Spirit of a Fighter1057 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1057

7 min read November 5, 2026

मैंने पानी में अपने पैर आगे बढ़ाए। पानी मेरी कमर तक आ गया था। मेरे शरीर पर ठंडक और गरमी दोनों दौड़ रही थीं। मेरे दाँत किटकिटा रहे थे।

मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा।

"डर लग रहा है?" उसने धीरे से पूछा।

"हाँ," मैंने कहा। "बहुत।"

"अच्छा है," वो बोली। "डरने वाला ही सोचता है।"

वो मुस्कुराई। उस मुस्कान में वो सब था जो मैंने कभी किसी से नहीं कहा था।

"तैयार?" उसने पूछा।

"तेरे साथ?" मैंने कहा। "हाँ।"

टिंकू ने पीछे से कहा, "मैं भी हूँ, याद रखना।"

और मैं हँसा।

फिर मैंने गहरी साँस ली। और मैंने अपना सिर पानी के नीचे डाल दिया।

पानी के नीचे सब कुछ धुँधला था। पर मुझे वो पीली चमक दिख रही थी — दूर नहीं, बस दस-बारह हाथ नीचे और थोड़ा बाएँ। वहाँ एक गोल सा मुँह था, जैसे किसी कुएँ का। और उसी से वो गरमी आ रही थी।

मैंने सिर बाहर निकाला। साँस ली।

"वहाँ है," मैंने कहा। "दस-बारह हाथ नीचे। बाएँ तरफ़। एक गोल मुँह है।"

"मैं देख सकती हूँ?" मीरा ने कहा।

"हाँ।"

वो पानी में डूबी। फिर बाहर आई। उसने अपने बाल पीछे किए।

"वो कुआँ है," वो बोली। "या सुरंग का मुँह। पर वहाँ पानी का बहाव रुका हुआ है — वो मुँह किसी चीज़ से ढका है।"

"ढका है?"

"हाँ। जाली जैसी कोई चीज़। लोहे की।"

कालू काका ने पीछे से कहा, "वो जाली भवानी ने लगवाई थी। ताकि पानी के साथ कोई कचरा न जाए। उसने खुद लगाई थी।"

मैंने कालू काका को देखा। उनके चेहरे पर पसीना था।

"काका," मैंने कहा। "आपने कहा था भवानी लौटा था। उसके हाथ में दीया था। तो वो उस कमरे से लौटा था। ज़िंदा।"

"ज़िंदा," कालू काका ने कहा। "पर बदला हुआ। उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी। उसने मुझसे कहा था — कालू, उस कमरे में जो है, वो मेरा नहीं है। वो मिट्टी का है। और वो मिट्टी सिर्फ़ उसी को ताकत देगी जो साफ़ मन से जाए।"

मैंने मीरा को देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"साफ़ मन," मैंने कहा। "मेरे पास क्या है? गुस्सा, बदला, डर—"

"और माँ," मीरा ने कहा। "और गुड़िया। और टिंकू। और वो पूरा गाँव जो पीछे खड़ा है। ये भी तो साफ़ है।"

मैंने पीछे देखा। गाँव के लोग किनारे पर खड़े थे। मशालें जल रही थीं। माँ खड़ी थीं। गुड़िया खड़ी थी। और उन सबके चेहरों पर वो डर था जो मुझे भीतर तक काँपा रहा था — पर उन्होंने एक कदम भी पीछे नहीं हटाया।

मेरी आँखें भर आईं।

"ठीक है," मैंने कहा। "चलो।"

हम तीनों — मैं, मीरा और टिंकू — पानी के नीचे गए। टिंकू ने अपनी टोकरी किनारे पर रख दी थी और अब वो दोनों हाथों से रस्सी पकड़े हुए था। उसका चेहरा डर से पीला था, पर वो पीछे नहीं हटा।

हम उस गोल मुँह तक पहुँचे। लोहे की जाली वहाँ लगी थी, पर उसकी एक छड़ टूटी हुई थी — शायद बहुत साल पहले। मैंने उसे खींचा। जाली हिली। मैंने फिर खींचा। मीरा ने दूसरी तरफ़ से धक्का दिया। टिंकू ने अपनी रस्सी से उसे बाँधकर खींचा।

जाली अलग हुई।

और उसके पीछे से पानी का बहाव अचानक तेज़ हो गया। मुझे लगा मैं बह जाऊँगा। मैंने रस्सी पकड़ी। मेरा हाथ फिसल रहा था।

फिर मैं अंदर खिंच गया।

अंधेरा। फिर गरमी। फिर रोशनी।

मैं पानी से बाहर आया। ज़ोर से साँस ली। मेरा सीना फट रहा था। मैंने आँखें खोलीं।

मैं एक गोल कमरे में था। छत से पानी टपक रहा था।

मेरे पैरों के नीचे पथरीली ज़मीन थी। मैंने एक कदम बढ़ाया तो पानी घुटनों तक चटकना हुआ। मेरे पीछे मीरा बाहर आई, उसके बाल चेहरे पर चिपके थे। फिर टिंकू आया — उसने पानी में आँखें बंद कर ली थीं और अब खोलते ही ज़ोर से छींका।

"भगवान," वो बोला। "ये जगह कितनी गरम है। जैसे किसी के पेट के अंदर आ गए हों।"

"चुप कर," मीरा ने धीरे से कहा। पर उसके होंठ हिल रहे थे।

दीवारों पर काई जमी थी, पर काई के नीचे कुछ और भी था। मैंने हाथ फेरा — घिसी हुई लकीरें थीं। कोई मिट्टी से कुछ लिखता रहा था, बार-बार, सालों तक। लकीरें खुरदरी थीं, उँगली में चुभ रही थीं।

"मीरा," मैंने कहा। "ये कोई लिख रहा था।"

वो पास आई। उसने भी हाथ फेरा। फिर उसकी साँस रुक गई।

"ये अक्षर हैं," वो बोली। "बहुत पुराने। दादाजी की किताबों में ऐसे अक्षर थे।"

"क्या लिखा है?"

"पढ़ नहीं पा रही। पर ये ऊपर से नीचे लिखा है। बार-बार।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, कोई यहाँ अकेला था। बहुत दिनों तक।"

मेरे पेट में ठंडी गोली सरक गई। किसी ने यहाँ बैठकर, अंधेरे में, दीवार पर उँगली से लिखा था। कितने दिन? कितने साल?

टिंकू ने पीछे से कहा, "भैया, वहाँ रोशनी है।"

मैंने पलटकर देखा। कमरे के आख़िरी हिस्से में एक दरवाज़ा-सा था, और उसके पास एक छोटा दीया जल रहा था। वही दीया। पीली, लगातार, न बुझने वाली चमक। उसके नीचे मिट्टी रखी थी — लाल मिट्टी। और मिट्टी के बीच कुछ लिपटा था। एक कपड़ा।

मैं गया। घुटने टेके। कपड़ा खोला।

अंदर चूड़ियाँ थीं। दो। छोटी। बच्ची के हाथ की।

मेरे हाथ काँपने लगे। मीरा ने मेरा कंधा पकड़ा।

"ये किसकी हैं?" मैंने कालू काका की तरफ़ देखा, पर वो पीछे पानी में खड़े थे, और उनका चेहरा उस रोशनी में सफ़ेद पड़ गया था।

"भवानी की बहन की," काका ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "वो भी इसी पानी में उतरी थी। भवानी से पहले। वो लौटी नहीं।"

मेरे हाथ उन चूड़ियों पर थे और मुझे लगा जैसे किसी ने मेरा गला दबा दिया है। एक बच्ची। कोई बाप अपनी बेटी की चूड़ियाँ यहाँ छोड़कर गया था, दीये के पास, मिट्टी में।

"भवानी ने ये रखी थीं," काका बोले। "कहा था — जो भी इस दीये तक पहुँचे, वो जान जाए कि रास्ता मुफ़्त नहीं है।"

मैंने चूड़ियाँ वापस कपड़े में लपेटीं। और अपनी जेब में रख लीं। मैं नहीं जानता था क्यों। बस रख लीं।

फिर मैंने दीये के आगे देखा। एक सुरंग आगे बढ़ती थी — पतली, झुकी हुई। मेरी कमर झुकानी पड़ेगी।

"वो शहर की तरफ़ जाती है," काका ने कहा। "भवानी ने नक्शा बनाया था। पर वो आधा अधूरा था।"

"आधा अधूरा?"

"वो सुरंग के आख़िर तक नहीं पहुँचा था। वो लौट आया। पर उसने कहा था — जो सुरंग के बीच में मिलेगा, उससे बचना।"

मैंने मीरा को देखा। उसने होंठ भींचे।

"हमें जाना होगा," मैंने कहा। "ठाकुर अभी शहर के रास्ते पर होगा।"

"वो हमसे आगे है," मीरा बोली। "वो सीधे रास्ते से जा रहा है।"

"तो हम छोटे रास्ते से जाएँगे।" मैं उठा। "चल।"

पीछे से आवाज़ आई। पानी में कोई उतर रहा था।

"टिंकू, तू क्यों—"

पर टिंकू नहीं था।

पानी में घुटनों तक उतरी, सिर पर मिठाई की टोकरी रखे, गुड़िया खड़ी थी। उसकी आँखें बड़ी थीं, पर डर उसमें नहीं था।

"भैया," वो बोली। "मैं भी चलूँगी!"

॥

"भैया, मैं भी चलूँगी!"

गुड़िया की आवाज़ पानी में गूँजकर लौटी, और मेरे हाथ अपने आप उसकी तरफ़ बढ़ गए।

"नीचे आ," मैंने कहा। "पर टोकरी उतार।"

वो टोकरी सिर से उतारने ही वाली थी कि माँ की आवाज़ पीछे से आई — तेज़, फटी हुई, ऐसी जो मैंने बहुत कम सुनी थी।

"नहीं!"

माँ पानी के किनारे खड़ी थीं, साड़ी का पल्ला कमर में ठुसा हुआ, हाथ में कालू काका की लालटेन पकड़े। उनके होंठ काँप रहे थे।

"वो नहीं जाएगी। एक तो तू, ऊपर से ये।" उनकी आवाज़ टूटी। "मैंने एक बच्चा खोया है। दूसरा नहीं खोऊँगी।"

गुड़िया पानी में खड़ी माँ को देखने लगी। फिर मेरी तरफ़। मैंने उसकी आँखों में वो चीज़ देखी जो मैं जानता था — छोटी उम्र में भी बड़ी ज़िद।

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