Spirit of a Fighter – Chapter 1054
और मैंने अपने दिल में एक आवाज़ सुनी — वो आवाज़ जो माँ के हाथ की चक्की सुनते हुए आती थी। मुझे लगा कि अगर ये रस्सी आज कट गई, तो मैं फिर कभी माँ के हाथ की दाल नहीं खा पाऊँगा।
मैंने उछलकर उस आदमी की कलाई पकड़ी।
वो चीखा। औज़ार उसके हाथ से छूटकर पानी में गिरा। मैंने उसे पीछे धकेला और खुद रस्सी पर गिर पड़ा, दोनों हाथों से उसे अपनी छाती से चिपका लिया, जैसे कोई बच्चा चादर पकड़ता है।
"रस्सी बची है!" हरनाम चिल्लाया। "रस्सी बची है! सब पीछे हटो, लकड़ी के किनारे मत खड़े हो!"
करण ने उस पतले आदमी को घुटनों के बल गिरा दिया। उसका कपड़ा उसके मुँह से खिसक गया। मैंने उसका चेहरा देखा — छोटी आँखें, कटा हुआ होठ, माथे पर पुराना निशान। मैंने उसे पहले कहीं देखा था।
"ये वही है," करण ने हाँफते हुए कहा। "जो बस में मेरे पास बैठा था। जिसने मुझे पानी की बोतल दी थी।"
भीड़ में से एक बूढ़ी औरत आगे आई। उसने उस आदमी का चेहरा देखा और उसके हाथ से उसका थैला गिर गया।
"ये तो…" उसकी आवाज़ रुँध गई। "ये तो ठाकुर का भतीजा है। ये तो मेरे बेटे के साथ बाज़ार जाता था। मेरा बेटा भी बीमारी से मरा था।"
वो औरत अपने घुटनों पर बैठ गई। उसने अपना मुँह हाथों से ढक लिया।
करण ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भावना आई जो पहले नहीं थी — गुस्सा नहीं, कुछ और। दुख, जो दूसरों का होकर भी अपना लगता है।
वो उस औरत के पास गया। उसने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"मैं जानता हूँ," वो धीरे से बोला। "मेरी माँ भी उसी बीमारी से मरी थी। मैं तेरह साल का था। मुझे उस दिन भी लगा था कि कोई मुझे बता दे कि ये बीमारी नहीं, किसी का हाथ है।"
औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसके आँसू उसकी उँगलियों पर गिरे।
"अब पता चल गया," उसने कहा। "अब पता चल गया।"
मैं वहीं खड़ा था, हथेली में शीशी दबाए, और मेरी आँखें भर आईं। टिंकू मेरे पास आया। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस मेरा कंधा पकड़ लिया, और उसकी पकड़ में वो सारी बातें थीं जो कभी हमने एक-दूसरे को नहीं बताई थीं।
हरनाम ने भीड़ की तरफ़ मुड़कर अपना हाथ उठाया।
"सुनो सब!" उसकी आवाज़ में पहली बार किसी पहलवान जैसी ताक़त आई। "मैं हरनाम हूँ। जो तुम लोगों की बीमारी का हिसाब रखता था। मैंने झूठ बोला। मैंने ठाकुर के कहे पर हर मौत को बीमारी का नाम दिया। मेरे पास उनकी परचियाँ हैं। मेरे पास तारीख़ें हैं। जो जानना चाहे, आज ही जान ले। मैं आज से किसी के लिए झूठ नहीं लिखूँगा।"
भीड़ में आवाज़ें उठीं। कोई चिल्लाया, कोई रोया, कोई हरनाम के पास आया। बूढ़े आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया। औरतें उसके चारों तरफ़ घेरा बना रही थीं।
मैं करण के पास गया। वो पुल के किनारे खड़ा था, पानी की तरफ़ देख रहा था, और उसका सीना धक-धक कर रहा था। थकान उसके चेहरे पर साफ़ लिखी थी।
मैं उससे कुछ कहने ही वाला था कि वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
फिर वो कुछ ऐसा कर गया जो मैंने सोचा भी नहीं था।
वो झुका।
और मेरे पैर छू लिए।
मैं सन्न रह गया। मेरा पूरा शरीर जकड़ गया। मैंने पीछे हटने की कोशिश की, पर वो मेरे पैरों को पकड़े हुए था।
"करण! करण, उठो! ये क्या कर रहे हो?" मेरी आवाज़ फट गई। "लोग देख रहे हैं!"
"देखने दो," उसने अपना सिर नीचा रखे हुए कहा। "मैं जानता हूँ कि तुम क्या सोचते हो। तुम सोचते हो कि मैं तुम्हारा कुछ नहीं हूँ। पर तुमने मुझे उस बस से निकाला। तुमने मुझे अपना नाम दिया। तुमने मेरी माँ को उस ज़मीन पर लिटाया जिस पर उसका हक़ था।"
"मैंने कुछ नहीं किया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी।
"तुमने मुझे बचाया," उसने कहा, और अब उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रहा था। "अब मैं तुम्हारे साथ लड़ूँगा। जहाँ तुम कहोगे, जब तुम कहोगे। और अगर आज के बाद मैंने तुम्हारे साथ कभी धोखा किया, तो मुझे उसी मिट्टी में मिला देना जिसमें मेरी माँ है।"
मैं झुका। मैंने उसके हाथ अपने पैरों से हटाए और उसे उठाया।
मैं उससे लिपट गया।
मैंने कभी किसी आदमी से ऐसे नहीं लिपटा था। मेरे पिता से भी नहीं। पर उस पल मुझे लगा कि अगर मैं उसे नहीं पकड़ूँगा तो कुछ टूट जाएगा।
"मुझे पैर मत छूना," मैंने उसके कान में कहा। "मेरे पैरों में वही मिट्टी है जो तेरे पैरों में है। हम दोनों ईंट ढोने वाले हैं। पैर छूना उन्हें देना जो हमें ढोते हैं।"
वो हँसा। रुँधी हुई, टूटी हुई हँसी। और उसके काँधे मेरी बाँहों में हिलने लगे।
॥
टिंकू के कंधे मेरी बाँहों में हिल रहे थे, और मैं उसे पकड़े हुए यही सोच रहा था कि अब क्या — कि तभी नीचे से एक आवाज़ आई।
पहले मुझे लगा पानी है। फिर समझ आया — ये पत्थर की आवाज़ है, चटकने की।
मैंने पीछे देखा। पुल के बीच का हिस्सा, वो मोटी लकड़ी और पत्थर की पट्टी जिस पर अभी-अभी इतने लोग खड़े थे, ज़ोर से काँप रही थी। उसके नीचे से धूल के बादल उठ रहे थे।
"हटो!" मैंने चिल्लाकर कहा। "सब पीछे हटो!"
पर बात बहुत देर से समझ आई थी।
एक ऐसी आवाज़ आई जो कानों को बहरा कर दे। पहले मुझे लगा कुछ फटा है, फिर लगा मेरे ही सिर के अंदर कुछ टूटा है। पुल का बीच का हिस्सा नीचे की तरफ़ झुका और पूरा का पूरा पानी में गिर गया। पत्थर, लकड़ी, धूल, सब एक साथ। पानी इतनी ऊँची लहर मारकर उठा कि पुल के किनारों तक पहुँच गया और मेरे पैर धो गया।
लोग चीखे। कोई गिरा, कोई भागा। मैंने पीछे मुड़कर देखा — गाँव के लोग पुल के किनारे वाली सड़क पर पीछे हट रहे थे, एक-दूसरे को गिरा रहे थे। एक बूढ़ी औरत अपनी पोती को सीने से लगाए बैठी थी। एक आदमी का बैल भाग गया और वो उसके पीछे दौड़ा।
अब नीचे ऊपर, दोनों तरफ़ पानी था। और बीच में सिर्फ़ टूटी लकड़ियाँ तैर रही थीं।
और उस पार — ठाकुर महेंद्र सिंह अपने पचास आदमियों के साथ खड़ा था।
वो हँसा। ज़ोर से, खुलकर, जैसे किसी ने उसके हाथ में मिठाई रख दी हो।
"देख लिया, वीर सिंह?" उसने अपने आदमियों की तरफ़ हाथ फैलाया। "तुम्हारे गाँव की मेहनत से बना पुल। बीस साल से यही पुल तुम सबको जोड़ रहा था। और ये पुल भी मेरा था — मैंने बनवाया था, मेरे पैसों से। मैंने काट लिया।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए। मेरे नाखून हथेली में धँस गए।
"अब न आगे जा सकते हो, न पीछे," ठाकुर ने आवाज़ ऊँची की। "मैं शहर जा रहा हूँ। वहाँ मेरे लिए रास्ता खुला है। और तुम… तुम यहीं रहो। अपने पुल के टुकड़ों के साथ।"
वो मुड़ा। उसके आदमी उसके पीछे-पीछे चले। उनके जूतों की आवाज़ पुल के उस पार वाली सड़क पर दूर होती गई, और फिर वो एक टीले के पीछे गायब हो गए।
मैं पुल के टूटे किनारे पर खड़ा था। नीचे बहता पानी देख रहा था। एक लकड़ी का टुकड़ा पानी में घूम रहा था, और मुझे लगा कि मैं भी वैसे ही घूम रहा हूँ — कहीं का नहीं।
हरनाम मेरे पास आया। उसके हाथ में फ़ाइलें थीं, जो उसने अभी तक नहीं छोड़ी थीं। वो फ़ाइलें अपने सीने से लगाए खड़ा था, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को बचा रही हो।
"गोलू कहाँ है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सूखी थी।
"पीछे है। गाँव की औरतों के साथ।" वो रुका। "वीर, ठाकुर ने ऐसा क्यों किया? वो तो हार गया था। उसके अपने आदमियों ने उसे पकड़ लिया था।"
"वो हारा नहीं था," मैंने कहा। "वो बस यही चाहता था। सब देखें कि वो अब भी कुछ कर सकता है।"
मैंने पानी देखा। फिर पुल के उस पार देखा जहाँ ठाकुर गया था। फिर पानी देखा।
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