Spirit of a Fighter – Chapter 1056
कुछ लोग हँसे। कुछ ने सिर हिलाया। एक बूढ़ा आदमी — जिसे मैं जानता था, वो रामदीन का भाई था — आगे आया।
"बता क्या करना है," वो बोला।
और फिर काम शुरू हुआ।
पाँच आदमी रस्सियाँ लेकर पानी के किनारे गए। तीन आदमी लकड़ी की मोटी डंडियाँ लेकर आए। दो औरतें मशालें जलाने लगीं ताकि पानी के ऊपर रोशनी रहे। एक लड़का — शायद बारह-तेरह साल का — रस्सी के एक सिरे को एक पेड़ से बाँधने लगा।
मैं पुल के टूटे किनारे पर खड़ा था और पानी देख रहा था। पानी अब भी तेज़ बह रहा था, पर उसका रंग बदल रहा था। अब वो काला नहीं था — उसमें मिट्टी का पीलापन आ रहा था। और उस पीलापन में मुझे वो गंध और साफ़ लग रही थी।
जली लकड़ी। बंद कमरा। और… पानी के नीचे किसी चीज़ का गरम होना। जैसे वहाँ कोई दीया जल रहा हो, बहुत गहरे, पानी के नीचे।
"कालू काका," मैंने कहा। "वो सुरंग। जो कोठे से नहर के उस पार आती थी। उसकी कोई शाखा इधर भी आती है?"
कालू काका ने अपनी लालटेन उठाई। उसकी रोशनी में उनका चेहरा अजीब लग रहा था — आधा रोशनी में, आधा अंधेरे में।
"सुरंग एक नहीं थी," वो बोले। "तीन थीं। एक कोठे से नहर के उस पार जाती थी। दूसरी अखाड़े के तहखाने से कुएँ तक। और तीसरी…"
वो रुके।
"तीसरी कहाँ जाती थी, काका?"
"तीसरी वो थी जो सबको जोड़ती थी। कोठा, अखाड़ा, नहर। और उसका मुँह…" उन्होंने नीचे, पानी की तरफ़ देखा, "उसका मुँह यहीं था। इसी पुल के नीचे।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"तो ठाकुर ने पुल इसलिए तोड़ा?"
"नहीं," कालू काका ने सिर हिलाया। "ठाकुर ने पुल इसलिए तोड़ा ताकि हम रुक जाएँ। उसे नहीं पता कि उसने हमारे लिए रास्ता खोल दिया।"
मैंने उन्हें देखा। और फिर मैं हँस पड़ा। ज़ोर से। इस तरह हँसा कि मेरे पेट में दर्द हो गया।
"तो ठाकुर ने अपने हाथ से हमारा रास्ता बना दिया," मैंने कहा। "उसे लगा वो हमें रोक रहा है। और उसने हमारे लिए दरवाज़ा खोल दिया।"
टिंकू मेरे पास आया। उसकी टोकरी अब भी उसके सिर पर थी। उसने टोकरी से एक लड्डू निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"खा ले," उसने कहा। "पानी में उतरने से पहले।"
"टिंकू, मुझे भूख नहीं—"
"मैंने पूछा नहीं कि भूख है या नहीं।" उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। "मैंने कहा खा ले। तू पानी में उतरेगा, ठंड लगेगी, तेरा शरीर काँपेगा। भूखा आदमी पानी में नहीं टिकता। मैं जानता हूँ। मैं खाना बनाता हूँ।"
मैंने लड्डू लिया। उसे खाया। उसमें घी की गंध थी और उसमें वो मिठास थी जो सिर्फ़ टिंकू की मिठाई में होती थी। मैंने उसे पूरा खाया।
"अच्छा है," मैंने कहा।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा, और उसका सीना थोड़ा फूल गया।
फिर वो अपनी टोकरी सिर पर रखकर पानी की तरफ़ बढ़ा।
"टिंकू!" मैंने रोका। "तू कहाँ?"
"रास्ता दिखाने," उसने कहा, और वो पानी में उतरने लगा। घुटनों तक। फिर कमर तक।
"टिंकू, रुक! पानी तेज़ है!"
"मुझे तैरना नहीं आता," उसने पीछे मुड़कर कहा। "पर मुझे मिठाई गलाना आता है। और मुझे पता है कि पानी के नीचे कहाँ मीठा है, कहाँ खारा। तू मेरे पीछे आ।"
मैं उसे देखता रह गया।
वो पानी में खड़ा था, घुटनों तक, टोकरी सिर पर, और उसकी टोपी पानी से भीग रही थी। और वो मुस्कुरा रहा था।
"अरे, और एक बात," उसने कहा। "रास्ता मैं दिखाऊँगा, पर पहले एक लड्डू और खा। तेरे हाथ काँप रहे हैं।"
"टिंकू—"
"भैया!"
मैं पलटा।
गुड़िया भीड़ से निकलकर दौड़ी आ रही थी। उसके हाथ में अब भी वो एक चप्पल थी, और उसका चेहरा लाल था।
"भैया, मैं भी चलूँगी!"
"नहीं," मैंने कहा। "तू माँ के पास—"
"माँ ने भेजा है!" उसने कहा, और वो मेरे सामने आकर रुकी। "माँ ने कहा — जा, अपने भैया के साथ जा। अगर वो पानी में उतरे, तो तू किनारे पर खड़ी रह। और अगर वो डूबे, तो चिल्लाना। माँ ने कहा कि तेरी आवाज़ सबसे तेज़ है।"
मैंने पीछे देखा। माँ भीड़ में खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया। बस एक बार।
मेरा गला भर आया।
"ठीक है," मैंने गुड़िया से कहा। "पर तू किनारे पर रहेगी। पानी में एक कदम भी नहीं।"
"पर भैया—"
"गुड़िया।" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "मैं तुझे खो नहीं सकता। अगर तू किनारे पर रहेगी, तो मुझे पता रहेगा कि लौटकर किसके पास आना है। समझी?"
उसने मेरी आँखों में देखा। फिर उसने सिर हिलाया।
"पर अगर तू डूबा," वो बोली, "तो मैं चिल्लाऊँगी। बहुत ज़ोर से।"
"वादा?"
"वादा।"
मैंने उसका सिर चूमा। फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अपनी कमर पर बँधी रस्सी को कस रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
"मैं तैयार हूँ," वो बोली।
मैंने अपनी रस्सी पकड़ी। कालू काका ने और दो आदमियों के साथ उसे पेड़ से बाँध दिया।
"जब मैं रस्सी खींचूँ," मैंने कहा, "तो खींचना। तीन बार।"
"तीन बार," कालू काका ने दोहराया।
मैंने पानी की तरफ़ देखा। टिंकू अब भी वहीं खड़ा था, कमर तक पानी में, टोकरी सिर पर। वो मेरी तरफ़ देख रहा था।
"अब आया?" उसने कहा।
"आया," मैंने कहा।
और मैं पानी में उतरा।
पहला कदम पड़ते ही मेरे पैरों में ठंडक दौड़ गई। पानी ठंडा नहीं था — वो गरम था। गरम और मटमैला। जैसे किसी ने ऊपर से उबलता पानी डाल दिया हो और वो नीचे ठंडे पानी से मिल रहा हो।
मैंने मीरा को देखा।
"ये गरम क्यों है?" मैंने पूछा।
उसने पानी में हाथ डाला। फिर उसने अपनी उँगलियाँ सूँघीं।
"नीचे कुछ जल रहा है," वो बोली। "या कुछ ऐसा है जो गरमी दे रहा है। ये नहर का पानी नहीं लग रहा। ये किसी और जगह से आ रहा है।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। और मैंने सूँघा।
पानी के ऊपर: मिट्टी, पसीना, धुआँ।
पानी के नीचे: जली लकड़ी, गरम पत्थर, और… कुछ और। कुछ ऐसा जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघा था। एक धातु की गंध। पीतल की। और उसमें एक मीठी-सी गंध — जैसे कोई दीया जल रहा हो घी से।
"कालू काका!" मैंने पीछे मुड़कर कहा। "पानी के नीचे पीतल है। और घी जल रहा है!"
कालू काका का चेहरा बदल गया। वो पानी के किनारे आए और उन्होंने अपनी लालटेन ऊँची की। उसकी रोशनी पानी पर पड़ी और मुझे कुछ दिखा — बहुत गहरे में, बहुत नीचे, एक हल्की-सी पीली चमक।
"वो दीया है," कालू काका ने धीरे से कहा। "वो तहखाने का दीया है। जो बीस साल से जल रहा है।"
"बीस साल से?" मीरा ने पूछा। "पानी के नीचे दीया कैसे जल सकता है?"
"वो दीया पानी के नीचे नहीं है," कालू काका ने कहा। "वो दीये के ऊपर पानी है। दीया उस कमरे में है जो पानी के नीचे बना है। और उस कमरे में हवा है। बीस साल से हवा है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"काका, आपको ये सब पता था?"
वो मेरी तरफ़ देखते रहे। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा — शर्म।
"मुझे पता था," वो बोले। "पर मैं डर गया था। बीस साल पहले जब भवानी उतरा था, तो मैंने उसे रोका नहीं। मैं किनारे पर खड़ा रहा। और जब वो लौटा, तो उसके हाथ में वो दीया था। उसने कहा था — कालू, ये दीया उस कमरे में जला था, जहाँ किसी ने बहुत साल पहले साधना की थी। और ये दीया कभी नहीं बुझेगा।"
"तो वो दीया आज भी जल रहा है?"
"वो दीया आज भी जल रहा है। और वो दीया भैरव का नहीं है, वो दीया उस मिट्टी का है जो तहखाने में है। जो मिट्टी जले नहीं, सिर्फ़ ताकत दे।"
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