Spirit of a Fighter – Chapter 1063
उसने उँगलियाँ चंदा की कलाई पर रखीं और आँखें बंद कर लीं। फिर कुछ पल बाद खोलीं।
"नाड़ी कमज़ोर है," मीरा ने कहा। "ज़हर है, पर कम मात्रा में। पूरी खुराक नहीं दी गई। शायद आधी। शायद इससे भी कम।"
"मैं बचूँगी?" चंदा ने पूछा।
"हाँ," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी। "पर जल्दी करना होगा। तीन दिन में हरी शीशी वाला उल्टा उपाय। वो मेरे पास नहीं है, पर…" उसने मेरी तरफ़ देखा।
"छोटू," मैंने कहा। "वैद्य का बेटा छोटू। वो जानता है।"
मीरा ने सिर हिलाया।
मैंने अपनी छुरी निकाली और चंदा की कलाई के पास बैठ गया।
"मत काटो," चंदा ने कहा।
"रस्सी काटनी है," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी। "पर मत काटो। पहले सुनो। जब ये रस्सी खुलेगी, तो मैं तुम्हें सब बताऊँगी, और फिर तुम मुझे यहाँ से निकालना या मारना — दोनों तुम्हारा काम। पर पहले सुनो।"
मेरा हाथ रुक गया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया — "रुको।"
मैंने छुरी बंद करके जेब में रखी और चंदा के सामने फर्श पर बैठ गया।
"बोलो," मैंने कहा।
चंदा ने एक लंबी साँस ली। और फिर बोली।
"मेरे पिता ने मुझे यहाँ इसलिए बंद किया," उसने कहा, "क्योंकि मैंने उनके काग़ज़ चुराकर छुपा दिए।"
"कौन से काग़ज़?" मैंने पूछा।
"वो काग़ज़ जो भवानी सिंह के कत्ल के बाद लिखे गए। बीस साल पहले।" चंदा ने अपना सिर थोड़ा उठाया। "मेरे पिता ने मेरी माँ को भी इसी पानी से मारा था। और आज मुझे भी दे दिया। मैं उनकी बेटी हूँ, पर मैं उनकी नहीं हूँ।"
ये शब्द गिरे और मेरे सीने पर लगे।
मेरे पीछे माँ ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। गुड़िया मेरे कंधे से चिपकी और उसने अपनी आँखें मेरी कमीज़ में छिपा दीं।
"तेरी माँ को?" मैंने धीरे से कहा। "तेरे पिता ने तेरी माँ को?"
चंदा ने सिर हिलाया। उसके होंठ काँप रहे थे, पर वो रोई नहीं। जैसे रोना भी उसने ज़हर के साथ पी लिया हो।
"माँ मर नहीं गई। माँ ज़िंदा है," चंदा ने कहा। "पर बोल नहीं सकती। चल नहीं सकती। मुझे नहीं पहचानती। ग्यारह साल से वो एक ही कमरे में बैठी हैं, और उनकी आँखें खिड़की की तरफ़ लगी रहती हैं।"
मेरे गले में कुछ अटका। मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं तेरह साल की थी," चंदा ने कहा। "माँ को पानी पीते देखा। उनके हाथ में गिलास था, और गिलास मेरे पिता ने ही भरा था। माँ ने पिया। और फिर वो गिर पड़ीं, और फिर उनकी आँखें खुलीं, पर उनमें कुछ नहीं था।" उसने रुककर साँस ली। "मैंने उस रात से कभी पानी नहीं पिया जो मेरे पिता ने मुझे दिया हो। पर उन्होंने मेरे कमरे में पानी का घड़ा रख दिया था। अच्छी चीज़। ठंडा। पता नहीं कब पिया।"
"कब दिया तुम्हें?" मीरा ने पूछा। "ज़हर?"
"दस दिन पहले," चंदा ने कहा। "जिस दिन मैंने काग़ज़ चुराए। उसी शाम उन्होंने मेरे हाथ में खीर का कटोरा पकड़ाया और कहा — 'बेटी, तू मेरी आँखों का तारा है।'" वो हँसी। छोटी, सूखी हँसी जो दिल तोड़ती है। "खीर में ज़हर था। और मैंने खाया। बाप का हाथ, कैसे मना करती?"
"दस दिन से ज़हर ले रही है?" मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार झिझक आई। "और अभी तक ज़िंदा है?"
"मैंने ज़हर लिया नहीं," चंदा ने कहा। "मैंने पहला निवाला मुँह में लिया, और फिर… मुझे कुछ याद आया। मैंने खखारकर कटोरा पलट दिया। उन्होंने गुस्से में आकर मुझे यहाँ लाकर बंद कर दिया। पर तीन दिन में… भूख से, प्यास से…" — उसने अपनी सूखी ज़ुबान से होंठ गीले किए — "तीन दिन बाद मुझे लगा कि अगर मरना है तो पानी तो पियूँ। और जो पानी उन्होंने भेजा, वो पिया।"
"और वो पानी ज़हरीला था," मैंने कहा।
"आधा। क्योंकि मैंने सिर्फ़ आधा गिलास पिया। बाकी गिरा दिया।" चंदा ने अपनी आँखों में मेरी आँखें लीं। "मैं उनकी बेटी हूँ, वीर सिंह। मुझे पता है वो कैसे सोचते हैं। उन्होंने कभी किसी को पूरा ज़हर नहीं दिया। वो पहले आधा देते हैं। देखते हैं कि आदमी कैसे गिरता है। फिर बाकी। ताकि मौत 'बीमारी' लगे।"
कमरे में किसी ने साँस तक नहीं ली।
तभी कालू काका आगे आए। वो घुटनों के बल बैठे, चंदा के चेहरे को देखा, और उनका चेहरा बदल गया।
"तू… तू शांति की बेटी है?" उन्होंने कहा।
चंदा ने उनकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ नरम आया।
"तुम कालू काका हो?" उसने कहा। "माँ तुम्हारा नाम लेती थीं। जब वो बोल सकती थीं। वो कहती थीं — 'कालू भैया मुझे कभी नहीं भूलेंगे।'"
कालू काका ने अपना मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली। दो आँसू उनकी झुर्रियों में बहकर खो गए।
मैंने धीरे से पूछा, "शांति?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "भवानी की तीसरी बहन। सबसे छोटी। जिसे ठाकुर ने ब्याह लिया।" उन्होंने अपना गला साफ़ किया। "हमें लगा वो मर गई। बीस साल पहले।"
"नहीं," चंदा ने कहा। "वो मरने से पहले ही मर गई थी।"
अब वो चुप नहीं रही। वो बोलती गई, और हर शब्द मेरे अंदर कुछ तोड़ता गया।
"बचपन में मुझे लगता था कि मेरे पिता बहुत बड़े आदमी हैं। गाँव में जब वो चलते, सब सिर झुकाते। जब मैं छोटी थी, वो मुझे घोड़े पर बैठाते थे। मेरे लिए मिठाई लाते। एक बार मैंने कहा कि मुझे लाल जूते चाहिए, तो अगले दिन शहर से लाल जूते आए।" उसकी आवाज़ में एक पुरानी खुशी थी, जो अब कराह बन चुकी थी। "मैं सोचती थी कि मैं भाग्यशाली हूँ। फिर मैंने माँ को खिड़की के पास बैठे देखा। फिर मैंने रातों को उनके कमरे से आवाज़ें सुनीं। फिर मैंने पहली बार उनके हाथ में वो पीली शीशी देखी।"
वो रुकी। उसने अपनी ज़ुबान से होंठ गीले किए।
"और फिर एक रात मैंने माँ के पास जाकर पूछा — 'माँ, तुम बोलती क्यों नहीं?' और माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में सिर्फ़ पानी था। मुझे लगा कि माँ रो रही हैं। पर फिर मैंने देखा कि माँ की उँगली मेरी हथेली पर कुछ लिख रही है। धीरे-धीरे। और मैंने पढ़ा — 'तेरे पिता।'" चंदा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "उस दिन मेरे अंदर का पिता मर गया।"
टिंकू ने पीछे से अपना मुँह फेर लिया। मैंने उसका कंधा थाम लिया।
चंदा ने आँखें खोलीं।
"मैंने तेरह साल की उम्र से सोचना शुरू किया कि मैं क्या करूँ। पढ़ाई की। बाहर की दुनिया से किताबें मँगाईं। मैंने पिता के कमरे में जाना सीखा जब वो बाहर होते। और एक दिन मुझे उनकी दराज़ में एक लोहे का बक्सा मिला। उसमें काग़ज़ थे। हर पन्ने पर एक नाम, एक तारीख़, एक रकम। और साथ में वो पीली शीशी। तीन शीशियाँ।"
"तीन?" मीरा ने कहा।
"तीन। एक में पानी जो ताक़त देता था — वो बेचते थे। दूसरी में वो जो याददाश्त खा जाता था — वो माँ को दिया। और तीसरी में वो जो धीरे-धीरे साँस ले जाता था — वो भवानी सिंह को दिया गया।" चंदा ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने रोज़ एक पन्ना पढ़ा। रोज़ एक नाम याद किया। बीस साल में उन्नीस नाम मुझे याद हो गए।"
मेरा सिर झुक गया। "उन्नीस?"
"उन्नीस," उसने कहा। "उन्नीस पहलवान। उन्नीस मौतें। और हर मौत के आगे लिखा था — 'कुदरती बीमारी'।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
फिर मैंने पूछा, "वो काग़ज़ कहाँ हैं?"
चंदा ने अपनी आँखों से इशारा किया — नीचे, अपनी कमर की तरफ़।
"मेरे कुर्ते के नीचे," उसने कहा। "कमर पर कपड़े की पट्टी बाँधी है। उसमें एक छोटी डायरी है। पिता के काग़ज़ों की नक़ल। मैंने खुद लिखी थी। उन्नीस रातों में।"
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