Spirit of a Fighter – Chapter 1061
"और ये देवेंद्र सिंह कौन है?"
कालू काका रुके। उनके चेहरे पर वो पुरानी सोच आई।
"देवेंद्र…" उन्होंने धीरे से दोहराया। "देवेंद्र तो रणवीर सिंह के अखाड़े में भी आता था, बहुत पहले। बीस साल पहले। जब वो जवान था। पर फिर कभी नहीं आया। मैंने सुना था कि वो शहर चला गया।"
"वो ठाकुर का भाई है?"
"सौतेला," कालू काका ने कहा। "अलग माँ का। मैंने सुना है कि देवेंद्र की माँ ठाकुर के पिता की दूसरी औरत थी। और ये दोनों भाई कभी एक साथ नहीं दिखे।"
हम आगे बढ़े। आँगन के पार एक दालान था, और दालान के अंत में एक बंद कमरा — एक साधारण लकड़ी का दरवाज़ा, जिस पर पुराना ताला लगा था।
चौकीदार हमारे पीछे-पीछे आ रहा था। उसने दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया।
"मालिक इसी में हैं," वो बोला।
मैंने हाथ बढ़ाया और दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। फिर धीरे-धीरे पैरों की आहट आई, और दरवाज़ा खुला।
सामने एक आदमी खड़ा था।
पचास से ज़्यादा का, पर ठाकुर से छोटा लग रहा था। दुबला-पतला, छोटी मूँछें, घुँघराले बाल जिनमें सफ़ेदी की पहली लकीरें आ रही थीं। उसने सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहना था और गले में एक छोटी सी रुद्राक्ष की माला थी। हाथ जोड़े हुए था, जैसे कोई मंदिर में खड़ा हो।
पर उसकी आँखें… उसकी आँखें डर रही थीं। सच में डर रही थीं। जैसे खरगोश की आँखें, जब सामने शेर खड़ा हो।
"वीर सिंह," उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई गला भरा हुआ हो। "तुम आ गए।"
"तुम देवेंद्र सिंह हो?" मैंने पूछा।
"हाँ।" उसने हाथ जोड़े। "मैं… मैं तुम्हारे पिता को जानता था। भवानी सिंह को। बहुत अच्छे आदमी थे।"
मेरे अंदर कुछ कड़ा हुआ। "तुम मेरे पिता को जानते थे?"
"मैं…" उसकी आवाज़ लड़खड़ाई। "मैं उन दिनों यहाँ आता था। जब ये अखाड़ा मेरे भाई ने नहीं, मेरे पिता ने संभाला था। भवानी जी आते थे, कुश्ती सिखाते थे। मैं बैठकर देखता था। मुझे कुश्ती पसंद नहीं थी, पर… पर उनकी आवाज़ में कुछ था। जब वो बोलते थे, तो लगता था कि सब ठीक हो जाएगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो सच बोल रहा था। मैं उसकी गंध से पहचान सकता था — उसके पसीने में वो कड़वाहट नहीं थी जो झूठ में होती है। डर था, घबराहट थी, पर झूठ नहीं।
"अंदर आओ," उसने कहा, और दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
कमरा छोटा था। एक खाट, एक लकड़ी की मेज़, एक अलमारी, दीवार पर एक तस्वीर — बरगद के पेड़ के नीचे खड़े दो आदमियों की, दोनों पहलवानों जैसे। मेज़ पर एक घड़ी रखी थी जो रुकी हुई थी। और एक कटोरी में सूखे फूल पड़े थे।
देवेंद्र ने हमें बैठने का इशारा किया, पर कोई नहीं बैठा।
"तुम मुझे क्यों बुलाया?" मैंने सीधा पूछा।
"मैंने नहीं बुलाया," उसने कहा। "मेरे भाई ने बुलाया।"
"तुम्हारा भाई यहाँ है?"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "वो कहीं और है। वो मुझे यहाँ बैठाकर गया है — कहता है, 'तू मालिक है, तू बैठ, मैं तेरा काम करता हूँ।' पर सच ये है कि…" वो रुका, और उसका गला भर आया। "सच ये है कि मैं यहाँ क़ैदी हूँ। बीस साल से।"
मीरा आगे आई। उसने अपना बैग कंधे से उतारा और देवेंद्र की आँखों में देखा।
"आप अपना नाम बचाना चाहते हैं," वो बोली। उसकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो दम था जो किसी को भी सीधा खड़ा कर दे। "तो सच बोलिए। मेरे पिता रणवीर सिंह हैं। आप जानते हैं उनके साथ क्या हुआ। आप जानते हैं भवानी सिंह के साथ क्या हुआ। हमें सब पता है — पीली शीशी, नशीला पानी, तहखाना, मौतें। हम सब जानते हैं। अब आपकी बारी है।"
देवेंद्र का चेहरा पीला पड़ गया। वो पीछे हटा, खाट के किनारे से टकराया, और बैठ गया।
उसने अपने हाथों को देखा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"मैं…" उसने धीरे से कहा। "मैं कुछ नहीं जानता।"
"झूठ," मैंने कहा।
"मैं सच कह रहा हूँ—"
"तुम्हारी गंध कह रही है," मैंने कहा। "तुम्हारे पसीने में डर है, पर झूठ नहीं। तुम कुछ जानते हो। और तुम बताना चाहते हो। बस डर रहे हो।"
देवेंद्र की आँखें फैल गईं। उसने मेरी तरफ़ देखा, जैसे पहली बार देख रहा हो।
"तुम…" उसने धीरे से कहा। "तुम भवानी के बेटे हो। बिलकुल वैसे ही।"
"कैसे?"
"वो भी ऐसे ही बोलते थे।" देवेंद्र की आवाज़ भर आई। "सीधा। बिना लाग-लपेट। जैसे सच कोई चीज़ न हो जिसे छिपाना पड़े।" उसने अपनी आँखों से पानी पोंछा। "मैंने तुम्हें देखा था। जब तुम छोटे थे। तुम्हारे गाँव में। मैं एक बार गया था — भवानी की मौत के बाद। मैं तुम्हारी माँ को कुछ पैसे देना चाहता था। पर मैं दरवाज़े तक पहुँचकर लौट गया। डर गया था। कि अगर मेरे भाई को पता चला तो…"
वो चुप हो गया।
कालू काका आगे आए। वो देवेंद्र के सामने खड़े हुए।
"देवेंद्र बाबू," उन्होंने धीरे से कहा। "मैं कालू हूँ। पुराना मज़दूर। रणवीर अखाड़े का।"
देवेंद्र ने उनकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ पहचाना।
"कालू काका," उसने कहा। "तुम अभी भी…"
"जिंदा हूँ," कालू काका ने कहा। "और तुम्हारी तरह चुप हूँ, बीस साल से।"
देवेंद्र ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
कुछ पल कमरे में सन्नाटा रहा। सिर्फ़ दीवार पर टिकी घड़ी की टिक-टिक, जो रुकी हुई थी, फिर भी आवाज़ कर रही थी।
"अखाड़े के पीछे एक कमरा है," देवेंद्र ने धीरे से कहा, चेहरा छिपाए हुए। "बंद कमरा। लोहे का दरवाज़ा। मेरे भाई ने उसे बीस साल पहले बंद करवाया था। कहता है वहाँ कुछ नहीं है, बस पुराना सामान है। पर…"
वो रुका। उसकी साँस रुक गई थी।
"पर क्या?" मीरा ने पूछा।
देवेंद्र ने अपने हाथ नीचे किए। उसकी आँखें लाल थीं।
"पर हर रात," वो बोला, और उसकी आवाज़ टूट रही थी, "मैं वहाँ से रोने की आवाज़ सुनता हूँ।"
कमरे में हवा ठंडी हो गई। मैंने महसूस किया कि टिंकू मेरे पीछे खड़ा था और उसने मेरी कमीज़ पकड़ ली थी।
"रोने की आवाज़?" मैंने कहा।
"एक औरत," देवेंद्र ने कहा। "या शायद कोई लड़का। मैं… मैं ठीक से नहीं जानता। आवाज़ ऐसी होती है जैसे किसी का गला घुट रहा हो। और फिर कभी-कभी… कभी-कभी कोई गिनती करता है। धीरे-धीरे। एक… दो… तीन…"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
वही गिनती। जो कोठे में सुनाई दी थी। जब माँ की साँसें गिनी जा रही थीं।
"तुमने कभी दरवाज़ा खोलकर देखा नहीं?" मैंने पूछा।
"मैं डरता था," देवेंद्र ने कहा। उसकी आवाज़ में शर्म थी, और वो शर्म सच्ची थी। "मैंने डर के मारे आँखें बंद रखीं। हर रात। मैं अपने कानों पर तकिया रखकर सोता था, पर आवाज़ आती रही। बीस साल। हर रात। और मैं… मैं कुछ नहीं कर पाया।"
वो रो पड़ा।
और उसका रोना वैसा नहीं था जैसा बुरे आदमी का होता है। वो एक बूढ़े आदमी का रोना था जिसने बीस साल अपनी आँखें बंद रखीं, और अब पहली बार खोलीं और देखा कि सामने क्या है।
भावना। सच्ची भावना। मेरे अंदर कुछ नरम पड़ा।
"देवेंद्र सिंह," मैंने धीरे से कहा, और अपनी आवाज़ में वो नरमी आई जो मैंने सोचा था कि इस आदमी के लिए कभी नहीं आएगी। "तुमने कुछ किया जो बहुत लोग नहीं कर पाते। तुमने बीस साल बर्दाश्त किया। और अब तुमने सच बताया। ये भी हिम्मत है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — कृतज्ञता, या शायद वो पहली बार किसी ने उसे इंसान समझा हो।
"पर अब," मैंने कहा, "आँखें खोलो।"
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