Spirit of a Fighter – Chapter 1052
उसकी आँखों में कुछ था जो मुझे पहचाना-सा लगा। वो आँखें मैंने पहले कहीं देखी थीं। कहाँ?
“वीर सिंह,” उसने कहा, और मेरा नाम उसके मुँह से ऐसे निकला जैसे कोई पुरानी किताब से पढ़ा जा रहा हो। “मैं वही हूँ जिसे तेरी माँ ने कुएँ के पास छोड़ा था। मैं वो बच्चा हूँ जिसे ठाकुर ने पाला — अपने कुत्ते की तरह, अपने बेटे की तरह नहीं।”
मेरे पैर जम गए। मेरे कानों में एक आवाज़ गूंजी — माँ की आवाज़, कल की रात की, जब उन्होंने मुझे आँगन में बैठाकर बताया था कि टिंकू अकेला नहीं, एक और बच्चा भी था।
“तो तू…” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई।
“हाँ,” उसने कहा। “मैं तेरा भाई हूँ।”
और फिर उसने पलटकर ठाकुर की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले किसी में नहीं सुना — ठंडी, साफ़, बिना गुस्से की।
“और ठाकुर जी, आपके पचास आदमियों में से बत्तीस मेरे हैं।” उसने कमर से एक पीतल की सीटी निकाली — ठाकुर की जैसी, बिलकुल वैसी। “मैंने उन्हें आपका पानी पीने से रोक दिया है। तीन महीने से। उनके हाथ काँपते हैं, ठाकुर जी। आपके पानी के बिना।”
ठाकुर का चेहरा वो रंग ले चुका था जो मिट्टी का होता है जब बारिश उसे बहा देती है।
और मेरे भाई ने सीटी बजाई।
॥
सीटी की आवाज़ पुल के नीचे बहते पानी से टकराकर लौटी, और फिर वो हुआ जो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।
पचास में से बत्तीस आदमी — एक साथ नहीं, थोड़े-थोड़े करके — अपनी लाठियाँ नीचे करने लगे। पहले दो, फिर पाँच, फिर दस। उनके हाथ काँप रहे थे। एक बूढ़ा आदमी था जिसकी लाठी सीधी ज़मीन पर गिरी और उसने उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की। एक जवान लड़का था जिसने अपनी कलाई पकड़ ली, जैसे अंदर से कोई दर्द उठ रहा हो।
करण ने सीटी जेब में रखी और आगे बढ़ा।
“तीन महीने,” वो बोला, और उसकी आवाज़ पुल के हर कोने तक पहुँची। “तीन महीने इन लोगों को पानी नहीं मिला। देखो इनके हाथ।” उसने एक लड़के की कलाई उठाई। उँगलियाँ हिल रही थीं, बिना रुके। “ये कमज़ोरी नहीं है। ये उस पानी की भूख है जो इनकी नसों में बीस साल से चल रहा था।”
मेरे पीछे से एक आवाज़ आई — हरनाम की। वो भीड़ को चीरता हुआ आगे आया, चश्मा टूटा हुआ, एक काँच की चौखट टेप से बँधी। उसके हाथ में फ़ाइल थी, वही पुरानी, जिसके कोने मुड़े हुए थे।
“मैं गवाही दूँगा,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ बैठी हुई थी, जैसे बहुत देर से बोल रहा हो। “मैंने खुद लिखा है। हर मौत। हर काग़ज़। ठाकुर के कहने पर।”
भीड़ में खुसफुसाहट फैली। कोई बोला, “क्या कह रहा है ये?” कोई बोला, “हरनाम?” और एक औरत थी जिसने अपना आँचल मुँह पर रख लिया, जैसे अभी कुछ ऐसा सुनेगी जो वो सुनना नहीं चाहती।
ठाकुर ने एक कदम पीछे रखा। सिर्फ़ एक। पर मैंने देखा। और उसका ये एक कदम पीछे हटना मेरे लिए पूरे पचास आदमियों के आगे बढ़ने से बड़ा था।
“हरनाम,” ठाकुर बोला, और उसकी आवाज़ में वो मिठास लौटी जो ज़हर से पहले आती है। “तेरा बेटा ठीक है ना? गोलू? अभी घर पर सो रहा होगा।”
हरनाम रुका। उसकी उँगलियाँ फ़ाइल पर जम गईं।
और तभी करण हँसा।
वो हँसी किसी चीज़ पर नहीं थी — ये हँसी उस आदमी पर थी जो अब भी पुराने हथियार चला रहा था।
“ठाकुर जी,” करण ने कहा, “गोलू को आपने तीन दिन पहले बेच दिया। मैं उसी कमरे में था जहाँ ये सौदा हुआ था। दो हज़ार में। लंगड़े शेराज़ के हाथ।”
हरनाम की साँस अंदर ही अटक गई। उसका चेहरा पहले लाल हुआ, फिर सफ़ेद। फिर वो पलटा और उसने ठाकुर की तरफ़ देखा, और उन आँखों में अब कुछ नहीं बचा था — न डर, न चापलूसी, न हिसाब।
“मेरा बेटा,” हरनाम ने कहा, और आवाज़ टूटी। “तूने मेरे बेटे को बेच दिया।”
“हरनाम, सुन—”
“मैंने तेरे लिए अपना नाम खराब किया।” हरनाम की आवाज़ ऊँची हो रही थी, और उसकी फ़ाइल हवा में काँप रही थी। “मैंने मरे हुए लड़कों के नाम के आगे ‘बीमारी’ लिखा। मैंने उनकी माँओं के आँसू सुखाए। और तूने मेरे बेटे को दो हज़ार में…”
वो आगे बढ़ा, पर दो गाँव वालों ने उसे पकड़ लिया। नहीं तो वो ठाकुर के गले पर हाथ रख देता।
ठाकुर ने चारों तरफ़ देखा। उसके पचास आदमियों में से अब शायद बीस खड़े थे अपनी लाठी उठाए। बाकी की आँखों में वो चीज़ आ चुकी थी जो किसी भी सरदार के लिए सबसे खतरनाक होती है — हिसाब। मन में हिसाब।
“बेटा,” ठाकुर ने करण की तरफ़ हाथ बढ़ाया, और उसकी आवाज़ में वो नरमी डाल दी जो बीस साल से उसके काम आती थी। “तू मेरा ही पाला हुआ है। मैंने तुझे मिट्टी से उठाया था। तेरी तो कोई माँ भी नहीं थी, तू भूल गया?”
करण ने उसका हाथ नहीं पकड़ा। उसने अपना हाथ जेब में डाला और वो चीज़ निकाली जो मैंने पहली नज़र में नहीं पहचानी।
एक छोटी सी पीली शीशी। काँच की। ढक्कन पर सीसे की मुहर।
पुल पर हवा रुक गई। मैंने अपने पीछे रणवीर सिंह को साँस रोकते सुना।
“ये वही शीशी है,” करण ने कहा, और उसने उसे आसमान की तरफ़ उठाया ताकि सब देख सकें। “जो मुझे पीली बस में दी गई थी। मैंने इसे पी नहीं। मैंने इसे अपनी जान की तरह छुपाया। और जब होश आया, तो मैंने इसके पेंदे पर खुरचकर देखा।”
उसने शीशी को पलटा।
“यहाँ लिखा है। छुरी से खुदा हुआ। दो शब्द।” उसने अपनी आवाज़ धीमी की, और अगले पल उसने वो दो शब्द बोले जो पुल पर खड़े हर आदमी के कान में जा कर बैठ गए। “महेंद्र का हाथ।”
मेरे पैरों तले लकड़ी काँपी, या मेरे पैर काँप रहे थे, पता नहीं।
“ये शीशियाँ ठाकुर की नहीं थीं,” करण ने कहा। “भैरव की थीं। पर भैरव के ऊपर एक हाथ और था। और वो हाथ यही है।” उसने ठाकुर की तरफ़ उँगली उठाई। “बीस साल। सात पहलवान। तीन ज़िंदा। सबके सब इसी एक आदमी के हिसाब में दर्ज।”
ठाकुर का चेहरा अब उस रंग से भी आगे चला गया था। उसके माथे पर पसीना था — ठंडा, मोटा — और उसकी बड़ी मूँछों के सिरों का तेल पसीने में घुलकर उसके गालों पर चमक रहा था। उसने अपनी लाठी उठाई। पर उसके अपने आदमियों ने उसे पकड़ लिया।
“छोड़ो मुझे!” वो चीखा।
“बत्तीस नहीं,” करण ने कहा, और उसका लहजा ठंडा था, “अब तो चालीस हैं।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। गाँव वालों की भीड़ में से चार लाठीधारी आगे आए थे, और उन्होंने ठाकुर के अपने आदमियों के सामने खड़े होकर अपनी लाठियाँ आड़ी रख दीं। वो गाँव के लड़के थे। रामू और बैजू के साथ वही जुड़ गए थे जो पुल पर आए थे।
ठाकुर ने एक और कदम पीछे रखा। और उस पल मैंने उसकी आँखों में देखा। वो डर नहीं था। वो कुछ और था — कोई हिसाब। जैसे वो अंदर से गिन रहा हो कि अभी कितना बचा है।
करण ने शीशी रणवीर सिंह की तरफ़ बढ़ाई। रणवीर सिंह ने उसे दोनों हाथों से लिया, और उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने शीशी को आँखों के पास उठाया, पेंदा देखा, और फिर मुँह फेरकर उन्होंने आसमान की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो गिरा नहीं।
“बीस साल,” रणवीर सिंह ने धीरे से कहा। “बीस साल मैं इसी दिन का इंतज़ार करता रहा। और आज ये दिन मेरे सामने आ गया।”
तभी करण मेरी तरफ़ मुड़ा।
और उसने जो किया, वो मैंने सोचा भी नहीं था।
वो मेरे सामने आया, और धीरे से मेरे पैरों पर हाथ रखकर झुक गया।
“अरे—” मैंने अपने हाथ आगे किए, पर वो झुका ही रहा। “उठ, उठ!”
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