Spirit of a Fighter – Chapter 1062
मैं पलटा। मीरा मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे बता रही थी कि वो साथ है। टिंकू ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। कालू काका ने अपनी लाठी उठाई।
"देवेंद्र बाबू," मैंने कहा, बिना पलटे। "वो कमरा किधर है?"
वो उठा। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, पर वो खड़ा था।
"मैं तुम्हें रास्ता दिखाता हूँ," उसने कहा।
हम बाहर आए। आँगन के पीछे एक गलियारा था जो दीवारों के बीच से मुड़ता हुआ पीछे की तरफ़ जाता था। गलियारा सँकरा था, और दीवारों पर काई जमी थी। छत से पानी की बूँदें टपक रही थीं, और हर बूँद की आवाज़ गलियारे में गूँजती थी।
गलियारे के अंत में एक लोहे का दरवाज़ा था।
बड़ा-सा, भारी, जंग लगा। उस पर एक पुराना साँकल लगा था। और दरवाज़े के किनारे-किनारे, नीचे से ऊपर तक, खरोंचें थीं। ताज़ी खरोंचें।
मैंने हाथ बढ़ाया और खरोंचों को छुआ। धूल नहीं थी उन पर। कुछ घंटे पहले की थीं।
"ये खरोंचें…" मैंने धीरे से कहा।
"किसी ने अंदर से खींचने की कोशिश की है," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "देखो, नाखूनों के निशान हैं।"
मैंने दरवाज़े के पास अपना चेहरा किया।
और तभी मुझे गंध आई।
वो गंध। वो पुरानी गंध। जो मेरे सपनों में आती थी जब मैं छोटा था। जो मुझे रातों को जगाती थी और मैं माँ के पास जाकर सो जाता था।
पीली शीशी की गंध। ज़हर की गंध। कड़वी, धातु जैसी, और उसमें घुली हुई कुछ मीठी — गुड़ की चाशनी जैसी।
पर इसके साथ कुछ और था। कुछ और भी। मैंने गहरी साँस ली और पहचानने की कोशिश की।
मिट्टी। जली हुई मिट्टी। और… और… कपूर। और… हल्दी।
और फिर, बहुत धीरे, दरवाज़े के पीछे से, एक आवाज़ आई।
रोने की आवाज़।
धीमी, टूटी, जैसे कोई बहुत थका हुआ हो और रोने की भी ताकत न बची हो।
मेरे पीछे सब चुप हो गए।
टिंकू ने मेरी कमीज़ और ज़ोर से पकड़ी।
मीरा ने मेरा हाथ थामा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
कालू काका ने अपनी लाठी दरवाज़े पर टिका दी।
मैंने साँस रोकी और सुना।
रोने के बीच, बहुत धीरे, कोई गिन रहा था।
एक… दो… तीन…
और फिर आवाज़ रुकी।
कुछ पल सन्नाटा।
और फिर दरवाज़े के पीछे से एक फुसफुसाहट आई। इतनी धीमी कि जैसे हवा हो। पर शब्द साफ़ थे।
"आ गया… आख़िर आ गया…"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"कौन हो तुम?" मैंने दरवाज़े के पास मुँह रखकर पूछा।
अंदर से कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ़ एक हल्की हँसी — नहीं, हँसी नहीं, किसी के रोने और हँसने के बीच की एक आवाज़।
"मैं वीर सिंह हूँ," मैंने कहा। "भवानी सिंह का बेटा।"
अंदर सन्नाटा।
फिर धीरे-धीरे, बहुत धीरे, दरवाज़े के नीचे की दरार से एक आवाज़ आई। नरम। टूटी हुई। पर साफ़।
"भवानी का बेटा…" उसने दोहराया। "तो तू बड़ा हो गया।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"तुम कौन हो?" मैंने फिर पूछा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी।
अंदर से एक गहरी साँस आई। फिर वो बोली, और उसकी आवाज़ में वो पुराना दर्द था जो बीस साल से दबा हुआ था।
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे सबने मरा मान लिया।"
देवेंद्र पीछे हटा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"ये… ये आवाज़…" वो धीरे से बोला। "ये तो वही है जो मैं बीस साल से सुनता आया हूँ।"
कालू काका आगे आए। उन्होंने अपना कान दरवाज़े पर रखा।
"कौन बोल रहा है?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने पहले नहीं सुना था — पहचान। "ये आवाज़…"
अंदर से फिर वो फुसफुसाहट आई।
"कालू… कालू काका… तुम अभी भी यहाँ हो?"
कालू काका पीछे हटे। उनका चेहरा बदल गया। उनकी आँखें फैल गईं, और उनके हाथ काँपने लगे। उन्होंने अपना मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला।
"काका?" मैंने कहा। "काका, क्या हुआ? ये कौन है?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू थे।
"वीर," उन्होंने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुरानी कब्र से निकली हो। "ये आवाज़… ये तो…"
वो रुके। उन्होंने अपना गला साफ़ किया।
"ये तो भवानी की बहन की आवाज़ है।"
॥
"भवानी की बहन की आवाज़।"
कालू काका के मुँह से निकली ये बात और मेरे हाथ से मशाल का डंडा छूटने को हुआ। मैंने दोनों हाथों से दरवाज़े का लोहा पकड़ा।
"काका, तुम ठीक हो?" मैंने कहा। "भवानी की बहन… तो कमला देवी तो ज़िंदा हैं। हमने उन्हें अदालत में देखा था।"
कालू काका ने सिर हिलाया, धीरे-धीरे, जैसे कोई भारी बोझ उठा रहा हो।
"एक बहन नहीं थी, वीर। भवानी के तीन रिश्ते थे। कमला, गंगा, और…" — उनकी आवाज़ रुक गई — "और एक, जिसका नाम गाँव में भूल गए। जिसे सबने मरा मान लिया।"
दरवाज़े के पीछे से फिर वो आवाज़ आई। अब थोड़ी साफ़।
"कालू, तूने मुझे पहचान लिया। इतने सालों बाद भी।"
कालू काका लड़खड़ाकर दरवाज़े के सहारे बैठ गए। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में आँसू गिरने लगे।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। माँ मेरी तरफ़ देख रही थीं, उनकी आँखों में सवाल था। गुड़िया मेरी कमर से चिपकी खड़ी थी। मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक मोमबत्ती निकाली। टिंकू ने पीछे से एक और मशाल जलाई और मेरे हाथ में थमा दी।
"भैया," टिंकू ने धीरे से कहा, "दरवाज़ा खोलो। देर मत करो।"
मैंने दरवाज़े का लोहा और ज़ोर से पकड़ा।
"पीछे हटो सब," मैंने कहा। "काका, आप भी।"
फिर मैंने अपना पूरा ज़ोर लगाया।
लोहा चरमराया। जंग सालों की सोई हुई चीख की तरह चीखी। और फिर दरवाज़ा खुला, और हमारे सामने अंधेरा था — गाढ़ा, भारी, जैसे पुराना पानी।
मैंने मशाल आगे की।
पहले मुझे दीवारें दिखीं। नम, काली, नीचे से ऊपर तक पानी के निशान। फिर फर्श — पत्थर का, टूटा हुआ। और फिर, कोने में, अंधेरे में एक टिमटिमाती लौ।
एक चिमनी। बहुत छोटी। जिसमें लकड़ी के टुकड़े जल रहे थे और धुआँ सीधा छत की दरारों में जा रहा था।
और चिमनी के पास, फर्श पर, एक लड़की बैठी थी।
हाथ-पैर बँधे। कलाई पर मोटी रस्सी, टखनों पर और भी मोटी। सिर झुका हुआ। बाल बिखरे, जिनमें से कुछ भूरे दिख रहे थे — जैसे धूल या राख से। कुर्ता फटा हुआ, घुटनों तक, और उस पर लगे दाग मैं पहचान गया। वही दाग जो पीली शीशी से गिरते हैं।
उसका चेहरा सूजा हुआ था। एक आँख के नीचे हल्का नीला निशान। होंठ सूखे, फटे हुए। पर उसकी आँखों में — कुछ था। डर नहीं। थकान नहीं। कुछ और।
"तुम भवानी के बेटे हो," उसने कहा, और आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने दिनों का सूखा गला पहली बार खोला हो।
मैंने मशाल नीचे की और आगे बढ़ा।
"मत आओ," वो फुसफुसाई। "पहले सुनो। मैं ठाकुर की बेटी हूँ — और मुझे भी ज़हर दिया गया है।"
कमरे में सन्नाटा।
ऐसा सन्नाटा जो कानों में बजता है।
मेरे पीछे टिंकू की मशाल काँपी और दीवार पर परछाईं हिली।
"क्या?" मैंने कहा। "तुम… तुम ठाकुर की बेटी हो?"
"चंदा," उसने कहा। "मेरा नाम चंदा है।"
माँ आगे आईं। उनकी चप्पल की आवाज़ पत्थर पर सूखी सी लगी।
"बेटी," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मिठास थी जो सिर्फ़ माँ के गले से निकलती है, "तुम्हारे हाथ…"
"धीरे से," चंदा ने कहा। "दस दिन से बँधे हैं।"
मीरा मेरे कंधे के नीचे से निकलकर सीधी उसके पास पहुँची। उसने कोई डर नहीं दिखाया, कोई हिचक नहीं। बस अपना बैग ज़मीन पर रखा, घुटनों के बल बैठी और चंदा की कलाई थाम ली।
"दस दिन?" मीरा ने कहा, और उसका लहजा वही था जो हमेशा होता है — सीधा, मीरा-वाला। "रस्सी बहुत कसी है। खून ठीक चल रहा है, पर धीमा।"
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