Spirit of a Fighter – Chapter 1059
काका ने साँस खींची। "कुआँ बंद है। उस पर पत्थर है।"
"पर पत्थर के नीचे हवा है," गुड़िया ने कहा। "मुझे यहाँ से टपकता पानी सुनाई दे रहा है। और मुझे हवा महसूस हो रही है। अगर हवा आ रही है, तो रास्ता भी है।"
काका उसकी तरफ़ देखते रह गए।
"ये लड़की…" उन्होंने धीरे से कहा, "ये भवानी की नहीं है। ये तेरी माँ की है।"
मैंने गुड़िया को देखा। और मुझे मेरी माँ याद आई — चक्की पर बैठी, और उनकी आँखों में वही ज़िद।
"काका," मैंने कहा। "कुएँ तक का रास्ता है?"
"हाँ," काका बोले। "पर वो पत्थर भारी है। हम चारों मिलकर भी…"
"हम चारों नहीं," मैंने कहा। "हम ऊपर कुछ और हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "मतलब?"
मैंने अपनी बनियान की जेब से पीतल की सीटी निकाली — वही जो करण ने पुल पर बजाई थी, जो उसने मुझे दी थी जब हम फूट-फूटकर रोए थे। मैंने उसे होंठों पर रखा और ज़ोर से बजाया।
तीन सीटी।
कुछ नहीं।
फिर…
दूर, बहुत दूर, सुरंग की दीवारों में से एक आवाज़ आई। जवाबी सीटी। दो बार।
मेरा दिल उछल गया।
"वो सुन रहे हैं," मैंने कहा। "वो हमें सुन रहे हैं।"
काका ने लालटेन ऊपर की। "पर वो कैसे आएँगे? वो सुरंग के दूसरे छोर पर हैं।"
"नहीं," मैंने कहा। "वो हमारे ऊपर हैं।" मैंने फर्श पर हाथ रखा। "ये सुरंग केवल एक नहीं है। ये रास्ता है। और ये रास्ता कहीं और से भी जाता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, तू क्या कह रहा है?"
"मैं कह रहा हूँ," मैंने कहा, और मैंने अपने घुटनों के नीचे की ज़मीन पर हाथ मारा, "कि हमें ऊपर जाना है। और ऊपर जाने का रास्ता सिर्फ़ वही जानते हैं जो इसे बना सकते हैं।"
मैंने फिर सीटी बजाई। एक लंबी, दो छोटी।
जवाब आया। तीन।
और फिर, दीवार के दूसरी तरफ़ से, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी — दबी हुई, पर साफ़।
"वीर सिंह!"
करण की आवाज़।
मैंने दीवार पर हाथ मारा। "करण! यहाँ!"
"पीछे हट," करण की आवाज़ आई। "और गुड़िया को दूर कर।"
मैंने गुड़िया को पकड़कर पीछे किया। मीरा और टिंकू दीवार से दूर हुए। काका लालटेन ऊँची किए खड़े रहे।
फिर दीवार में एक ईंट हिली। फिर दूसरी। फिर एक-एक करके ईंटें गिरने लगीं, और उनके बीच से एक पतला-सा रास्ता बना। धूल उड़ी, और मैंने अपनी आँखें सिकोड़ लीं।
जब धूल बैठी, तो सामने करण खड़ा था। उसके हाथों पर मिट्टी थी, कपड़े फटे थे, और माथे पर पसीना था।
"तू आ गया," मैंने कहा।
"तूने सीटी बजाई," उसने कहा। "मैं क्या करता?"
मैं उसके पास गया और उसे गले लगा लिया। उसने मेरी पीठ थपथपाई।
"भैया," गुड़िया ने कहा। "और ये कौन है?"
मैं पलटा। करण के पीछे दो और चेहरे थे। एक तो वही दीपक था, भवानी का शिष्य, जिसने पुल पर मुँह मोड़ा था। और दूसरा — एक बूढ़ा आदमी, बिना दाँत का, जिसकी आँखों में सफ़ेद परत थी।
"ये रामदीन के गाँव के हैं," करण ने कहा। "ये सुरंग जानते हैं। इन्होंने भवानी के साथ काम किया था।"
बूढ़े ने अपना हाथ बढ़ाया। "मैं चेतन," उसने कहा। "भवानी के साथ मज़दूरी करता था। जब उसने ये सुरंग बनवाई, मैं उसमें था।"
"तो ये बंद क्यों है?" मैंने पूछा।
"सुरंग बंद नहीं है," चेतन बोला। "ये दीवार नई है। इसे कुछ दिन पहले बनाया गया है।"
"किसने?"
"जिसके पास पैसा है और मज़दूर हैं," चेतन ने कहा। "ठाकुर।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"पर तुम अंदर कैसे आए?" मैंने करण से पूछा।
"मैं सुरंग के दूसरे मुँह से आया," करण ने कहा। "वो जो नदी के किनारे है। मैं गाँव वालों के साथ था। जब तुम सुरंग में उतरे, तो मैंने सोचा कि तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा। मैंने बाहर से रास्ता लिया।"
"और तुम्हें इनका पता कैसे?"
करण ने चेतन की तरफ़ देखा। "ये मुझे रास्ते में मिले। ये भी सुरंग में आने वाले थे।"
चेतन ने अपना सिर झुकाया। "मुझे भवानी की क़सम, मैं ये दीवार देखने आया था। मैंने सुना था कि इसे बंद कर दिया गया है। मैं जानता था कि यहाँ से रास्ता जाता है।"
"तो अब?" मीरा ने कहा। "ये दीवार?"
"ये दीवार नई है," चेतन बोला। "नई दीवार कमज़ोर होती है।"
करण ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, तेरे पास ताक़त है। मेरे पास भी। दीपक के पास भी। हम तीनों मिलकर…"
"नहीं," मैंने कहा। "ये दीवार गिरानी नहीं है।"
"तो फिर?"
"इसे खोलना है।" मैंने चेतन की तरफ़ देखा। "तुमने भवानी के साथ काम किया है। तुम जानते हो कि ये दीवार कहाँ से खुलेगी?"
चेतन ने दीवार पर हाथ फिराया। उसकी उँगलियाँ ईंटों पर रेंगीं, फिर रुकीं।
"यहाँ," उसने कहा। "ये नीचे की तीन ईंटें ढीली हैं। अगर इन्हें निकाल दें, तो ऊपर का रास्ता खुल जाएगा।"
"तो निकालो," मैंने कहा।
हमने काम शुरू किया।
करण और दीपक ने ईंटों पर हाथ लगाए, और मैंने उनके साथ। चेतन ने हमें रास्ता दिखाया। मीरा ने गुड़िया को पीछे किया, और टिंकू ने लालटेन ऊँची पकड़ी। कालू काका दीवार के पास खड़े होकर हमें देखते रहे, और उनके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे — कोई दुआ, या कोई नाम।
तीन ईंटें निकलीं। फिर चार। फिर एक और।
और अचानक हवा बदली।
तीव्र, ठंडी हवा हमारे चेहरों पर आई, और मैंने आँखें बंद कर लीं। जब खोलीं, तो सामने एक खुला रास्ता था। ऊपर की तरफ़ जाता हुआ।
"सीढ़ियाँ," करण ने कहा।
"नहीं," चेतन बोला। "पत्थर के खूँटे। भवानी ने इन्हें बनवाया था। कुएँ तक सीधे जाता है।"
मैंने पलटकर सबको देखा।
"माँ," मैंने कहा। "तुम पहले।"
"नहीं," माँ बोलीं। "तू पहले।"
"माँ—"
"मैं तेरे पीछे आऊँगी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो दृढ़ता थी जो मैं जानता था। "पर पहले तू। तू मेरा बेटा है, और मैं तेरे पीछे चलूँगी।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। और मैंने सिर हिलाया।
मैं पहले चढ़ा। पत्थर के खूँटे ठंडे थे, और मेरे हाथ फिसल रहे थे। मैंने अपनी पकड़ मज़बूत की और ऊपर बढ़ा।
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। "भैया, अगर मैं गिरा तो मेरी मिठाई की दुकान तेरी।"
"तू मत गिर," मैंने कहा। "मुझे तेरी मिठाई नहीं चाहिए। मुझे तू चाहिए।"
टिंकू चुप हो गया। फिर बोला, "ये तूने अच्छी बात कही।"
मैं हँसा। और मेरी हँसी में कुछ गरम था।
हम ऊपर चढ़ते रहे। पत्थर के खूँटे खत्म हुए, और सामने एक लोहे की जाली दिखी। उसके पार से रोशनी आ रही थी — हल्की, सुनहरी, शाम की।
"कुएँ का मुँह," चेतन ने कहा। "ये जाली उठानी होगी।"
मैंने जाली पर हाथ रखा। भारी थी, ज़ंग लगी थी। मैंने ज़ोर लगाया। करण ने मेरा हाथ पकड़ा और साथ खींचा। दीपक ने भी। जाली हिली, चरमराई, और फिर ऊपर उठ गई।
रोशनी मेरे चेहरे पर आई।
मैं बाहर निकला।
कुएँ का मुँह खुला था, और उसके चारों तरफ़ अखाड़े की लाल मिट्टी थी। दूर, आँगन में, पहलवान कसरत कर रहे थे। किसी ने मुझे नहीं देखा।
मैंने हाथ बढ़ाकर माँ को बाहर निकाला। फिर गुड़िया को। फिर मीरा को। फिर टिंकू को। फिर काका को।
हम सब कुएँ के किनारे खड़े थे, साँस फूल रही थी, कपड़े मिट्टी से भरे थे, और मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
सूरज ढल रहा था। आसमान नारंगी और गुलाबी था, और वो रंग अखाड़े की लाल मिट्टी पर पड़ रहा था।
"शहर कितनी दूर है?" मैंने पूछा।
"पाँच कोस," करण ने कहा। "पर रास्ता सीधा है।"
"तो चलो," मैंने कहा।
हम चले।
अखाड़े के पिछले दरवाज़े से बाहर निकले, और सड़क पर आए। गाँव वाले सड़क के किनारे इकट्ठे थे — वही लोग जो पुल पर आए थे, और जो नहीं आए थे, वो भी।
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