Spirit of a Fighter – Chapter 1060
सुक्खी बुआ सबसे आगे थीं, हाथ में पान का बीड़ा और मुँह में लाल पान। उन्होंने हमें देखा और चिल्लाईं, "अरे! अरे! ये लोग आ गए! मैंने तो सुना है कि ये सुरंग में थे!"
"बुआ," मैंने कहा, "आप यहाँ कैसे?"
"मैंने तो सुना है कि शहर के अखाड़े में आज खाना भी मुफ़्त है," उन्होंने कहा। "तो मैं क्यों न आती?"
सब हँस पड़े। मैं भी हँसा। और मेरी हँसी में वो सारी थकान थी।
रास्ते में लोग जुड़ते गए। कुछ बैलगाड़ी वाले थे, कुछ ट्रैक्टर वाले। एक ट्रैक्टर वाला बोला, "मैं जानता हूँ रास्ता। शहर के अखाड़े तक सीधा।"
"नहीं, मैं पहले," बैलगाड़ी वाला बोला। "मेरे बैल तेज़ हैं।"
"तेरे बैल बूढ़े हैं," ट्रैक्टर वाला बोला। "मेरा ट्रैक्टर—"
"बस!" मैंने कहा। "सब चलेंगे। कोई पहले, कोई पीछे। पर सब।"
रास्ते में कीचड़ था। पत्थर थे। लोग फिसलते थे और उठते थे, और हँसते थे। एक बच्चा गिरा, और उसकी माँ ने उसे उठाया और कहा, "देख, आज तू भी पहलवान बनेगा।"
मैंने मुस्कुराकर देखा।
फिर माँ फिसलीं।
मैंने आवाज़ सुनी — एक छोटी सी चीख, और पैर फिसलने की आवाज़। मैं पलटा। माँ कीचड़ में गिर रही थीं, किनारे पर, जहाँ सड़क ढलान पर थी।
मैं दौड़ा। मेरे पैर मेरे शरीर से पहले पहुँचे, और मैंने उन्हें कमर से पकड़ लिया। उनका वज़न मेरी बाँहों पर आया, और मैं लड़खड़ाया, पर गिरा नहीं।
"माँ," मैंने कहा। "तुम ठीक हो?"
वो मेरे कंधे पर टिकीं। उनकी साँस फूल रही थी। पर फिर उन्होंने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा और धक्का दिया।
"मैं ठीक हूँ," वो बोलीं। "तू आगे बढ़।"
"माँ—"
"मैं ठीक हूँ," उन्होंने दोहराया, और उनकी आवाज़ में वो पुरानी दृढ़ता थी। "मैं ठीक हूँ। तू आगे बढ़।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा और अपने कंधे पर रखा। मैंने धीरे से कहा, "तुम मेरे साथ चलोगी। मेरे कंधे का सहारा लेकर।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — कृतज्ञता, या प्यार, या दोनों।
"तू बड़ा हो गया है," वो धीरे से बोलीं।
"तूने बड़ा किया है," मैंने कहा।
वो हँसीं, और उनकी हँसी में पानी था।
हम चले, और मैंने माँ को अपने कंधे पर सहारा दिया, और वो मेरे साथ चलीं।
सूरज ढलते-ढलते हम शहर की सीमा पर पहुँचे।
सामने एक बड़ी इमारत थी। काले पत्थर की, ऊँची दीवारों वाली। उसके दरवाज़े पर एक बड़ा-सा तख़्ता लगा था — "शहर का अखाड़ा।"
और उसके दरवाज़े पर एक चौकीदार खड़ा था। पतला, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी।
उसने हमें देखा, और उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"तुम कौन हो?" उसने कहा।
"मैं वीर सिंह हूँ," मैंने कहा।
उसका चेहरा बदला। वो सीधा हुआ।
"तुम वीर सिंह हो?" उसने दोहराया।
"हाँ।"
उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई, और उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान आई।
"मालिक ने कहा था," वो बोला। "कि जब तुम आओ, तो सीधे उसके कमरे में भेजना। वो तुम्हारी ही राह देख रहा है।"
॥
"मालिक तुम्हारी राह देख रहा है।"
चौकीदार की आवाज़ में वो मिठास नहीं थी जो दरवाज़े पर खड़े आदमी की होनी चाहिए। वो ऐसे बोला जैसे कोई जानता हो कि मैं अंदर जाऊँगा, और वो जानता हो कि मैं बाहर नहीं आऊँगा।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। पूरा रामपुर मेरे पीछे खड़ा था — माँ, गुड़िया, मीरा, टिंकू, कालू काका, करण, दीपक, सुक्खी बुआ, और वो सब जो रास्ते में जुड़ते गए थे। दो सौ से ज़्यादा लोग। धूल में सने, थके, पर आँखों में वो चीज़ जो हार से पहले आती है।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो मेरी बाँह पर टिकी थीं, साँस फूल रही थी, पर उन्होंने मेरी आँखों में देखा और धीरे से सिर हिलाया। बस इतना — कि जा।
"तुम सब यहीं रुको," मैंने कहा। "मैं अकेला जाऊँगा।"
"वीर—" मीरा ने शुरू किया।
"मीरा," मैंने उसकी तरफ़ देखा। "अगर ये जाल है, तो सब अंदर जाएँगे तो सब फँसेंगे। मैं अकेला जाऊँगा। अगर मैं आधे घंटे में न आऊँ, तो तुम सब—"
"आधे घंटे की बात मत करो," कालू काका ने कहा। वो आगे आए, उनकी कुबड़ी कमर झुकी हुई थी, पर आँखें साफ़ थीं। "मैं तेरे साथ चलूँगा। ये अखाड़ा है, बेटा। यहाँ के कोने-कोने में मेरा पसीना सूखा पड़ा है। मैं जानता हूँ कौन-सी दीवार में कौन-सा दरवाज़ा छिपा है।"
"काका—"
"मैं बीस साल चुप रहा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो काँपती हुई बात थी जो पुरानी हो चुकी हो। "अब नहीं रहूँगा। चाहे जो हो जाए।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके हाथ काँप रहे थे, पर उनकी ठुड्डी ऊपर थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "काका मेरे साथ। बाकी सब यहीं।"
"मैं भी," टिंकू ने कहा, और वो अपनी कान के पीछे वाली पेंसिल निकालकर जेब में रखने लगा जैसे कोई तलवार म्यान में डाल रहा हो।
"टिंकू—"
"भाई, मैं तेरा भाई हूँ।" उसने मेरी आँखों में देखा। "आधा भाई पीछे नहीं रहता। अगर तू अंदर जाएगा और मैं यहाँ खड़ा रहूँगा, तो मैं ज़िंदा रहकर भी मरा हुआ रहूँगा।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने उसका कंधा थामा।
मीरा आगे आई। उसने अपना बैग उठाया।
"मेरे पास हरी शीशी है," वो बोली, बहस की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। "अगर किसी को बेहोशी आई तो काम आएगी। मैं साथ चलूँगी।"
"मीरा—"
"वीर सिंह," उसने मेरी आवाज़ की नकल नहीं की, बस सीधे देखा। "तुमने मुझसे वादा किया था कि अकेले नहीं लड़ोगे। आज वो वादा पूरा करने का दिन है।"
मैं चुप हो गया।
चौकीदार हमारी बातें सुन रहा था, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान अब भी थी, पर थोड़ी सिकुड़ गई थी। जैसे उसे लगा था कि मैं अकेला आऊँगा, और अब चार आ रहे हैं।
"अंदर आने की इजाज़त है?" मैंने उससे पूछा।
"मालिक ने कहा था—"
"मैंने पूछा, इजाज़त है?"
उसने एक पल सोचा। फिर उसने लाठी उठाई और दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया।
"अंदर," वो बोला। "पर हथियार बाहर छोड़कर।"
मैंने अपनी कमर में खोंसी लाठी बाहर निकाली और ज़मीन पर रख दी। टिंकू ने अपनी पेंसिल — जो उसने अभी जेब में रखी थी — निकालकर मेरी लाठी के पास रख दी। मीरा ने अपना बैग नहीं छोड़ा। कालू काका के पास कुछ नहीं था, बस उनकी लाठी थी जो उन्होंने दीवार के सहारे खड़ी कर दी।
चौकीदार ने दरवाज़ा खोला।
अंदर अँधेरा था। बड़ा-सा आँगन, चारों तरफ़ ऊँची दीवारें, और बीच में रोशनी की एक पतली पट्टी जो छत के शीशे से आ रही थी। उस रोशनी में धूल के कण तैर रहे थे। फ़र्श पर लाल मिट्टी बिछी थी — वैसी ही लाल, जैसी रणवीर अखाड़े में। पर यहाँ मिट्टी सूखी थी, किसी ने उसे छुआ नहीं था, किसी ने उसे सींचा नहीं था।
मेरे पैर मिट्टी पर पड़े, और मैंने गहरी साँस ली।
गंध आई। पुरानी मिट्टी, सूखी घास, ठंडी दीवारें — और उसके नीचे, बहुत नीचे, कुछ और। मैंने नाक भींची और पहचानने की कोशिश की। कपूर। बादाम का तेल। जली हुई लकड़ी। और… मिट्टी का तेल। बहुत पुराना मिट्टी का तेल, जो दीवारों में रच गया हो जैसे कोई बरसों पहले यहाँ दीया जलाता रहा हो।
"काका," मैंने धीरे से कहा। "ये अखाड़ा कितना पुराना है?"
कालू काका मेरे पीछे आए। उन्होंने चारों तरफ़ देखा, और उनकी आँखें किसी पुरानी किताब के पन्नों की तरह खुल गईं।
"ये अखाड़ा तो…" उन्होंने धीरे से कहा। "ये तो रणवीर अखाड़े से भी पुराना है। मैंने सुना था कि यहाँ पहले एक बरगद का पेड़ था, और उसके नीचे साधु बैठते थे। फिर किसी राजा ने यहाँ अखाड़ा बनवाया।"
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