Spirit of a Fighter – Chapter 1049
"मेरे पास शीशी थी," उसने कहा। "और मेरे पास ताकत भी थी। पर मेरे पास अपना कुछ नहीं था।"
ठाकुर ने उसे धक्का दिया। दीपक लड़खड़ाया, पर गिरा नहीं। ठाकुर ने पूरे मैदान को देखा, और उसकी आवाज़ में वो ज़हर था जो उसने बीस साल पाला था।
"अच्छा," वो बोला। "तो अब मैं अकेला ही सबका सफाया करूँगा। रामपुर, तेरे पास एक घंटा है। अपने पहलवान को मैदान में भेज। और अगर वो जीता, तो मैं खुद तेरी माँ को छोड़ दूँगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा और हँसा। "पर वो नहीं जीतेगा। क्योंकि जो मैंने तेरे लिए तैयार किया है, वो पहलवान नहीं है, वीर सिंह। वो तेरा ही खून है।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। खून। मेरा खून।
तभी पुल के दूसरे सिरे से एक आवाज़ आई। और वो आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने मंदिर की घंटी बजी हो — धीमी, पर हर आदमी के सीने तक पहुँचने वाली।
"अकेला नहीं, महेंद्र।"
सब पलटकर देखने लगे। मैं भी पलटा।
पुल के दूसरे सिरे पर, शहर की तरफ़ वाली सड़क के मोड़ पर, एक बैलगाड़ी खड़ी थी। और उसके सामने, दोनों हाथों में एक जली हुई डायरी पकड़े, कमला देवी खड़ी थीं। उनके सफ़ेद बाल हवा में उड़ रहे थे और उनकी आँखें लाल थीं। उन्होंने डायरी को ऊपर उठाया।
"मैंने तुझे बीस साल पाला," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो दर्द था जो सिर्फ़ उस औरत के पास होता है जिसने अपने भाई की लाश को गले लगाया हो। "मैंने तेरे घावों पर पट्टी बाँधी। मैंने तेरे बुखार में रात-रात भर आँखें नहीं झपकीं। और तूने मेरे भाई की हड्डियाँ बेच दीं? तूने भवानी की हड्डियाँ उस जगह भेज दीं जहाँ से कोई ज़िंदा नहीं लौटता?"
ठाकुर का चेहरा पहली बार बदला। वो एक कदम पीछे हटा, और उसका मुँह खुला रह गया।
"कमला…" वो बोला। "तू यहाँ कैसे…"
"मैं यहाँ इसलिए हूँ," उन्होंने कहा, और आगे बढ़ीं, "क्योंकि मुझे नीली शीशी नहीं पीनी थी। मैंने तेरे हाथ से वो शीशी ली थी, पर पी नहीं। मैंने सिर्फ़ तुझे ये सोचने दिया कि मैं भूल गई हूँ।"
उन्होंने डायरी खोली। पन्ने भूरे थे, जले हुए, पर लिखाई अब भी पढ़ी जा सकती थी।
"ये भवानी की डायरी है," उन्होंने कहा। "ये वो डायरी है जो उन्होंने तेरे बारे में लिखी थी, महेंद्र। हर वो रात, जब तू उनके पास आया और माफ़ी माँगी। हर वो सुबह, जब तूने कहा कि छोड़ दूँगा। और हर वो शाम, जब तू फिर उस पानी वाले आदमी के पास लौट गया।"
ठाकुर ने आगे बढ़कर डायरी छीननी चाही, पर रणवीर सिंह की गाड़ी बीच में आ गई। उन्होंने अपना हाथ उठाया।
"रुक," उन्होंने कहा। "अब ये सबके सामने पढ़ी जाएगी।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं। उसने मेरे हाथ पर और ज़ोर से पकड़ा और फुसफुसाई — "ये वो दिन है, वीर। जिसका हम इंतज़ार कर रहे थे।"
पर उस वक़्त मेरा दिल कहीं और था। ठाकुर ने कहा था कि उसने मेरे लिए मेरा ही खून तैयार किया है। मेरा खून। मेरे पिता की हड्डियाँ अभी भी उस जगह पड़ी हैं जहाँ से कोई ज़िंदा नहीं लौटता। और अगर मेरा कोई भाई ज़िंदा है, तो वो उसी जगह से आएगा।
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में एक नाम था जो उन्होंने अभी नहीं बोला।
कमला देवी ने डायरी का पहला पन्ना पलटा। पूरा पुल साँस रोककर खड़ा था।
पर तभी ठाकुर ने अपनी लाठी उठाई और कमला देवी की तरफ़ बढ़ा।
"तूने अपनी कब्र खुद खोदी है, बुढ़िया," वो बोला।
मैं दौड़ा। मेरे पैर पुल की लकड़ी पर फिसले, पर मैंने अपनी जान लगा दी। मैंने उन्हें उसकी लाठी से बचाया — और मेरे कंधे पर वो लाठी ऐसे पड़ी जैसे पहाड़ गिरा हो। मेरी आँखों के आगे अंधेरा आया।
और उसी अंधेरे में मुझे अपने पिता की आवाज़ सुनाई दी, वैसी ही जैसी तहखाने की मिट्टी से आई थी — धीमी, साफ़, और बहुत दूर से।
"मेरे बेटे," वो बोले, "तू अब भी अकेला नहीं है।"
मेरी आँख खुली तो पहले कुछ दिखा नहीं। सिर्फ़ एक लंबी सी सुरंग जैसी आवाज़, जैसे कोई दूर जाकर लौट रहा हो। फिर चेहरे उभरे — कालू काका का, मीरा का, और सबसे ऊपर रणवीर सिंह का चेहरा, जो मेरे ऊपर झुका था और उनके होंठ हिल रहे थे पर आवाज़ आने में वक़्त लगा।
“बेटा, सुनाई दे रहा है?”
मैंने गर्दन हिलाई। कंधे में जला हुआ दर्द था, जैसे अंदर कोई चीज़ टूटकर बैठ गई हो। मैंने कोहनी के सहारे उठना चाहा, पर मीरा ने मेरा सिर अपनी गोद में दबा दिया।
“तू बैठ मत। प्लीज, एक मिनट रुक जा।”
उसकी आवाज़ में जो काँप था, वो मुझे अच्छा लगा। ये सोचना बुरा था, पर लगा — कोई मेरे डर से डरता है, तो ज़िंदा होने का मतलब है।
“कमला देवी?” मैंने पूछा।
“यहाँ हैं,” कालू काका बोले। “तू गिरा, तो उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर तेरे कंधे पर बाँध दिया। बुढ़िया के हाथ काँप रहे थे, पर बाँधते वक़्त एक बार भी नहीं रुके।”
मैंने आँख उठाकर देखा। कमला देवी मेरे पास ही घुटनों के बल बैठी थीं, जली डायरी उनकी गोद में थी। उनका चेहरा सूखा था, पर आँखों के नीचे गीली लकीरें थीं। उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा।
“बुखार नहीं है,” वो बोलीं। “अच्छा है। तेरे पिता भी इसी तरह गिरे थे और उठ गए थे।”
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। “आपने मुझे क्यों नहीं बताया? इतने दिन? आप जानती थीं कि ठाकुर…”
“मैं जानती थी,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सपाट थी, जैसे थकी हुई ज़मीन। “पर जानने और साबित करने में फ़र्क़ होता है, बेटा। मेरे पास सिर्फ़ एक डायरी थी और एक बूढ़ा शरीर। अगर मैं अकेले बोलती, तो लोग कहते — बुढ़िया सठिया गई है। इसलिए मैं चुप रही। चुप रहना भी एक काम होता है। ज़हर की तरह।”
उन्होंने डायरी उठाई और रणवीर सिंह की तरफ़ बढ़ा दी।
“पढ़ो, रणवीर। पढ़ो और सब सुनें।”
रणवीर सिंह ने पन्ना पलटा। उनकी आवाज़ गाड़ी से ऊपर उठी। पहली पंक्तियाँ भवानी के हाथ की थीं, मैंने लिखावट पहचानी — मोटी, सीधी, बिना किसी गोलाई के।
“आज महेंद्र फिर आया। रोया। मेरे पैर पकड़े। कहा कि उस आदमी ने उसे फँसा लिया है, कि उसके हाथ बँधे हैं। मैंने उसका सिर उठाया और पूछा — महेंद्र, क्या तूने उस पानी को किसी और को दिया? उसने आँख चुराई। बस उतना ही काफ़ी था। मैंने उसे अखाड़े से निकाल दिया। पर वो मेरा शिष्य था। मैं उसे मार नहीं सकता था। यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।”
पुल पर सन्नाटा था। किसी ने खाँसा भी नहीं।
रणवीर सिंह ने अगला पन्ना पलटा। “मुझे लगा था महेंद्र सुधर जाएगा। पर आज मैंने वो देखा जो मैंने कभी सोचा नहीं था। उसने तीन लड़के भैरव के पास भेजे। कहा कि सीखने भेजे हैं। झूठ। वो उन्हें बचाने भेज रहा था — उस आदमी से, जो मेरे ही अखाड़े के पानी में ज़हर घोल रहा था। पर मैंने उसे रोका नहीं। मैंने कहा — जा, जो करना है कर। मैं डर गया था, रणवीर। मैं भवानी हूँ, पर मैं भी डरा।”
दीपक, जो अब तक सबसे आगे खड़ा था, एक कदम पीछे हटा। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसके अंदर से रीढ़ निकाल ली हो। उसके हाथ की मुट्ठी खुल गई।
“मैं…” वो बोला, और आवाज़ फँस गई। “मैं सोचता था भवानी ने मुझे छोड़ दिया। कि मैं उनके लिए कुछ नहीं था।”
“वो तुझे बचा रहे थे, दीपक,” रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ नरम हो गई। “उस दिन उन्होंने तुझे नहीं, तेरे जैसे दो और लड़कों को भेजा था। पर तू बड़ा था, तू समझ गया। तूने खुद को भेजवा लिया। भवानी ने उन रातों में यही लिखा — ये लड़का ज़िद्दी है, पर इसकी ज़िद में दिल है।”
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