Spirit of a Fighter1064 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1064

7 min read November 5, 2026

मैंने उसकी तरफ़ देखा — बँधी कलाइयाँ, फटा कुर्ता, सूजा चेहरा। और मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो नफ़रत भी नहीं थी, गुस्सा भी नहीं था। कुछ और।

"तुमने ये क्यों किया?" मैंने पूछा। "वो तुम्हारे पिता हैं।"

चंदा ने मेरी आँखों में देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ उसी के पास थी।

"क्योंकि मेरे पिता ने मेरी माँ से पहले मुझे मारा था," उसने कहा। "जिस दिन मैंने माँ को खिड़की के पास देखा, उस दिन उन्होंने मेरे अंदर की बेटी मार दी।" उसने साँस ली। "और उसके बाद जो बची, वो उनकी बेटी नहीं है।"

कमरे में सन्नाटा गहरा था। सिर्फ़ चिमनी की लकड़ी चटक रही थी।

तभी मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो अपनी टोकरी खोल रहा था। वो टोकरी जो वो हमेशा लाता है — जिसमें मिठाई होती है, कभी खीर, कभी लड्डू।

उसने ढक्कन खोला, और उसमें से एक छोटा मिट्टी का कटोरा निकाला।

"ये…" टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हिचक थी जो हमेशा होती है जब वो अपनी मिठाई किसी को देता है, "ये खीर है। आज सुबह की। मैंने सोचा रास्ते में भूख लगेगी।"

वो चंदा के पास गया और घुटनों के बल बैठ गया।

"खाओ," उसने कहा।

चंदा ने कटोरे को देखा, फिर टिंकू को।

"तुम कौन हो?" उसने पूछा।

"मैं टिंकू हूँ," उसने कहा, और मुस्कुराया। "इसका भाई।" उसने मेरी तरफ़ इशारा किया। "और मैं मिठाई बनाता हूँ।"

चंदा ने कटोरे को देखा। उसके हाथ अभी भी बँधे थे। टिंकू ने अपनी उँगली में खीर ली और उसके मुँह के पास ले गया।

"पहला निवाला," टिंकू ने कहा। "हिम्मत करो।"

चंदा ने एक पल टिंकू को देखा, फिर खीर की तरफ़। और फिर उसने अपना मुँह खोला और निवाला खा लिया।

वो चबाने लगी। धीरे-धीरे।

और फिर, अचानक, उसकी आँखों से पानी बहने लगा।

न बहता पानी — बहता। जैसे किसी बाँध की दीवार टूट गई हो। वो रोई, और रोते हुए भी चबाती रही।

"क्या हुआ?" टिंकू घबरा गया। "खराब है? नमक ज़्यादा है? मैंने कहा था माँ से, चीनी कम—"

"नहीं," चंदा ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "नहीं। मीठी है। ठीक है।" उसने अपनी बँधी कलाई से अपनी आँखें पोंछने की कोशिश की, पर रस्सी आड़े आई। "इस खीर में ज़हर नहीं है ना? मेरे पिता ने भी पहली बार खीर ही दी थी… उसमें ज़हर था।"

टिंकू का हाथ रुक गया।

उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी ने उसे अंदर से तोड़ दिया हो।

"नहीं," उसने धीरे से कहा। "नहीं है। मैं वादा करता हूँ।"

और फिर उसने कटोरा अपने हाथ में लिया, उसमें से एक चम्मच खीर खुद खाई, और उसे निगल लिया।

"देखा?" उसने कहा। "मैंने खाई। मैं ज़िंदा हूँ।"

चंदा ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पानी अभी भी था, पर अब वहाँ कुछ और भी था — पहली बार, उस पूरे कमरे में, उसके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आई। छोटी। टूटी हुई। पर थी।

"तुम अजीब हो," उसने कहा।

"हाँ," टिंकू ने कहा, और उसने अपनी टोपी ठीक की। "माँ भी यही कहती है।"

कमरे में किसी ने हल्की हँसी छोड़ी। शायद माँ ने। शायद कालू काका ने। पता नहीं। पर हँसी थी।

मैं उठा और चंदा की कलाई की तरफ़ बढ़ा।

"अब मैं काटूँ?" मैंने कहा।

"अब काटो," उसने कहा।

मैंने छुरी से रस्सी काटी। एक-एक तार। जब आख़िरी तार टूटा, चंदा के हाथ गिरे और वो पत्थर पर गिर पड़े। उसकी कलाइयों पर गहरे लाल निशान थे — रस्सी के, और उसके नीचे पुराने घाव भी। मैंने टखनों की रस्सी भी काटी।

"मेरी कमर," चंदा ने कहा। "पट्टी।"

मैंने उसकी कमर से कपड़े की पट्टी खोली। उसमें एक छोटी डायरी थी — हाथ से सिली हुई, काले कपड़े में लिपटी। भीगी हुई, पर साबुत।

चंदा ने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये तुम्हारी है," उसने कहा। "मैंने ये तुम्हारे लिए लिखी है।"

मैंने डायरी ली। पहला पन्ना खोला। ऊपर, बहुत साफ़ अक्षरों में लिखा था —

"जो मेरे पिता ने किया, वो मैं सुनाना चाहती हूँ। मेरा नाम चंदा है। मैं ठाकुर महेंद्र सिंह की बेटी हूँ। और मैं गवाही दूँगी।"

मेरे हाथ काँपे। डायरी मैंने मीरा की तरफ़ बढ़ाई।

"देखो," मैंने कहा।

मीरा ने उसे खोला और पन्ने पलटने लगी। उसका चेहरा पढ़ते-पढ़ते कठोर होता गया।

"उन्नीस नाम," उसने धीरे से कहा। "और हर नाम के नीचे…" — उसने आगे पढ़ा — "तारीख़, रकम, शीशी का नंबर।" उसने आँखें ऊपर कीं। "वीर, इसमें हर मौत का हिसाब है। ये वो काग़ज़ हैं जो भैरव ने जलाए थे — पर ये नक़ल हैं।"

"और असली?" मैंने पूछा।

"असली उसी दराज़ में हैं," चंदा ने कहा। "मेरे पिता की हवेली में। उनके बिस्तर के नीचे एक लोहे का बक्सा है। चाबी…" — उसने अपनी उँगली अपने गले की तरफ़ उठाई — "मेरे गले में थी। पर उन्होंने उतार ली।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। माँ मेरी तरफ़ देख रही थीं। उनकी आँखों में पानी था, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस धीरे से सिर हिलाया — जैसे कह रही हों, "जो करना है, कर।"

मैंने चंदा की तरफ़ देखा।

"तुम मेरे साथ चलोगी?" मैंने पूछा। "अपने पिता के खिलाफ़?"

चंदा ने मेरी आँखों में देखा। और उसकी आवाज़ में वो दृढ़ता थी जो सिर्फ़ उन्हीं के पास होती है जिन्होंने सब कुछ खो दिया हो।

"मैं तो बीस साल से उसके खिलाफ़ हूँ," उसने कहा। "बस आज पहली बार कोई मेरी तरफ़ से बोल रहा है।"

तभी टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।

"भैया," उसने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो अब तक छुपा हुआ था, "बाहर रोशनी आ रही है। बहुत सारी मशालें।"

मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।

हाँ। दरवाज़े की दरार से पीली रोशनी अंदर आ रही थी। और साथ में आवाज़ें — कई पैरों की, कई आवाज़ों की।

कालू काका उठे। "ठाकुर के आदमी।"

"कितने?" मैंने पूछा।

"बहुत," उन्होंने कहा।

मैंने डायरी अपनी कमीज़ के अंदर, कमर पर, कसकर बाँधी — जैसे चंदा ने बाँधी थी। और फिर मैंने मशाल उठाई।

"चंदा," मैंने कहा, "तुम मीरा और माँ के साथ रहो। टिंकू, तू पीछे। काका, आप मेरे साथ।"

"और तुम?" माँ ने कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वही डर था जो हर माँ की आँखों में होता है। पर उन्होंने रोका नहीं। बस अपना हाथ मेरे सिर पर रखा।

"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "आज तेरा पेट भरा है। बीस साल का सच तेरे सीने में है। जा।"

मैंने दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया।

और तभी, बाहर से, एक आवाज़ आई। ठाकुर की आवाज़। मीठी, जैसे गुड़। पर उसमें वो ज़हर भी था जो मैं अब पहचानता था।

"वीर सिंह!" वो चिल्लाया। "मेरी बेटी को छोड़ दे। बदले में मैं तुझे तेरे पिता की हड्डियाँ दे दूँगा।"

मेरा हाथ दरवाज़े पर रुक गया।

चंदा ने पीछे से कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो काँप नहीं थी, "मेरे पिता झूठ बोल रहे हैं। उनके पास तुम्हारे पिता की हड्डियाँ नहीं हैं। उन्होंने उन्हें कहीं और भेज दिया है। मुझे पता है कहाँ।"

मैं पलटा।

"कहाँ?"

चंदा ने मेरी आँखों में देखा।

"उस जगह," उसने कहा, "जहाँ से कोई ज़िंदा नहीं लौटता। और वो जगह…" — उसने साँस ली — "वो जगह मेरे पिता के पीछे के कमरे में है। जहाँ मेरी माँ ग्यारह साल से बैठी हैं।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"तो कल सुबह हम वहाँ जाएँगे," मैंने कहा। "पर पहले आज की रात को ज़िंदा निकलना है।"

मैंने दरवाज़ा धक्का दिया और मशाल ऊपर की।

बाहर आसमान में तारे थे, और ज़मीन पर मशालें, और बीच में ठाकुर खड़ा था। उसके पीछे पचास आदमी, हाथों में लाठियाँ।

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