Spirit of a Fighter – Chapter 1066
और पहला निवाला निगलते ही वो रो पड़ी।
रोना ऐसा कि उसका पूरा शरीर हिल गया। वो घुटनों पर गिर गई और खीर का बर्तन उसके हाथ से छूट गया।
"इस खीर में ज़हर नहीं है ना?" वो फफकते हुए बोली। "मेरे पिता ने भी पहली बार खीर ही दी थी… उसमें ज़हर था।"
॥
वो रो रही थी, और उसके हाथ से गिरा खीर का बर्तन मिट्टी में लोट गया। गर्म खीर मेरे पैरों के पास फैल गई और उसकी भाप उठने लगी।
टिंकू एक पल के लिए जम गया। फिर वो घुटनों के बल उसके पास बैठ गया।
"दीदी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो कोई बच्चा रात में अकेले सुनकर महसूस करता है। "मेरी खीर में ज़हर नहीं होता। ये गारंटी है। मैं खुद चखकर लाता हूँ। हर बर्तन, हर बार। मेरी माँ कहती है कि जो रसोइया अपना खाना न चखे, वो रसोइया नहीं, कसाई है।"
चंदा ने अपना चेहरा हाथों से हटाया। उसके गालों पर खीर की लकीरें थीं और आँखों से पानी बह रहा था। उसने टिंकू को देखा। ऐसे देखा जैसे कोई बहुत दिनों बाद किसी रिश्तेदार को पहचान रहा हो।
"तुम…" उसकी आवाज़ फँस गई। "तुम मुझे खाना खिलाने वाले पहले आदमी हो जिसने पहले खुद खाया।"
"मैं तो बस…" टिंकू ने कान के पीछे रखी पेंसिल छुई। "मुझे लगा भूख लगी होगी। कोठे में कौन खाना देता है।"
चंदा हँसी। पहली बार। हँसी छोटी थी, रुँधी थी, पर हँसी थी। और वो हँसी सुनकर मेरे सीने में कुछ ढीला हुआ जो कब से कसा हुआ था।
मीरा पहले ही अपना बैग खोल चुकी थी। वो चंदा के पास घुटनों के बल बैठी और उसकी कलाई पकड़कर नाड़ी देखने लगी। उसके चेहरे का रंग बदल गया।
"तेरे होंठ सूख रहे हैं और नाड़ी तेज़ चल रही है," मीरा ने कहा। "बताओ, तुझे कब दिया था ये पानी? कितना दिया था? कितने दिन से?"
"तीन दिन," चंदा ने कहा। "रोज़ शाम को। एक कटोरी। पिता खुद आते थे। कहते थे बीमार हो गई हो, ये काढ़ा है।"
मीरा ने अपने बैग से हरी शीशी निकाली — वही अदरक-तुलसी वाली जो उसने सुरंग से पहले दिखाई थी। उसने ढक्कन खोला तो तीखी गंध हवा में फैल गई, और मेरी नाक ने उसे पकड़ लिया। अदरक, तुलसी, और उसमें मिली काली मिर्च। पीछे से कुछ कड़वा भी था।
"ये पी ले," मीरा ने कहा। "धीरे-धीरे। घूँट-घूँट।"
चंदा ने शीशी मुँह से लगाई। पहला घूँट लेते ही उसका चेहरा बिगड़ा, फिर दूसरे घूँट पर उसने आँखें बंद कर लीं। जब आँखें खोलीं तो उनमें पहली बार कुछ ऐसा था जो सिर्फ़ थकान नहीं था।
"जब ये ज़हर शरीर में जाता है," मीरा कहा, "तो वो पहले दम खींच लेता है। फिर साँस। फिर हड्डियों का मज्जा। जिसे ये तीन महीने पी ले, वो अपनी उम्र के आगे पहुँच जाता है। तीन दिन में तुझे बचाया जा सकता है। पर चंदा — मुझे सच बताना। तुझे और क्या-क्या दिया गया है?"
चंदा ने शीशी मीरा को लौटाई। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर कुछ कम।
"कुछ नहीं," वो बोली। "बस यही पानी। मैंने बाकी सब छुपाकर उगल दिया। कोठे की खिड़की से बाहर, नीचे कीचड़ में। इसीलिए मैं इतने दिन ज़िंदा हूँ।"
मैं उसके सामने बैठ गया। आग अब बुझ चुकी थी। करण के आदमी बाल्टियाँ लेकर दौड़ रहे थे और धुआँ उठ रहा था। मेरे कपड़ों पर कालिख थी और गले में धुएँ का स्वाद भरा हुआ था। पर मैं जानता था ये वक़्त किसी और चीज़ का है।
"चंदा," मैंने कहा, "डायरी। तूने कहा था तेरे पास डायरी है।"
उसने अपने कुर्ते की जेब से वो काली जिल्द वाली डायरी निकाली। जिल्द जगह-जगह से टूटी थी और कोने मुड़े हुए थे। मैंने उसे खोला तो पन्नों की गंध उठी — सीलन, स्याही और हल्की-सी राख। ऐसे पन्ने जो किसी ने बहुत बार छुए हों, बहुत बार छुपाए हों।
पहला पन्ना उलटते ही मेरी आँखें ठिठक गईं।
तारीख़ें। महीने। साल। नाम। मोटी स्याही में। हर नाम के आगे एक रकम।
"ये तो…" हरनाम मेरे पीछे से आया। उसने चश्मा सरका और झुककर देखा। उसके हाथ काँपने लगे। "ये तो मेरे रिकॉर्ड से भी पक्की है। मेरे खाते में जो बीमारी लिखी है, यहाँ उसके आगे असली वजह लिखी है।"
मैंने पन्ना पलटा। एक नाम आया — "रामू बैजू के गाँव का, उम्र बत्तीस, दो महीने बाद कमर पर पट्टी, तीन महीने में चारपाई।" मेरे हाथ रुक गए।
दूसरा नाम — "बैजू, रामू का साथी, उम्र तीस।" वही लिखा था। वही तारीख़ें।
"रामू और बैजू," मैंने धीरे से कहा। "पुल पर जिन्होंने गवाही दी थी। दोनों का नाम यहाँ है।"
चंदा ने सिर हिलाया।
"हर नाम के नीचे एक लाइन है," वो बोली। "लिखा है — कितना दिया, कब दिया, कब असर शुरू हुआ। मैंने तेरह साल की उम्र से ये लिखना शुरू किया। तब मैंने खिड़की से देखा था कि भैरव एक चौदह साल के लड़के को शाम को कुछ पिला रहा है। सात महीने बाद वो लड़का मर गया। गाँव ने कहा कमज़ोरी से मरा। मैंने कुछ नहीं कहा। बस एक कॉपी उठाई और लिख दिया। पहला नाम।"
मैंने पन्ने पलटते रहे। पंद्रह, बीस, पच्चीस नाम। और हर नाम के आगे वो एक लाइन — "दिया। असर। अंजाम।"
फिर मेरी उँगली रुकी। उस पन्ने पर नाम लिखा था — "भवानी सिंह।"
उसके नीचे सिर्फ़ तीन शब्द थे। "पानी नहीं दिया।" और उसके नीचे एक लाइन और थी, जो किसी और ने, बहुत बाद में जोड़ी थी, पतली पेंसिल से — "फिर भी मरा। मैं जानता हूँ कैसे।"
मेरा गला सूख गया। मैंने पन्ना उठाकर चंदा के सामने रखा।
"ये आख़िरी लाइन तूने लिखी?"
"नहीं," वो बोली, और उसकी आवाज़ में पहली बार डर आया। "ये मेरी नहीं है। मैंने ये डायरी कभी किसी को नहीं दी। मैं इसे मिट्टी के नीचे, अपनी चारपाई के पाए के नीचे छुपाकर रखती थी।"
मेरी नाक ने पन्ने के ऊपर हवा खींची। पुरानी स्याही की गंध, सीलन, राख — और उसमें मिली हुई गंध जो मैं पहचानता था। बादाम का तेल। चंदन। और कपूर। वही गंध जो मेरे आँगन के काग़ज़ पर थी। वही जो नंदकिशोर के हाथों से आती थी।
"ये लाइन बाद में जोड़ी गई है," मैंने कहा। "स्याही ताज़ी है। और इस पर नंदकिशोर की गंध लगी है।"
कालू काका ने पीछे से धीरे से कहा, "यानी डायरी किसी के हाथ लगी थी। और उसने वापस रख दी।"
"पर कौन?" मीरा ने पूछा। "चंदा, तेरी चारपाई के नीचे वो डायरी कब से थी?"
"तीन साल से," चंदा ने कहा। "जब से मुझे उस कोठे में डाला गया।"
मैंने करण की तरफ़ देखा। करण की आँखों में वही बात थी जो मेरे दिल में थी — कोई उनके बीच में है। कोई जो हर जगह पहले पहुँच जाता है।
मीरा ने चंदा का हाथ थामा। "तूने ये सब क्यों किया?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ नरम थी। "इतना ख़तरा। इतने साल। तू बच्ची थी। तू भाग सकती थी।"
चंदा ने उसकी तरफ़ देखा। उसके होठों पर वो रुँधी मुस्कान आई जो बहुत दिनों बाद आती है।
"मेरी माँ," वो बोली। "मेरी माँ को मेरे सामने से उठाया गया था। मैं ग्यारह साल की थी। मैंने सुना था भैरव को पिता से कहते — 'इस बार कुछ ज़्यादा हो गया।' बस इतना। और मेरी माँ अगली सुबह खिड़की के पास पड़ी थी, आँखें खुली और साँस बंद। उस दिन से मैंने कसम खाई थी — मैं अपनी माँ की मौत का बदला लूँगी। और बदला लेने का एक ही रास्ता था। उनका हिसाब रखना। नाम, तारीख़, रकम। सब।"
उसकी आवाज़ थोड़ी देर के लिए रुकी। फिर वो बोली, बहुत धीमे, "मुझे पता था कि एक दिन कोई आएगा जो इन काग़ज़ों को पढ़ेगा। और उस दिन मेरे पिता और भैरव दोनों को जवाब देना पड़ेगा।"
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