Spirit of a Fighter – Chapter 1055
मेरी साँस रुक गई।
उस पल मुझे कुछ सूंघाई दिया।
पानी के नीचे से। गहरे से। जली लकड़ी की गंध। और गीली मिट्टी की — पर वो मिट्टी नहर किनारे वाली नहीं थी। वो मिट्टी अलग थी। उसमें एक पुराना-सा, बंद कमरे वाला दम था।
मैं और झुका। पानी के करीब। और फिर मुझे वो भी सूंघाई दिया — धुआँ। बहुत पुराना धुआँ। जैसे किसी ने बहुत साल पहले यहाँ आग जलाई हो और वो आग आज तक पानी के नीचे सुलग रही हो।
"कालू काका!" मैंने पीछे मुड़कर आवाज़ दी। "कालू काका, कहाँ हो?"
वो भीड़ में से निकलकर आए। उनकी लालटेन अब भी जल रही थी — उन्होंने उसे मेरे पीछे-पीछे लाकर यहाँ तक बचाए रखा था। उनकी दाढ़ी धूल से भरी थी। वो मेरे पास खड़े हो गए और मेरी आँखों में देखा।
"क्या पाया?" उन्होंने धीरे से पूछा।
"काका, पानी के नीचे कुछ है। जली लकड़ी। पुरानी मिट्टी। ऐसी मिट्टी जो बंद जगह की होती है।"
कालू काका ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिले। फिर उन्होंने आँखें खोलीं और उनमें वो चमक आई जो मैंने पहले भी कभी-कभी देखी थी।
"बीस साल पहले," वो बोले, "भवानी भी यहीं फँसा था। इसी पुल पर। उस रात भी पुल का आधा हिस्सा टूटा था। और उसने भी यही किया था।"
"क्या किया था?"
"उसने पानी में देखा था। और फिर वो पानी में उतर गया था।" कालू काका ने नहर की तरफ़ इशारा किया। "उसने कहा था, कालू, पुल नहीं, रास्ता चाहिए। और रास्ता हमेशा नीचे होता है।"
मैंने कालू काका को देखा। उनका चेहरा उस लालटेन की रोशनी में पीला पड़ रहा था, पर उनकी आवाज़ में कोई कँपकँपी नहीं थी।
मैंने फिर पानी की तरफ़ देखा। और मुझे याद आया — जब हम कालू काका के साथ सुरंग से आए थे, तो वो सुरंग भी एक कोठे के नीचे से निकलकर नहर के उस पार आती थी। उस सुरंग की कुछ शाखाएँ थीं जो हमने नहीं देखीं। शायद उनमें से एक यहाँ आती है। पुल के ठीक नीचे। पानी के नीचे।
"मीरा," मैंने कहा।
वो मेरे पास ही थी। उसका बैग कंधे से फिसलकर हाथ में आ गया था, पर वो उसे पकड़े खड़ी थी। उसके बाल धूल से भरे थे और गाल पर एक खरोंच थी — पुल टूटते वक़्त कोई लकड़ी उसे छू गई थी।
"मैंने सुना," वो बोली। "पर वीर, ये सोच लो। पानी बहुत तेज़ है। अभी पुल टूटा है, पानी का बहाव बदल गया है। नीचे क्या है, कोई नहीं जानता। जोखिम बहुत बड़ा है।"
"जोखिम तो तब भी था," मैंने कहा, "जब मैं अखाड़े के बाहर खड़ा होता था और अंदर मिट्टी की गंध आती थी। जोखिम तो तब भी था जब मैंने पहली बार कुएँ की सीढ़ियाँ उतरी थीं। मैंने कभी जोखिम देखकर काम नहीं छोड़ा।"
वो मेरी आँखों में देखती रही। फिर उसने अपना बैग कंधे पर लटकाया और उसकी पट्टी कसी।
"ठीक है," वो बोली। "पर एक शर्त है। पानी में मैं पहले उतरूँगी।"
"मीरा—"
"नहीं, सुनो। मैं तैरना जानती हूँ, तुम्हें नहीं आता। और मैंने आयुर्वेद में साँस के बारे में पढ़ा है। मैं बता सकती हूँ कि पानी के नीचे कौन-सी सड़ी गंध ज़हर है और कौन-सी सिर्फ़ मिट्टी की। तुम्हारी नाक अच्छी है, पर मेरे पास किताब है।"
मैं हँसा। इतने तनाव में भी हँसी आ गई। "तुम्हारी किताब। पानी के नीचे।"
"किताबें कहीं भी पढ़ी जा सकती हैं," उसने कहा, और उसके होठों पर वो हल्की-सी मुस्कान आई जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी।
तभी मेरी कमर पर एक हाथ पड़ा।
मैं पलटा।
माँ खड़ी थी।
उनके कपड़े अब भी धूल से भरे थे। उनका हल्दी का टीका टूटा हुआ था और माथे पर सिर्फ़ पीली लकीर बची थी। पर वो खड़ी थीं। अपने पैरों पर। किसी के सहारे के बिना।
"माँ," मैंने कहा। "आप यहाँ क्यों— आपको आराम करना चाहिए। आप अभी—"
"चुप।" उन्होंने एक शब्द में रोक दिया। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और मेरा हाथ पकड़ लिया।
उनके हाथ सूखे थे। चक्की चलाने वाले हाथ। हथेली पर वो गाँठें थीं जो मैंने बचपन से देखी थीं। पर आज उनकी पकड़ में कुछ और था। कुछ जो मैंने पहले महसूस नहीं किया था।
"मैंने तुझे भूखा पाला," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो दम था जो अखाड़े के पहलवानों में भी नहीं था। "चार बजे उठकर चक्की चलाई। तेरी बहन के लिए कॉपी खरीदी। तेरे लिए उस शेर सिंह की याद रखी जो तेरा बाप नहीं था पर तेरे लिए मर गया। मैंने तुझे भूखा पाला, वीर।"
मेरी आँखें जलने लगीं।
"पर आज," उन्होंने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा, "तू पूरे गाँव का पेट भरेगा। जा।"
मैंने उनका हाथ देखा। फिर उनका चेहरा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थीं। वो मुझे देख रही थीं — वैसे ही जैसे अखाड़े की दीवार पर लगी पुरानी तस्वीरों में औरतें अपने बेटों को देखती थीं।
"माँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट रही थी। "अगर मैं लौटा नहीं—"
"तू लौटेगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरी माँ ने आज तक किसी चीज़ के लिए रो-रोकर नहीं माँगा। और मैं आज भगवान से माँग रही हूँ — तेरा हाथ, तेरी नाक, तेरी मिट्टी — सब सही सलामत लौटा।"
उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा। और फिर वो पीछे हटीं और भीड़ में खड़ी हो गईं।
मैंने पलटकर पानी देखा।
और तभी मुझे एक और आवाज़ सुनाई दी।
"भैया!"
मैं घूमा।
गुड़िया भीड़ को चीरती हुई दौड़ी आ रही थी। उसकी दोनों चोटियाँ खुल गई थीं, स्कूल की कॉपी उसके हाथ में नहीं थी, और उसके पैरों में एक चप्पल थी। वो सीधे मेरे पास आई और मेरी कमर से लिपट गई।
"तू मरेगा नहीं?" उसकी आवाज़ रुँधी थी। "वो बोलता था न कि अगर तू आएगा तो—"
"गुड़िया," मैंने उसका सिर सहलाया। "वो काग़ज़ मैंने पढ़ लिया। और मैं आ गया। देख, मैं यहाँ हूँ।"
वो मेरे सीने से चिपकी रही। उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसे अपने से थोड़ा अलग किया और उसका चेहरा देखा।
"अब सुन," मैंने कहा। "तू माँ के पास जा। और माँ को अकेला मत छोड़ना। समझी?"
"पर भैया—"
"गुड़िया।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "तू मेरी सबसे बड़ी ताकत है। तू माँ के पास रहेगी, तो मैं निडर लड़ूँगा।"
उसने अपने आँसू पोंछे। फिर उसने मेरी जेब में कुछ डाला। मैंने देखा — अखाड़े की लाल मिट्टी की एक छोटी थैली। वही जो वो चुपके से भरकर रखती थी।
"आज इसे जेब में रख," वो बोली। "मैंने इसे तेरे लिए तीन दिन सुखाया है।"
वो पलटी और भीड़ की तरफ़ भाग गई। मैंने उसे जाते देखा। फिर मैंने थैली को जेब से निकालकर माथे पर लगाया। मिट्टी की गंध आई। लाल मिट्टी। अखाड़े वाली मिट्टी।
और उस पल मुझे लगा कि मेरे पैरों में कुछ और ताकत आ गई।
मैंने पानी की तरफ़ देखा।
"रस्सी चाहिए," मैंने कहा। "मोटी रस्सी। दो। और कोई मज़बूत लकड़ी।"
टिंकू मेरे पास आया। उसके हाथ में कुछ नहीं था, पर उसके सिर पर एक टोकरी थी। मिठाई की टोकरी। वो उसे लेकर आया था।
"रस्सी कहाँ से लाएँगे?" उसने पूछा।
"गाड़ी से," कालू काका बोले। "बैलगाड़ी में रस्सी होती है। दो-तीन गाड़ियाँ हैं पीछे।"
"और लकड़ी?"
"पुल के टुकड़े," मैंने कहा। "जो पानी में तैर रहे हैं। वो मज़बूत हैं। उन्हीं से सहारा बनाएँगे।"
मैंने पीछे देखा। गाँव के लोग, जो अभी डर से पीछे हट गए थे, फिर से आगे आ रहे थे। एक-दो नहीं, पूरा गाँव। बूढ़े, जवान, औरतें, बच्चे। किसी के हाथ में लाठी थी, किसी के हाथ में रस्सी, किसी के हाथ में मशाल।
"सब सुनो," मैंने आवाज़ उठाई। "ठाकुर ने पुल तोड़ दिया। पर ये पुल हमारा था, ये रास्ता हमारा था। और हम रास्ता बनाना जानते हैं। हम ईंट ढोने वाले हैं — हम पुल बनाना भी जानते हैं।"
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