकि असली काग़ज़ पर भवानी के हाथ की गंध है। और उस गंध को अगर मैं पहचानती हूँ, तो ये लड़का भी पहचानता है।" उन्होंने मेरी तरफ़ इशारा किया। "वीर, इसे सूंघ।"
मैं आगे बढ़ा। ठाकुर ने काग़ज़ पीछे कर लिया।
"नहीं," उसने कहा। "कोई छुएगा नहीं।"
"तो फिर आप ही पकड़े रहिए," मैंने कहा, "और सबको दिखाइए कि आपको डर किस बात का है।"
भीड़ में से कोई हँसा। ठाकुर ने पलटकर देखा, पर हँसने वाला कौन था, पता नहीं चला। उसके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो ठाकुर के चेहरे पर नहीं होना चाहिए था — झुँझलाहट।
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